बड़े घर की बेटी: मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Bade ghar ki beti

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बड़े घर की बेटी: मुंशी प्रेमचंद की कहानी | प्रेमचंद्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ 

बड़े घर की बेटी: मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Bade ghar ki beti, प्रेमचंद्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ

 बड़े घर की बेटी कहानी 

बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गांव के जमींदार और नम्बरदार थे । उनके पितामह किसी समय बड़े धन - धान्य संपन्न थे । गांव का पक्का तालाब और मंदिर जिनकी अब मरम्मत भी मुश्किल थी , उन्हीं के कीर्ति - स्तंभ थे । कहते हैं , इस दरवाजे पर हाथी झूमता था , अब उसकी जगह एक बूढ़ी भैंस थी , जिसके शरीर में अस्थि - पंजर के सिवा और कुछ न रहा था ; पर दूध शायद बहुत देती थी , क्योंकि एक न एक आदमी हांड़ी लिये उसके सिर पर सवार ही रहता था । बेनीमाधव सिंह अपनी आधी से अधिक संपत्ति वकीलों को भेंट कर चुके थे । उनकी वर्तमान आय एक हजार रुपये वार्षिक से अधिक न थी । ठाकुर साहब के दो बेटे थे । बड़े का नाम श्रीकंठ सिंह था । उसने बहुत दिनों के परिश्रम और उद्योग के बाद बी ० ए ० की डिग्री प्राप्त की थी । 

अब एक दफ्तर में नौकर था । छोटा लड़का लालबिहारी सिंह दोहरे बदन का , सजीला जवान था । भरा हुआ मुखड़ा , चौड़ी छाती । भैंस का दो सेर ताजा दूध वह उठ कर सवेरे पी जाता था । श्रीकंठ सिंह की दशा बिल्कुल विपरीत थी । इन नेत्रप्रिय गुणों को उन्होंने बी ० ए ० - इन्हीं दो अक्षरों पर न्योछावर कर दिया था । इन दो अक्षरों ने उनके शर को निर्बल और चेहरे को कांतिहीन बना दिया था । इसी से वैद्यक ग्रंथों पर उनका विशेष प्रेम था । आयुर्वेदिक औषधियों पर उनका अधिक विश्वास था ! शाम - सवेरे उनके कमरे से प्रायः खरल की सुरीली कर्णमधुर ध्वनि सुनायी दिया करती थी । लाहौर और कलकत्ते के वैद्यों से बड़ी लिखा - पढ़ी रहती थी । 


प्रेमचंद की कहानी 

रानी सारन्धा: रानी सारन्धा– मुंशी प्रेमचंद की कहानी

गरीब की हाय,

 राजा हरदौल

नमक का दारोगा

परीक्षा


श्रीकंठ इस अंग्रेजी डिग्री के अधिपति होने पर भी अंग्रेजी सामाजिक प्रथाओं के विशेष प्रेमी न थे ; बल्कि वह बहुधा बड़े जोर से उसकी निंदा और तिरस्कार किया करते थे । इसी से गांव में उनका बड़ा सम्मान था । दशहरे के दिनों में वह बड़े उत्साह से रामलीला में सम्मिलित होते और स्वयं किसी न किसी पात्र का पार्ट लेते थे । गौरीपुर में रामलीला के वही जन्मदाता थे । प्राचीन हिन्दू सभ्यता का गुणगान उनकी धार्मिकता का प्रधान अंग था । सम्मिलित कुटुम्ब के तो वह एक मात्र उपासक थे । आजकल स्त्रियों को कुटुम्ब में मिल - जुल कर रहने की जो अरुचि होती है , उसे वह जाति और देश दोनों के लिए हानिकारक समझते थे । 

