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लिख दो बाबा वसीयत में हिंदी कहानी | Likh do Baba Wasiyat mein kahani

Likh do Baba Wasiyat mein Hindi Khani: ' लिख दो बाबा वसीयत में ' इस कहानी दिलों के बीच जो दीवारें खड़ी होती हैं , उनकी नींव वसीयत की चंद सतरों से भी खड़ी हो जाती है । इंदु के बाबा ने भी अपनी सम्पत्ति के बंटवारे के लिए वसीयत की ज़मीन उठाई थी । क्या लिखा जाना था उसमें ..

लिख दो बाबा वसीयत में हिंदी कहानी | Likh do Baba Wasiyat mein kahani

Likh do Baba Wasiyat mein Hindi Khani: ' लिख दो बाबा वसीयत में ' इस कहानी दिलों के बीच जो दीवारें खड़ी होती हैं , उनकी नींव वसीयत की चंद सतरों से भी खड़ी हो जाती है । इंदु के बाबा ने भी अपनी सम्पत्ति के बंटवारे के लिए वसीयत की ज़मीन उठाई थी । क्या लिखा जाना था उसमें ..

Hindi kahani 

बाबा यूं ही तो नहीं बन जाता कोई ,खून से सींचता है अपने पौधे को । स्नेह की खाद , दुलार की ऊष्मा , भावों के झोंके से सहलाता है तब ही तो बड़ा होता है पौधा और उसके उपवन की शोभा बनता है । वो पौधा कभी फूलों वाला पौधा बनता है , तो कभी पेड़ , पर ये कैसा पौधा होता है । बाबा जिसे अपने उपवन से उखाड़ कर दूसरे उपवन की शोभा बना दिया जाता है । अक्सर ये प्रश्न उमड़ता था इंदु के मन में पर बाबा की गोद में लाख बार सिर रखने के बाद भी वो पूछ नहीं पाई । मां से पूछती तो बस एक ही जवाब मिलता , ' दुनिया का दस्तूर है लाडो ... हर बाबुल निभाता है । ' 

इंदु के बाबुल ने भी निभाया था यह दस्तूर जब इंदु की इर्द - गिर्द चाचियां - मामियां यह गीत गाते हुए उसे हल्दी लगाती रहीं-

'इन महलों दे विच बाबुल वे ! मेरा डोला अटक गया ' 

यह गुहार बेटी की होती है । तब बाबुल कहता है -

एक ईंट उखड़वा दूंगा , बेटी घर जा अपने । ' 

और कितनी निर्ममता से चमकीली चीजों का लालच देकर बेटी को डोली में बैठा दिया जाता है। इंदु ने बहुत गुहार लगाई थी मां - बाबा से- ' मां , इतनी साड़ियां , इतने बर्तन मत दो , सब पैसे का अपव्यय है । शेखर के घर होंगे ना बर्तन !' 

' लाडो ! सब दस्तूर है दुनिया का , फिर ख़ाली हाथ थोड़े ही विदा करेंगे । ' इंदु की आवाज नक्कारखाने में तूती साबित हुई । भले ही समाजशास्त्र में इंदु ने पढ़ा था कि हर स्त्री का पिता के धन पर अधिकार होता है लेकिन पिता के कर्ज को धन नहीं माना जा सकता , पिता की चादर भी देखी जाती है । 

इंदु शेखर के साथ अपनी गृहस्थी में रमी पर मां - बाबा को याद करना नहीं भूली । बरस - दर - बरस मां बाबा के उपहारों की परम्परा चलती रही । कभी राखी तो कभी भैया दूज , कभी होली , कभी दिवाली , मां संदूक में सहेजी साड़ी निकालती तो बाबा अपने बक्से में रखे चंद नोट और उपहार में आई डायरी या पेन देते । पिछले वर्ष मां के जाने के बाद बाबा अकेले रह गए थे । वीडियो कॉल पर बाबा का चेहरा तसल्ली नहीं देता तो इंदु ग्यारह घंटे की बस की यात्रा करना जरूरी समझती । इंदु के बाबा के शहर में फेरे बढ़ गए थे । 

' आजा इंदु ! मां का संदूक संभाल ले । और भी कुछ हिसाब करना है तुझसे । शेखर को साथ लाना । रोहन को भी लाना । ' उस दिन बाबा की पनियाई आंखें इंदु से छिप ना सकीं । 

'हां बाबा ! रोहन की परीक्षा हो जाए , यूं तो ऑनलाइन ही है , फिर आऊंगी , तसल्ली से ' इंदु ने कहा तो बाबा की आंखें डबडबा गईं । 

'मेरा क्या भरोसा ! इस महामारी का भी नहीं पता , कब क्या हो , पानी का बुलबुला है , इंसान की जिंदगानी । ' बाबा नीरज के अंदाज में बुदबुदा उठे । आज बाबा को क्या हो गया है , शेखर को भी याद कर रहे हैं , रोहन को भी , उसे बुलाकर हिसाब करना चाहते हैं । इंदु को बाबा की वो तमाम डायरियां याद आने लगीं जिनमें शायरियां लिखी होती थीं । लगता है बाबा डायरियों में लिखे शेर पढ़कर भावुक हो रहे हैं । 

