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हिन्दू समाज के सामने चुनौतियाँ पर निबंध

हिन्दू समाज के सामने चुनौतियाँ पर निबंध | हिन्दू समाज के सामने चुनौतियाँ पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ( RSS) के विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ( RSS) का
Santosh Kukreti

इस पोस्ट में है वर्तमान परिस्थिति के अनुसार हिन्दू समाज के सामने चुनौतियाँ पर निबंध लाये है ,तथा इस विषय पर राष्ट्रीय स्वयमसंघ के क्या विचार है वह भी प्रस्तुत किये गए है तो आइये जानते है - हिन्दू समाज के सामने चुनौतियाँ पर निबंध | हिन्दू समाज के सामने चुनौतियाँ पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ( RSS) के विचार 

हिन्दू समाज के सामने चुनौतियाँ पर निबंध | हिन्दू समाज के सामने चुनौतियाँ पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ( RSS) के विचार

हिन्दू समाज के सामने चुनौतियाँ पर निबंध 

जनसंख्या असंतुलन: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ( RSS) का मत है जन सांख्यिकी सन्तुलन रहना आवश्यक है । फ्रांसीसी दार्शनिक आगस्टस कॉमटे ने कहा है The destiny of the nation is decided by demography of the nation अर्थात् राष्ट्र का भविष्य उस राष्ट्र की जनसंख्या की संरचना पर निर्भर करता है । भारत के सन्दर्भ में यह सत्य घटित हुए हमने देखा है । 

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जब जब हिन्दू घटा देश बंटा । जनसंख्या असन्तुलन के कारण 1947 में देश का विभाजन हुआ । अतः जनसंख्या के विषय में एक राष्ट्रीय नीति बननी ही चाहिए । जनसंख्या का विचार एक बोझ के रूप में होता है कि मुंह बढ़ेंगे तो खाने को देने पड़ेगें , रहने की जगह देनी पड़ेगी परन्तु दूसरा पहलू भी है जनसंख्या काम करने वाले हाथ भी देती है । भारत युवाओं का देश है , 56 प्रतिशत युवा हैं । 

30 साल बाद युवा बूढ़े हो जायेंगे तब यदि इनमें तरूणों की संख्या नहीं होगी तो भारत चीन की तरह बूढ़ों का देश हो जाएगा । इसलिए जनसंख्या का विचार दोनों दृष्टि से करना चाहिए । केवल तात्कालिक नहीं आगामी 50 साल का विचार कर नीति बनानी पड़ेगी । जनसंख्या नीति बनाते समय जन्म देने वाली माता के भी विषय में विचार करना होगा । जनसंख्या नीति सभी पर समान रूप से लागू किया जाए किसी को उसमें छूट न हो । 

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अस्पृश्यता: हिन्दू चिन्तन , हिन्दू दर्शन , हिन्दू संस्कृति विश्व में श्रेष्ठतम है जिसके कारण भारत विश्व गुरू था । विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमण के पश्चात् अनेक प्रकार की विकृतियाँ समाज में उत्पन्न हुई ।आज जो भी कुरीतियाँ या विकृतियाँ हिन्दू समाज में दिखाई देती हैं वे सब अधिकांश उसी कालखण्ड में प्रारम्भ हुई । आज हम जिन जातियों को निम्न जाति कह कर तिरस्कार करते हैं वे उस काल खण्ड की अत्यन्त पराक्रमी जातियाँ थीं । 

मुगलों के साथ युद्ध में हारने पर मुगलों द्वारा बेरहमी के साथ उन पर अत्याचार किए गये । उनके सामने विकल्प था इस्लाम स्वीकार करो या मैला ढौने जैसा काम करो । उन्होंने घृणित काम करना स्वीकार किया परन्तु इस्लाम स्वीकार नहीं किया । ' स्वधर्मे निधनं श्रेयः ' मन्त्र जपते हुए ये लोग हिन्दू बने रहे । जो संघर्ष नहीं कर सके बड़ी मात्रा में उनका धर्मान्तरण भी हुआ । 