यही कारण था कि गांव की ललनाएं उनकी निंदक थीं ! कोई - कोई तो उन्हें अपना शत्रु समझने में भी संकोच न करती थीं । स्वयं उनकी पत्नी को ही इस विषय में उनसे विरोध था । यह इसलिए नहीं कि उसे अपने सास - ससुर , देवर या जेठ आदि से घृणा थी ; बल्कि उसका विचार था कि यदि बहुत कुछ सहने और तरह देने पर भी परिवार के साथ निर्वाह न हो सके , तो आये दिन की कलह से जीवन को नष्ट करने की अपेक्षा यही उत्तम है कि अपनी खिचड़ी अलग पकायी जाय ।

  आनंदी एक बड़े उच्च कुल की लड़की थी । उसके बाप एक छोटी - सी रियासत के ताल्लुकेदार थे । विशाल भवन , एक हाथी , तीन कुत्ते , बाज , बहरी - शिकरे , झाड़ - फानूस , आनरेरी मजिस्ट्रेटी और ऋण , जो एक प्रतिष्ठित ताल्लुकेदार के भोग्य पदार्थ हैं सभी यहां विद्यमान थे । नाम था भूपसिंह बड़े उदार चित्त और प्रतिभाशाली पुरुष थे , पर दुर्भाग्य से लड़का एक भी न था । सात लड़कियां हुई और दैवयोग से सब की सब जीवित रहीं । पहली उमंग में तो उन्होंने तीन ब्याह दिल खोल कर किये ; पर पंद्रह - बीस हजार रुपयों का कर्ज सिर पर हो गया , तो आंखें खुलीं , हाथ समेट लिया । आनंदी चौथी लड़की थी । 


रबीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी 

रबीन्द्रनाथ टैगोर की श्रेष्ठ कहानियां


वह अपनी सब बहनों से अधिक रूपवती और गुणवती थी । इससे ठाकुर भूपसिंह उसे बहुत प्यार करते थे । सुन्दर संतान को कदाचित् उसके माता - पिता भी अधिक चाहते हैं । ठाकुर साहब बड़े धर्म - संकट में थे कि इसका विवाह कहां करें ? न तो यही चाहते थे कि ऋण का बोझ बढे और न यही स्वीकार था कि उसे अपने को भाग्यहीन समझना पड़े । एक दिन श्रीकंठ उनके पास किसी चंदे का रुपया मांगने आये । शायद नागरी प्रचार का चंदा था । भूपसिंह उनके स्वभाव पर रीझ गये और धूमधाम से श्रीकंठ सिंह का आनंदी के साथ ब्याह हो गया । 

 आनंदी अपने नये घर में आयी , तो यहां का रंग - ढंग कुछ और ही देखा । जिस टीम टाम की उसे बचपन से ही आदत पड़ी हुई थी , वह यहां नाम मात्र को भी न थी । हाथी घोड़ों का तो कहना ही क्या , कोई सजी हुई सुंदर बहली तक न थी । रेशमी स्लीपर साथ लायी थी ; पर यहां बाग कहां । मकान में खिड़कियां तक न थीं , न जमीन पर फर्श , न दीवार पर तस्वीरें । यह एक सीधा - सादा देहाती गृहस्थ का मकान था ; किन्तु आनंदी ने थोड़े ही दिनों में अपने को इस नयी अवस्था में ऐसा अनुकूल बना लिया , मानो उसने विलास के सामान कभी देखे ही न थे । 

एक दिन दोपहर के समय लालबिहारी सिंह दो चिड़िया लिये हुए आया और भावज से बोला- जल्दी से पका दो , मुझे भूख लगी है । आनंदी भोजन बना कर उसकी राह देख रही थी । अब वह नया व्यंजन बनाने बैठी । हांडी में देखा , तो घी पाव - भर से अधिक न था । बड़े घर की बेटी , किफायत क्या जाने । उसने सब घी मांस में डाल दिया । लालबिहारी खाने बैठा , तो दाल में घी न था , बोला दाल में घी क्यों नहीं छोड़ा ? 

