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यमकेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास कथा विशेषता पौराणिक महत्व लोकेशन

यमकेश्वर महादेव मंदिर(Yamkeshwar Mahadev Temple ):- यमकेश्वर महादेव मंदिर भारतवर्ष के देवभूमि उत्तराखण्ड के पोड़ी गढ़वाल जिले के यमकेस्वर ब्लॉक में
Santosh Kukreti

 Yamkeshwar Mahadev Temple:- यमकेश्वर महादेव मंदिर भारतवर्ष के देवभूमि उत्तराखण्ड में पोड़ी गढ़वाल जिले के यमकेस्वर ब्लॉक में स्थित है। इस अतिप्राचीन और विशेषता से भरे Yamkeshwar Mahadev Temple का अपना ही एक पौराणिक महत्त्व है,पुरे भारत और विश्व में यह एक मात्र ऐसा Temple है जहाँ भगवान से पहले प्राणहरता यमराज का नाम लिया जाता है। 

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यमकेश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड राज्य के Pauri Garhwal जिले के दो द्वार कोटद्वार और हरिद्वार के मध्य स्थित है। यह शिव मंदिर ऋषिकेश,लक्ष्मण झूला कोटद्वार मार्ग पर स्थित है। कोटद्वार से Yamkeshwar Mahadev Temple की दुरी 75.3 km है,जबकि हरिद्वार से दुरी 76.4km और ऋषिकेश से दुरी क्रमशः 53.4 km है। 

यह मंदिर उत्तरखंड के चारधाम मार्ग से दूर होने के कारण भी यमकेश्वर मंदिर जनमानस के प्रकाश में नहीं आ पाया। इस मंदिर के सम्बन्ध में कुछ पौराणिक और सात्विक कथाएं प्रचलित है। जिसमें मार्कण्ड ऋषि कि मृत्यु पर विजय की कथा जनमानस में काफी प्रचलित है, तो आइये जानते है -यमकेश्वर महादेव मंदिर(Yamkeshwar Mahadev Temple )का इतिहास,कथा,विशेषता ,पौराणिक महत्व

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यमकेश्वर महादेव मंदिर इतिहास,कथा,विशेषता ,पौराणिक महत्व ,लोकेशन 

यमकेस्वर महादेव मंदिर के निकट का टीला जो की पीपल के पत्ते के स्वरुप भी एक प्राकृतिक शिवलिंग के समान है,जिसके चारों और जल बहता है। कुछ जनमानस इसे यमद्वीप के नाम से भी पुकारते है। ब्रह्मा जी के पुत्र कृतु ऋषि तथा कर्दम ऋषि के पुत्री का मृगश्रृंग नामक पुत्र का जन्म हुआ। मृगश्रृंग ऋषि का सुवृता नामक स्त्री से विवाह संपन्न हुआ। मृगश्रृंग और सुवृता के घर एक पुत्र ने जन्म लिया जिसका नाम मृकण्डु रखा गया। मृकण्डु ऋषि समस्त गुणों से परिपर्ण थे,पिता मृगश्रृंग ऋषि की आज्ञा अनुसार मृकण्डु ने मृदगल मुनि की पुत्री मरुद्वती से विवाह कर लिया। 

विवाह के कई वर्ष बीत जाने के बाद जब मृकण्डु ऋषि और मरुद्वती के घर कोई संतान प्राप्त नहीं हुआ तो उन्होंने काशी जाकर पत्नी सहित भगवान शिवशंकर की तपस्या की ,उन दोनों की तपस्या से प्रश्नन होकर भगवान शिव ने कहा -

"है वत्स में तुम्हारी आराधना से प्रसन्न हुआ हूँ बोलो क्या वर मांगते हो ?"

तब ऋषि मृकण्डु ने कहा -"है प्रभु विवाह के काफी वर्ष बाद भी हमारी गोद सुनी है अतः आप हमें पुत्ररत्न देने की कृपा करें '

भगवान् शिव कहते है- "है मुनि तुम्हे गुणरहित संतान के रूप में पुत्र चाहिए या,सोलह वर्ष की आयु वाला तेजस्वी व् गुणवान पुत्र। "

इस पर मुनि प्रभु से गुणवान पुत्र का वरदान मांगते है। 

कुछ समय पश्चात मरुद्वती गर्भ धारण करती है और उनकेघर एक तेजस्वी पुत्र जा जन्म होता है जिसका नाम "मार्कण्डये " नाम रखा गया। 