मई की चिलचिलाती धूप में शेखर को यात्रा करना पसंद नहीं था लेकिन इंदु ने बाबा का आग्रह बताया तो चल दिए । गेट पर पहुंचते ही छोटी भाभी को देखा । भतीजी प्रिया और सक्षम भी बगिया में खेल रहे थे । रोहन भाग कर उन से मिलने गया । ' अरे वाह ! तो दुर्ग से भैया भी आए हैं , बड़े भैया - भाभी भी रायगढ़ से आए हैं । अच्छा तो बाबा ने सारा कुनबा ही इकट्ठा कर लिया है ' इंदु बुदबुदा उठी ।

बड़ी भाभी पहले से ही किचन में नाश्ते की तैयारी कर रही थीं । छोटी भाभी तब तक इंदु और शेखर के लिए चाय ले आई थीं । आज डायनिंग टेबल पर रौनक थी । छह कुर्सियों वाली डायनिंग टेबल भी छोटी पड़ गई थी । तीन कुर्सी और एक स्टूल अलग से सेट किया गया । बाबा का चेहरा तटस्थ था । पोहा खाने के बाद चाय का आख़िरी घूंट पीकर साइड में रख कर बैठ गए जैसे किसी के इंतजार में थे । 

" बच्चों ! आज सबको इसलिए बुलाया है कि यह मकान मां के नाम था । मां के जाने के बाद इसका उतराधिकार हट गया है जिसे टाइटल ओपन होना कहते हैं । ' बाबा ने बिना कोई भूमिका के बात शुरू कर दी थी । 

सब चुप्प ! तो बड़े भैया ने कहा , ' बाबा आप अपने नाम पर रजिस्ट्री करवा लो । ' 

' मेरा क्या भरोसा ! आज हूं , कल नहीं , फिर मेरे सामने ही बंटवारा हो जाए । वसीयत करना चाहता हूं । तीन हिस्से कर लो ' एक दम सपाट शब्दों में बोलते हुए बाबा ने एक मोटी सी धूसर रंग की फ़ाइल रख दी थी ।

' तो इसलिए बुलाया था आपने बाबा ! ' इंदु फट पड़ी थी । छोटी भाभी और बड़ी भाभी सोच में पड़ गई थीं । उनके चेहरे पर एक भाव आ रहा था , कि इंदु दीदी क्या बोलेंगी । 

' बाबा ! अगर आप यह सोच रहे हैं कि मैं आपकी सम्पति में से हिस्सा लूंगी , तो भूल जाना ' इंदु के स्वर में तीक्ष्णता थी । 

' लेकिन बेटियों का बराबर का अधिकार होता है । ' छोटे भैया बोले । 

' हां ! होता है भैया । लेकिन वो अधिकार ता -उम्र बेटी घर से लेती रहती है । शादी में दहेज के नाम पर , तो कभी वार -त्योहार के नाम पर , बच्चों के जन्म पर तो कभी भाइयों की शादी पर , बेटियां तो हमेशा ही लेती रहती हैं ' बोलते हुए इंदु का गला रुंध गया था । 

' बाबा ! मैं तो आपके उपवन का वो पौधा हूं जो दूसरे उपवन में लगाया गया । और उस उपवन में भी तो कुशल माली होता है न , मुझे आपने शेखर जैसे कुशल माली के हाथों में सौंपा । कोई कमी नहीं आई मेरे जीवन में । ' इंदु की अश्रुधारा अविरल हो गई थी । शेखर इंदु से सहमति जताते सिर हिला रहे थे । बड़ी भाभी और छोटी भाभी डायनिंग टेबल पर कोहनी टिकाए बैठी थीं । 

' हां बाबा ! आपको वसीयत लिखनी है ना तो मेरे नाम वो तमाम डायरियां लिख दो जिनमें आपकी शेरो - शायरियां लिखी हैं , वो नोट बुक्स दे दो जिनमें आपकी हस्तलिपि में ब्ल्यू - ब्लैक स्याही से मुकेश और रफी के तमाम गाने लिखे हैं । वो एलबम लिख दो मेरे नाम जिनमें आपकी और मां की तमाम यात्राओं की ब्लैक एंड वाइट फोटो हैं । और आपका वो फिलेटेली एलबम जिसमें विश्व के सभी देशों के डाक टिकट हैं और आपका वो सिक्कों का संग्रह कर दो मेरे नाम बाबा ! ' इंदु सुबक रही थी । 

' देना ही चाहते हो ना आप मुझे कुछ तो मां के संदूक से चंद साड़ियां दे दो ताकि मैं मां की महक महसूस कर सकूं ... और ... और .. ' इंदु की , हिचकी बंध गई थी । 

..और दे सको तो मुझे आपका वो ब्ल्यू चेक वाला कोट दे दो जिसमें छिपकर मैं आपकी गोद में सो जाया करती थी । बाबा ! लिख दो ना ये वसीयत ! ' इंदु से आगे बोला ना गया था । सबकी आंखें नम हो आई थीं । दोनों भाभियों की आंखों से भी अश्रुधारा बह रही थी । बाबा की आंखों से दो बूंदें उस धूसर फ़ाइल पर लुढ़क पड़ी थीं ।

लेखक-संगीता सेठी 

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