 आनंदी ने कहा - घी सब मांस में पड़ गया । लालबिहारी जोर से बोला- अभी परसों घी आया है । इतना जल्द उठ गया ? 

आनंदी ने उत्तर दिया- आज तो कुल पाव - भर रहा होगा । वह सब मैंने मांस में डाल दिया । 

जिस तरह सूखी लकड़ी जल्दी से जल उठती है उसी तरह क्षुधा से बावला मनुष्य जरा जरा सी बात पर तिनक जाता है । लालबिहारी को भावज की यह ढिठाई बहुत बुरी मालूम हुई , तिनक कर बोला- मैके में तो चाहे घी की नदी बहती हो ! 

 स्त्री गालियां सह लेती है , मार भी सह लेती है ; पर मैके की निंदा उनसे नहीं सही जाती । आनंदी मुंह फेर कर बोली- हाथी मरा भी , तो नौ लाख का । वहां इतना घी नित्य नाई - कहार खा जाते हैं ।

लालबिहारी जल गया , थाली उठाकर पलट दी , और बोला - जी चाहता है , जीभ पकड़ कर खींच लूं । 

आनंदी को भी क्रोध आ गया । मुंह लाल हो गया , बोली- वह होते तो आज इसका मजा चखाते । 

अब अपढ़ उजड्ड ठाकुर से न रहा गया । उसकी स्त्री एक साधारण जर्मंदार की बेटी थी । 

जब जी चाहता , उस पर हाथ साफ कर लिया करता था । खड़ाऊं उठाकर आनंदी की ओर जोर से फेंकी , और बोला- जिसके गुमान पर भूली हुई हो , उसे भी देखूंगा और तुम्हें भी । 

 आनंदी ने हाथ से खड़ाऊं रोकी , सिर बच गया ; पर उंगली में बड़ी चोट आयी । क्रोध के मारे हवा में हिलते पत्ते की भांति कांपती हुई अपने कमरे में आकर खड़ी हो गयी । स्त्री का बल और साहस , मान और मर्यादा पति तक है । उसे अपने पति के ही बल और पुरुषत्व का घमंड होता है । आनंदी खून का घूंट पी कर रह गयी । 

श्रीकंठ सिंह शनिवार को घर आया करते थे बृहस्पति को यह घटना हुई थी । दो दिन तक आनंदी कोप - भवन में रही । न कुछ खाया न पिया , उनकी बाट देखती रही । अंत में शनिवार को वह नियमानुकूल संध्या समय घर आये और आकर बैठ कर कुछ इधर उधर की बातें , कुछ देश - काल संबंधी समाचार तथा कुछ नये मुकदमों आदि की चर्चा करने लगे । यह वार्तालाप दस बजे रात तक होता रहा । गांव के भद्र पुरुषों को इन बातों में ऐसा आनंद मिलता था कि खाने - पीने की भी सुधि न रहती थी । श्रीकंठ को पिंड छुड़ाना मुश्किल हो जाता था । ये दो - तीन घंटे आनंदी ने बड़े कष्ट से काटे ! किसी तरह भोजन का समय आया । पंचायत उठी । एकांत हुआ , तो लालबिहारी ने कहा- भैया , आप जरा भाभी को समझा दीजिएगा कि मुंह संभाल कर बातचीत किया करें , नहीं तो एक दिन अनर्थ हो जाएगा । 

बेनीमाधव सिंह ने बेटे की ओर से साक्षी दी- हां , बहू - बेटियों का यह स्वभाव अच्छा नहीं कि मर्दों के मुंह लगें । 

लालबिहारी - वह बड़े घर की बेटी हैं , तो हम भी कोई कुर्मी - कहार नहीं हैं । श्रीकठ ने चिंतित स्वर से पूछा- आखिर बात क्या हुई ? 