मृकण्डु के तेजस्वी पुत्र मार्कण्ड के सोलहवें वर्ष के प्रारम्भ होने पर मुनि मृकण्डु का हृदय शोक से भर उठा, सम्पूर्ण इन्द्रियों में व्याकुलता छा गयी, वे शोक से विलाप करने लगे। पिता को अत्यंत दुखी और करुण विलाप करते देख मार्कण्डेय ऋषि ने उनसे शोक-मोह का कारण पूछा। मृकण्डु  ने अपने दुखी मन का कारण बताया और कहा कि पुत्र, भगवान शिव ने तुम्हे केवल सोलह वर्ष की आयु प्रदान की हुई है। उसकी समाप्ति का समय आ पंहुचा है,अतः जिसके कारण मेरे तन-मन में शोक की लहर दौड़ रही है। 

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यमकेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास कथा विशेषता पौराणिक महत्व लोकेशन

मार्कण्डेय ऋषि ने पिता की बात सुनने के बाद कहा की आप चिंता मत करिये, में अपनी मृत्यु को टालने के किये भगवान् शंकर की आराधना करूँगा और अमरत्व प्रदान करूँगा। तब मार्कण्डेय ऋषि ने यमकेश्वर मणिकूट पर्वत के निकट जहाँ सतरुद्रा नदी उद्गम स्थल( जिसे वर्तमान में बीन नदी के नाम से जाना जाता है )है पीपल के वृक्ष के निचे बालू का शिवलिंग बना कर महामृत्युंजय मन्त्र का जाप करना शुरू किया। 

मार्कण्डेय ऋषि की मृत्युतिथि आने पर यमराज यानि काल वहां पर आये और बल पूर्वक मुनि के प्राण हरने लगे। महर्षि ने यम से कुछ समय माँगा क्योकि वह शिव आराधना कर रहे थे और जब तक उनकी आराधना पूरी नहीं हो जाती तब तक काल प्रतीक्षा करें। राहु द्वारा चन्द्रमा ग्रसन की भांति गर्जन करते हुए काल ने मार्कण्डेय को हठपूर्वक ग्रसना आरम्भ किया।

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मार्कण्डेय ऋषि शिवलिंग से लिपट गए। उसी समय परमेश्वर शिव उस लिंग से सहसा प्रकट हो गये और हुंकार भर कर प्रचंड गर्जना करते हुऐ तुरंत ही यमराज के वक्ष स्थल पर लात मारी। मृत्युदेव उनके चरण प्रहार से भयभीत हो कर दूर जा पड़े। यम के रार (झगड़ा )होने के कारण ही इस स्थान का नाम यमरार पड़ा। जो कालन्तर में यमराड़ी नाम से प्रशिद्ध हो गया। 

बाद में यमराज ने वर्तमान यमकेश्वर नाम स्थान में आकर भगवान् रूद्र की आराधना आरम्भ कर दी। तब जाकर भगवान् भोलेनाथ यमकेस्वर नाम के स्थान में आकर प्रश्नन हो गये और यमराज से बोले की जहाँ मेरा मृत्युंजय जप होता हो,उस स्थान पर तुम्हे नहीं जाना चाहिए। अंत में यमराज की स्तुति से खुश होकर शिव ने कहा की जिस स्थान पर तुम खड़े हो उस स्थान पर मेरी स्वयंभू लिंग रूपी मूर्ति उत्पन्न हुई है उसका तुम पूजन-अर्चन करों। 

यमकेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास कथा विशेषता पौराणिक महत्व लोकेशन

यह मूर्ति तुम्हारे ही नाम से प्रशिद्ध होगी। इस शिवलिंग का जो पूजन करेगा वह बड़ी से बड़ी अपमृत्यु एवं अकाल मृत्यु को टाल देगा। पुराणोक्त मार्कण्डेय की तप स्थली एवं यमराज द्वारा स्थापित शिव का मंदिर वर्तमान यमकेस्वर में स्थित है जो आज यमकेश्वर महादेव मंदिर(Yamkeshwar Mahadev Temple ) के नाम से विख्यात है। 

यह मंदिर अपनी प्राकृतिक सौन्दर्यता के लिए प्रशिद्ध है ,मंदिर प्रांगण के समीप ही  सतरुद्रा नदी(बीन नदी )की कल-कल धारा प्रवाहित होती रहती है। यमकेश्वर मंदिर अपने चारों और से सुन्दर पहाडों से घिरा हुआ है ,इन पहाड़ो में कई गाँव बसे हुए है जिनकी श्रद्धा का अमुक केंद यह यमकेस्वर मंदिर बना हुआ है। 