समाज के वंचित वर्ग को भय , प्रलोभन व दबाव के माध्यम से हिन्दू समाज से अलग करने के प्रयास पूर्व में भी किए गए और आज भी किए जा रहे हैं । हिन्दू समाज में पहले जाति व्यवस्था नहीं थी । इसको प्रारम्भ विगत 1000-1200 वर्षों में हुआ । वर्ण व्यवस्था धीरे - धीरे व्यवसाय के आधार पर जाति व्यवस्था में बदलती गई ।

वर्ण व्यवस्था भी काल वाह्य हो चुकी है । हमारा आचरण बदल गया , सिद्धान्त और व्यवहार में गहरी खाई उत्पन्न हो गई । " ईश्वर अंश जीव अविनाशी " ' ईसावास्यं इदंसर्वम् केवल सिद्धान्त रह गया । व्यवहार में मनुष्य - मनुष्य में भेद होने लगा । मनुष्य योनि में जन्म लेने के कारण सभी मनुष्य समान हैं । परन्तु जन्मतः कोई बुद्धिमान , कोई कम बुद्धिवाला , कोई गोरा , कोई काला , कोई लम्बा , कोई छोटा , प्रत्येक में रूचि भिन्नता , स्वभाव , गुण भिन्नता होती है । 

प्राकृतिक रूप से मानव: मानव में असमानता रहती है । यह विषमता नहीं है , एक ही चैतन्य के विविधतापूर्ण अविष्कार है । विविधता में एकता का दर्शन जब करते हैं , तो समरसता आती है । समता साध्य है समरसता साधन है । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीसरे सरसंघचालक पू . बाला साहब देवरस जी कहते थे- " यदि अस्पृश्यता पाप नहीं है , तो दुनिया में कुछ भी पाप नहीं है । " हिन्दू समाज में जातिगत भेदभाव एवं छुआछूत जैसी बुराइयों को कभी भी सैद्धान्तिक स्वीकृति नहीं मिली । 

हिन्दू समाज के ही स्वयं प्रेरित लोग इसके विरूद्ध खड़े होते रहे हैं । संघ के द्वितीय सरसंघचालक पू . श्री गुरुजी ( माधव सदाशिव गोलवलकर ) का मत था कि अस्पृश्यता केवल अस्पृश्य लोगों की समस्या नहीं है । तथाकथित सवर्णों के मन संकुचित भाव , वह इसकी जड़ है । इसलिए जब तक सवर्ण लोगों के मन की अस्पृश्यता समाप्त नहीं होती और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों के अन्दर की हीन भावना दूर नहीं होती , तब तक यह समस्या पूर्णतः समाप्त होने वाली नहीं है । 

स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था- अज्ञानी भारतवासी , दरिद्र भारतवासी , चांडाल भारतवासी सभी हमारे भाई हैं । धर्माचार्यों ने भी घोषणा की है- हिन्दवः सोदराः सर्वे , न हिन्दू पतितो भवेत् , मम् दीक्षा हिन्दू रक्षा , मम् मंत्र समानता हिन्दू समाज को यदि शक्तिशाली बनाना है तो सामाजिक समरसता निर्माण करने की दिशा में हमारा पहला कदम हो सकता है मन्दिर , जलश्रोत तथा श्मशान सभी के लिए समान हो । 

स्वतंत्रता के 75 साल बाद भी आज गाँवों में दिखाई देता है । अनुसूचित समाज और शेष समाज के लिए पूजा स्थल , जलश्रोत तथा श्मशान घाट अलग -अलग हैं । यह व्यवस्था हिन्दू समाज के लिए अभिशाप है । 

हिन्दू समाज के सामने चुनौतियां अनेक हैं , देश में समस्याएं भी अनन्त हैं तथा प्रश्न अनेक हैं परन्तु उत्तर एक ही है- हिन्दू संगठित रहें , व्यक्ति और परिवार संस्कारित हो , हिन्दू , हिन्दू के नाते जीना सीखें , व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चारित्र्य एक - दूसरे के पूरक बनें । इसी कार्य को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कर रहा है ।

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