लालबिहारी ने कहा- कुछ भी नहीं ; यों ही आप ही आप उलझ पड़ीं । मैके के सामने हम लोगों को कुछ समझती ही नहीं । 

श्रीकंठ खा - पीकर आनंदी के पास गये । वह भरी बैठी थी । यह हजरत भी कुछ तीखे थे । आनंदी ने पूछा- चित्त तो प्रसन्न है ।

श्रीकंठ बोले — बहुत प्रसन्न है ; पर तुमने आजकल घर में यह क्या उपद्रव मचा रखा? 

आनंदी की त्योरियों पर बल पड़ गये , झुंझलाहट के मारे बदन में ज्वाला सी दहक उठी । बोली- जिसने तुमसे यह आग लगायी है , उसे पाऊं , मुंह झुलस दूं । 

श्रीकंठ- इतनी गरम क्यों होती हो , बात तो कहो । 

आनंदी- क्या कहूं , यह मेरे भाग्य का फेर है ! नहीं तो गंवार छोकरा , जिसको चपरासीगिरी करने का भी शऊर नहीं , मुझे खड़ाऊं से मार कर यों न अकड़ता ।

श्रीकंठ- सब हाल साफ - साफ कहो , तो मालूम हो । मुझे तो कुछ पता नहीं । 

 आनंदी - परसों तुम्हारे लाडले भाई ने मुझसे मांस पकाने को कहा । घी हांडी में पाव भर से अधिक न था । वह सब मैंने मांस में डाल दिया । जब खाने बैठा तो कहने लगा दाल मे घी क्यों नहीं है ? बस , इसी पर मैके को बुरा - भला कहने लगा । मुझसे न रहा गया । मैंने कहा कि वहां इतना घी तो नाई - कहार खा जाते हैं , और किसी को जान भी नहीं पड़ता । बस इतनी सी बात पर इस अन्यायी ने मुझ पर खड़ाऊं फेंक मारी । यदि हाथ से न रोक लूं . तो सिर फट जाय । उसी से पूछो , मैंने जो कुछ कहा है , वह सच है या झूठ । 

श्रीकंठ की आंखें लाल हो गयीं । बोले - यहां तक हो गया , इस छोकरे का यह साहस । 

 आनंदी स्त्रियों के स्वभावानुसार रोने लगी ; क्योंकि आंसू उनकी पलकों पर रहते हैं । श्रीकंठ बड़े धैर्यवान् और शांत पुरुष थे । उन्हें कदाचित् ही कभी क्रोध आता था ; स्त्रियों के आंसू पुरुष की क्रोधाग्नि भड़काने में तेल का काम देते हैं । रात भर करवटें बदलते रहे । उद्विग्नता के कारण पलक तक नहीं झपकी । प्रातःकाल अपने बाप के पास जाकर बोले दादा , अब इस घर में मेरा निबाह न होगा । 

इस तरह की विद्रोह - पूर्ण बातें कहने पर श्रीकंठ ने कितनी ही बार अपने कई मित्रों को आड़े हाथों लिया था ; परन्तु दुर्भाग्य , आज उन्हें स्वयं वे ही बातें अपने मुंह से कहनी पड़ीं । दूसरों को उपदेश देना भी कितना सहज है !

बेनी माधव सिंह घबरा उठे और बोले- क्यों ? 

श्रीकंठ - इसलिए कि मुझे भी अपनी मान - प्रतिष्ठा का कुछ विचार है । आपके घर में अब अन्याय और हठ का प्रकोप हो रहा है । जिनको बड़ों का आदर - सम्मान करना चाहिए , वे उनके सिर चढ़ते हैं । मैं दूसरे का नौकर ठहरा , घर पर रहता नहीं । यहां मेरे पीछे स्त्रियों पर खड़ाऊं और जूतों की बौछारें होती हैं । कड़ी बात तक चिन्ता नहीं । कोई एक की दो कह ले , वहां तक मैं सह सकता हूं किन्तु यह कदापि नहीं हो सकता कि मेरे ऊपर लात घूंसे पड़ें और मैं दम न मारूं । 