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क्षेत्र में लोकोक्तियों के अनुसार यमकेश्वर मंदिर के समीप कांडा नामक गांव है ,उसी गांव की एक बूढी औरत ने सर्वप्रथम इस मंदिर के शिवलिंग के दर्शन किये थे। उस समय मंदिर क्षेत्र के आस-पास वन व् झाड़ियों की अधिकता थी ,उक्त ग्रामीण महिला द्वारा कंदमूल खोजने के लिए जैसे ही कुदाली (खुदाई करने का एक यंत्र ) द्वारा जैसे ही खोदना शुरू किया उस स्थान पर कुदाली की चोट से पत्थर से दूध निकलने लगा। 

भगवान यमकेस्वर ने दर्शन दिए और वर माँगने को कहा वह बूढी औरत घबरा गई और वरदान में कंदमूल और धन धान्य से भरपूर वर माँगा, घर जाकर जब कंदमूल और धन धान्य से भरा घर देखा तो पुरे गांव को इस विषय में सुचना दी। और तब उक्त Yamkeshwar Mahadev Temple का निर्माण किया गया और तब से यह स्थान लोगों के आस्था का केंद्र बना हुआ है। 

यमकेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास कथा विशेषता पौराणिक महत्व लोकेशन

यमकेश्वर महादेव काली मंदिर 

यमकेश्वर महादेव मंदिर के पास ही माता काली का भी मंदिर है। यह मंदिर अति प्राचीन नहीं है ,इस मंदिर के निर्माण की एक आश्चर्यचकित करने वाली एक बहुत ही रोचक और सात्विक कहानी प्रचलित है जो इस प्रकार है -यमकेश्वर महादेव मंदिर में किसी समय एक सिद्ध तांत्रिक बाबा जोगेंदर गिरी महाराज आये। उनकी सिद्धि और भक्ति से स्थानीय लोग काफी प्रभावित हुए थे। उन्ही में से कुछ लोग उनकी तांत्रिक शक्ति का प्रदर्शन देखना चाहते थे ,और उन्होंने बाबा से कहा की अगर आप में शक्ति है तो यहाँ मंदिर परिसर में माँ काली का आवाहन और स्थापन करें। 

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बाबा इस आवाहन के लिए तैयार हो गए और गांव के कुछ निर्भीक लोगों को साथ जुड़ने को कहा और बोले की जब तक ये अनुष्ठान पूरा न हो कोई अपनी जगह से नहीं हिलेगा ,और जिन चीजों को में माँ काली के लिए अर्पण करने के लिए मांगू वह मिलती रहे। बाबा ने आराधना आरम्भ कर दी। काली जप का सुमरण करने लगे।  

कुछ समय पश्चात वहां का वातावरण भयंकर अठाहस और रौद्र रूप लिए सहन न किये जाने वाली किलकारियों से गूंजने लगा। सभी लोग यह सब देख कर दर गए और वहां से भाग निकले ,कुछ समय पश्चात माता काली क रौद्रस्वरूप बाबा जोगेंदर को दर्शन दिए ,बाबा ने अपने समीप रखे सभी वस्तुओं को माता को अर्पण किया।

जब सभी भोजन सामग्री समाप्त हो गयी तो बाबा ने अपने शरीर का मांश ही माता काली को अर्पण कर दिया जिससे माता काली अति प्र्शन हुई और बाबा से वर मांगने को कहा, बाबा ने कहा आपके दर्शं=दर्शन हो गए यही मेरे लिए बहुत है परन्तु माता अगर आप मेरे से प्र्शन्न है तो मेरी एक विनती है की आप इस स्थान पर प्रतिष्ठित हो जाइये। और आज उस स्थान पर माता काली का एक मंदिर स्थापित है। 

How to Reach Yamkeshwar Mahadev Temple -

यमकेश्वर महादेव मंदिर जाने के लिए आप मुख्य रूप से सड़क मार्ग का ही प्रयोग करके पंहुचा जा सकता है। यह मंदिर उत्तराखंड राज्य के पौड़ी गढ़वाल जिले यमकेश्वर ब्लॉक में पड़ता है। जो की ऋषिकेश लक्ष्मण झूला( कांडी -लक्ष्मण झूला ) वाया कोटद्वार राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ा हुआ है।

यमकेश्वर महादेव मंदिर के लिए ( Nearest place to visit )-

नीलकंठ महादेव मंदिर - 28.5 km 

हरिद्वार से दुरी - 76.4km

ऋषिकेश से दुरी - 53.4 km

देहरादून से दुरी - 90.3 km 

कोटद्वार से दुरी - 75.3 km

लैंसडौन से दुरी - 81 km 

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