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पॉजिटिव खबर:अच्छे स्वास्थ्य को मुहिम बना रहीं एनजीओ से जुड़ी सुमित्रा

सोमवार, जुलाई 26 | जुलाई 26, 2021 WIB Last Updated 2021-09-24T18:42:25Z

पॉजिटिव खबर अच्छे स्वास्थ्य को मुहिम बना रहीं एनजीओ (ngo) से जुड़ी सुमित्रा, गांवों में मेंटल हेल्थ (mental health) पर फोकस , 36 हजार से ज्यादा महिलाओं का जीवन बदला


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फोटो स्रोत फेसबुक Sumitra Gagarai

पॉजिटिव खबर:अच्छे स्वास्थ्य को मुहिम बना रहीं एनजीओ से जुड़ी सुमित्रा

झारखंड न्यूज़:- नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि झारखंड में डायन समझकर महिलाओं के साथ अत्याचार और उन्हें जान से मारने के मामले बढ़े हैं । स्थानीय भाषा में इसे डायन बिसाही कहते हैं । 

नीति आयोग की मानें तो स्वास्थ्य के मामले में स्थिति में सुधार हुआ है , लेकिन हालात फिर ही खराब हैं । हालांकि शिशु मृत्यु दर ( आईएमआर ) में सुधार हुआ है । प्रति एक हजार बच्चों पर 44 बच्चों की मौत से घटकर यह 29 पर आ गई है ।

झारखंड के सुदूर जनजातीय अंचलों में काम कर रहीं  Sumitra gagarai बताती हैं कि हालात सुधरे हैं , पर अभी बहुत काम करने की जरूरत है । झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में रहने वाली सुमित्रा महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर लंबे समय से काम कर रही हैं । 

पिछले 12 सालों से वह स्वास्थ्य के साथ - साथ महिलाओं - बच्चों के पोषण , हिंसा और शिशु मृत्यु दर कम करने की दिशा में काम कर रही हैं । सुमित्रा सुदूर गांवों में अच्छे स्वास्थ्य को संस्कृति बनाने के मिशन पर हैं । वह अब तक 36 हजार से ज्यादा महिलाओं का जीवन बदल चुकी हैं । 

स्थानीय एनजीओ ' एकजुट(ekjut india)' में कॉर्डिनेटर सुमित्रा स्व - सहायता समूहों और महिलाओं के बीच सेतु का काम करती हैं । मेंटल हेल्थ पर काम करने के लिए 2020 में उन्हें कंफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री सीआईआई ) फाउंडेशन ने हेल्थ श्रेणी के वुमन एक्जेम्प्लर अवॉर्ड से सम्मानित किया था ।

31 साल की सुमित्रा झारखंड की ' हो ' जनजाति से आती हैं । खुद भी गरीबी में जीवन बीता । सुमित्रा बताती हैं कि 16 साल की उनकी बहन मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थी । इलाज हुआ , लेकिन जागरूकता के अभाव में घर से सहयोग नहीं मिला । 

उनकी बहन ने डिप्रेशन में आकर ट्रेन के सामने कूदकर आत्महत्या कर ली थी । उस घटना के बाद उनका जीवन बदल गया । सुमित्रा कहती हैं कि झारखंड के ग्रामीण इलाकों में आज भी अंधविश्वास बहुत ज्यादा है । महिलाएं तीन - तीन दिन तक प्रसव पीड़ा झेलती रहती हैं । 

हर चीज का इलाज झाड़ - फूंक में पहले ढूंढा जाता है । इस सबको बदलने के लिए सुमित्रा झारखंड के दर्जनों गावों में घूम - घूमकर नुक्ककड़ नाटक , कहानी के माध्यम से महिलाओं को जागरूक कर रही हैं । वह महिलाओं को खेल - खेल में अपनी समस्याएं बताने के लिए प्रेरित करती हैं ।

इनके एकजुट ' काम की लांसेट में भी तारीफ 

सुमित्रा बताती हैं कि झारखंड में अंधविश्वास के चलते बच्चों के जन्म के बाद गर्भनाल काटने को लेकर कई कुरीतियां थीं । साफ - सफाई का भी ध्यान नहीं रखा जाता था । 

इसलिए नवजात बच्चों की मृत्यु दर ( नियोनैटेल ) बहुत ज्यादा थी । इसके बाद सुमित्रा और अन्य साथियों ने महिलाओं को खेल - खेल के माध्यम से जागरूक करना शुरू किया । एकजुट संस्था के जागरूकता मॉडल का जिक्र विख्यात मेडिकल जर्नल लांसेट(lancet journal) में भी किया गया था । 

एकजुट के प्रयासों से यहां नवजात मृत्यु दर में 45 फीसदी तक की कमी आई है । इसके अलावा महिलाओं के प्रति हिंसा में कमी के साथ पोषण को लेकर भी जागरूकता आई है । 

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