बेनीमाधव सिंह कुछ जवाब न दे सके । श्रीकंठ सदैव उनका आदर करते थे । उनके ऐसे तेवर देखकर एक बूढ़ा ठाकुर अवाक् रह गया । केवल इतना ही बोला- बेटा , तुम बुद्धिमान हो कर ऐसी बातें करते हो ? स्त्रियां इस तरह घर का नाश कर देती हैं । उनको बहुत सिर चढ़ाना अच्छा नहीं । 

श्रीकंठ - इतना मैं जानता हूं , आपके आशीर्वाद से ऐसा मूर्ख नहीं हूं । आप स्वयं जानते हैं कि मेरे ही समझाने - बुझाने से , इसी गांव में कई घर संभल गये । पर जिस स्त्री की मान प्रतिष्ठा का ईश्वर के दरबार में उत्तरदाता हूं , उसके प्रति ऐसा घोर अन्याय और पशुवत् व्यवहार मुझे असह्य है । आप सच मानिए , मेरे लिए यही कुछ कम नहीं है कि लालबिहारी को कुछ दंड नहीं देता । 

अब बेनीमाधव सिंह भी गरमाये । ऐसी बातें और न सुन सके । बोले - लालबिहारी तुम्हारा भाई है । उससे जब कभी भूल - चूक हो , उसके कान पकड़ो लेकिन ..... । 

श्रीकंठ- लालबिहारी को मैं अपना भाई नहीं समझता । 

बेनीमाधव सिंह- स्त्री के पीछे ?

श्रीकंठ जी नहीं , उसकी क्रूरता और अविवेक के कारण । 

 दोनों कुछ देर चुप रहे । ठाकुर साहब लड़के का क्रोध शांत करना चाहते थे , लेकिन यह नहीं स्वीकार करना चाहते थे कि लालबिहारी ने कोई अनुचित काम किया है । इसी बीच में गांव के और कई सज्जन हुक्के चिलम के बहाने वहां आ बैठे । कई स्त्रियों ने जब यह सुना कि श्रीकंठ पत्नी के पीछे पिता से लड़ने को तैयार हैं , तो उन्हें बड़ा हर्ष हुआ । दोनों पक्षों की मधुर वाणियां सुनने के लिए उनकी आत्माएं तिलमिलाने लगीं । गांव में कुछ ऐसे कुटिल मनुष्य भी थे , जो इस कुल की नीतिपूर्ण गति पर मन ही मन जलते थे । वह कहा करते थे- श्रीकंठ अपने बाप से दबता है , इसलिए वह दब्बू है । उसने विद्या पढ़ी , इसलिए वह किताबों का कीड़ा है । 

बेनीमाधव सिंह उसकी सलाह के बिना कोई काम नहीं करते , यह उनकी मूर्खता है । इन महानुभावों की शुभकामनाएं आज पूरी होती दिखायी दीं । कोई हुक्का पीने के बहाने और कोई लगान की रसीद दिखाने आ कर बैठ गया । बेनीमाधव सिंह • पुराने आदमी थे । इन भावों को ताड़ गये । उन्होंने निश्चय किया चाहे कुछ क्यों न हो , इन द्रोहियों को ताली बजाने का अवसर न दूंगा । तुरन्त कोमल शब्दों में बोले- बेटा , मैं तुमसे बाहर नहीं हूं । तुम्हारा जो जी चाहे करो , अब तो लड़के से अपराध हो गया ।

 इलाहाबाद का अनुभव - रहित झल्लाया हुआ ग्रेजुएट इस बात को न समझ सका । उसे डिबेटिंग क्लब में अपनी बात पर अड़ने की आदत थी , इन हथकंडों की उसे क्या खबर ? बाप ने जिस मतलब से बात पलटी थी , वह उसकी समझ में न आया । बोला- लालबिहारी के साथ अब इस घर में नहीं रह सकता । 

