बोधकथा पश्चाताप

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बोधकथा पश्चाताप,pashchatap ek bodhkatha

बोधकथा पश्चाताप 

एक - दूसरे की सहायता करके हम किसी भी प्रकार के संकट को हरा सकते है , चाहे वह संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो । 

एक व्यापारी के पास दो टट्टू थे । वह उन पर सामान लाद कर पहाड़ों पर वसे गांव में ले जाकर बेचा करता था । एक बार उनमें से एक टट्टू कुछ बीमार हो गया । व्यापारी इस बात को जानता नहीं था । उसे पता नहीं था कि उसका एक टट्टू बीमार है । व्यापारी को पहाड़ों पर गांवों में बेचने के लिए नमक , गुड़ , चावल आदि ले जाना था । उसने दोनों टट्टूओं पर बराबर सामान लाद लिया और अपने व्यापार पर चल पड़ा । 

मार्ग में बीमार टट्टू को चलने में कष्ट होने लगा । उसने साथी टट्टू से कहा , ' मेटी तबियत ठीक नहीं है । में अपनी पीठ पर रख एक बोरा गिरा देता हूं , तुम यहीं खड़े रहो । स्वामी वह बोरा उठाकर तुम्हारे ऊपर रख देगा । मेरा भार कुछ हुल्का हो जाएगा , तो फिर शायद में तुम्हारे साथ चला चलूं । तुम यदि आगे निकल जाओगे तो गिरा बोरा मालिक फिर मेरी पीठ पर ही लाद देगा । ' 

दूसरे टट्टू को उसकी स्थिति देख कर किंचित् भी दया नहीं आई । वह बोला , ' तुम्हारा भार ढोने में क्यों खड़ा रहूं ! मेरी पीठ पर क्या कम भार लदा है ? मैं अपने हिस्से का ही भार ढोऊंगा । ' 

बीमार टट्टू निराश हो गया , कुछ बोला नहीं । किन्तु उसकी तबियत बराबर बिगड़ती जा रही थी । चलने में उसे बहुत कठिनाई हो रही थी कि तभी एक पत्थर से उसे ठोकर लगी और वो लुढ़क गया । और ऐसा लुढ़का कि लुढ़कता हुआ गड्ढे में जा गिरा । 

थोड़ी देर बाद उसके प्राण पखेरू उड़ गए । व्यापारी हताश हो गया । अपने एक टट्टू के मर जाने से उसको बड़ा दुख हुआ । थोड़ी देर वह व्यापारी वही खड़ा रहा । फिर उसने उस गिरे हुए टट्टू के बोटे भी उठाकर दूसरे टट्टू की पीठ पर लाद दिए ।

 बोझ लदते ही वह बड़ा पछताया । दूसरा कोई चारा भी नहीं था । सामान गिरा दे , तो पिटने का भय था । मन - ही - मन कहने लगा , ' यदि मैंने अपने साथी का कहा मान कर उसका बोझ कुछ हलका कर दिया होता , तो यह नौबत नहीं आती , दोष मेरा ही है । उस समय मेरी अक्ल मारी गई थी , अब बोझ तो ढोना ही पड़ेगा । ' 

संकट में पड़े अपने साथी की जो सहायता नहीं करते , उन्हें पीछे पछताना ही पड़ता है ।

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