बेनीमाधव- बेटा , बुद्धिमान लोग मूर्खों की बात पर ध्यान नहीं देते । वह बेसमझ लड़का है । उससे जो कुछ भूल हुई , उसे तुम बड़े हो कर क्षमा करो । 

श्रीकंठ- उसकी इस दुष्टता को मैं कदापि नहीं सह सकता । या तो वही घर में रहेगा , या मैं ही । आपको यदि वह अधिक प्यारा है , तो मुझे विदा कीजिए , मैं अपना भार आप संभाल लूंगा । यदि मुझे रखना चाहते हैं तो उससे कहिए , जहां चाहे चला जाये । बस यह मेरा अंतिम निश्चय है ।

 लालबिहारी सिंह दरवाजे की चौखट पर चुपचाप खड़ा बड़े भाई की बातें सुन रहा था । वह उनका बहुत आदर करता था । उसे कभी इतना साहस न हुआ था कि श्रीकंठ के सामने चारपाई पर बैठ जाय , हुक्का पी ले या पान खा ले । बाप का भी वह इतना मान न करता था । श्रीकंठ का भी उस पर हार्दिक स्नेह था । अपने होश में उन्होंने कभी उसे घुड़का तक न था । जब वह इलाहाबाद से आते , तो उसके लिए कोई न कोई वस्तु अवश्य लाते । मुगदर की जोड़ी उन्होंने ही बनवा दी थी । 

पिछले साल जब उसने अपने से ड्यौढ़े जवान को नागपंचमी के दिन दंगल में पछाड़ दिया , तो उन्होंने पुलकित होकर अखाड़े में ही जाकर उसे गले से लगा लिया था , पांच रुपये के पैसे लुटाये थे । ऐसे भाई के मुंह से आज ऐसी हृदय विदारक बात सुन कर लालबिहारी को बड़ी ग्लानि हुई । वह फूट - फूट कर रोने लगा । इसमें संदेह नहीं कि अपने किये पर पछता रहा था । भाई के आने से एक दिन पहले से उसकी छाती धड़कती थी कि देखूं भैया क्या कहते हैं । मैं उनके सम्मुख कैसे जाऊंगा , उनसे कैसे बोलूंगा , मेरी आंखें उनके सामने कैसे उठेंगी । उसने समझा था कि भैया मुझे बुला कर समझा देंगे । 

 इस आशा के विपरीत आज उसने उन्हें निर्दयता की मूर्ति बने हुए पाया । वह मूर्ख था । परन्तु उसका मन कहता था कि भैया मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं । यदि श्रीकंठ उसे अकेले में बुला कर दो - चार बातें कह देते ; इतना ही नहीं दो - चार तमाचे भी लगा देते तो कदाचित् उसे इतना दुःख न होता ; पर भाई का यह कहना कि अब मैं इसकी सूरत नहीं देखना चाहता , लालबिहारी से सहा न गया । वह रोता हुआ घर आया । कोठरी में जा कर कपड़े पहने , आंखें पौंछी , जिससे कोई यह न समझे कि रोता था । तब आनंदी के द्वार पर आकर बोला - भाभी , भैया ने निश्चय किया है कि वह मेरे साथ इस घर में न रहेंगे । अब वह मेरा मुंह नहीं देखना चाहते ; इसलिए अब मैं जाता हूं । उन्हें फिर मुंह न दिखाऊंगा ! मुझसे जो कुछ अपराध हुआ , उसे क्षमा करना । 

यह कहते - कहते लालबिहारी का गला भर गया । 

जिस समय लालबिहारी सिंह सिर झुकाये आनंदी के द्वार पर खड़ा था उसी समय श्रीकंठ सिंह आंखें लाल किये बाहर से आये । भाई को खड़ा देखा , तो घृणा से आंखें फेर लीं , और कतरा कर निकल गये । मानो उसकी परछाहीं से दूर भागते हों ।

आनंदी ने लालबिहारी की शिकायत तो की थी , लेकिन अब मन में पछता रही थी वह स्वभाव से ही दयावती थी । उसे इसका तनिक भी ध्यान न था कि बात इतनी बढ़ जायगी । वह मन में अपने पति पर झुंझला रही थी कि यह इतने गरम क्यों होते हैं । उस पर यह भय भी लगा हुआ था कि कहीं मुझसे इलाहाबाद चलने को कहें , तो कैसे क्या करूंगी । इस बीच में जब उसने लालबिहारी को दरवाजे पर खड़े यह कहते सुना कि अब मैं जाता हूं , मुझसे जो कुछ अपराध हुआ , क्षमा करना , तो उसका रहा - सहा क्रोध भी पानी हो गया । वह रोने लगी । मन का मैल धोने के लिए नयन - जल से उपयुक्त और कोई वस्तु नहीं है । 

श्रीकंठ को देखकर आनंदी ने कहा- लाला बाहर खड़े बहुत रो रहे हैं । 

श्रीकंठ- तो मैं क्या करूं ? 

आनंदी - भीतर बुला लो । मेर जीभ में आग लगे ! मैंने कहां से यह झगड़ा उठाया । 

श्रीकंठ - मैं न बुलाऊंगा । 

आनंदी - पछताओगे । उन्हें बहुत ग्लानि हो गयी है , ऐसा न हो , कहीं चल दें । 

श्रीकंठ न उठे । इतने में लालबिहारी ने फिर कहा- भाभी , भैया से मेरा प्रणाम कह दो । वह मेरा मुंह नहीं देखना चाहते ; इसलिए मैं भी अपना मुंह उन्हें न दिखाऊंगा । 

लालबिहारी इतना कह कर लौट पड़ा , और शीघ्रता से दरवाजे की ओर बढ़ा । अंत में आनंदी कमरे से निकली और हाथ पकड़ लिया । लालबिहारी ने पीछे फिर कर देखा और आंखों में आंसू भरे बोला- मुझे जाने दो । 

आनंदी - कहां जाते हो ? 

लालबिहारी - जहां कोई मेरा मुंह न देखे । 

आनंदी- मैं न जाने दूंगी ? 

लालबिहारी- मैं तुम लोगों के साथ रहने योग्य नहीं हूं । आनंदी- तुम्हें मेरी सौगंध , अब एक पग भी आगे न बढ़ना ।

लालबिहारी -जब तक मुझे यह मालूम न हो जाय कि भैया का मन मेरी तरफ से साफ हो गया तब तक मैं इस घर में कदापि न रहूंगा । 

आनंदी - मैं ईश्वर को साक्षी दे कर कहती हूं कि तुम्हारी ओर से मेरे मन में तनिक भी मैल नहीं है । - 

अब श्रीकंठ का हृदय भी पिघला । उन्होंने बाहर आकर लालबिहारी को गले लगा लिया । दोनों भाई खूब फूट - फूटकर रोये । लालबिहारी ने सिसकते हुए कहा- भैया , अब कभी मत कहना कि तुम्हारा मुंह न देखूंगा । इसके सिवा आप जो दंड देंगे , मैं सहर्ष स्वीकार करूंगा । 

श्रीकंठ ने कांपते हुए स्वर में कहा - लल्लू ! इन बातों को बिलकुल भूल जाओ । ईश्वर चाहेगा , तो फिर ऐसा अवसर न आवेगा । 

बेनीमाधव सिंह बाहर से आ रहे थे । दोनों भाइयों को गले मिलते देख कर आनंद से पुलकित हो गये । बोल उठे - बड़े घर की बेटियां ऐसी ही होती हैं । बिगड़ता हुआ काम बना लेती हैं । 

गांव में जिसने वृत्तांत सुना , उसी ने इन शब्दों में आनंदी की उदारता को सराहा- 'बड़े चर की बेटियां ऐसी ही होती हैं । '

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