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बड़े काम की छोटी बातें |छोटी बातें, बड़े काम की

दैनिक जीवन की छोटी-छोटी बातें कही बार बहुत महत्वपूर्ण होती है ,जिनका पालन करना समाज व् राष्ट्र व् खुद के जीवन के लिए अनिवार्य है तो आइये जानते है- बड़


बड़े काम की छोटी बातें |छोटी बातें, बड़े काम की

बड़े काम की छोटी बातें (bade kaam ki choti baate) 

Small Talk of Big Work: Daily Life  की छोटी-छोटी बातें कही बार बहुत महत्वपूर्ण होती है ,जिनका पालन करना समाज व् राष्ट्र व् खुद के जीवन के लिए अनिवार्य है तो आइये जानते है- बड़े काम की छोटी बातें | छोटी बातें, बड़े काम की| Choti Baten Bade Kam Ki -

Small Talk of Big Work ,some good small talk topics

  • बहुत हद तक आदमी अवसर का शिशु है । किसी आदमी की शक्ति तथा सफलता success प्राप्ति , नि : संदेह , महत्व की चीज़ है , परन्तु इन सबसे परे और ऊपर एक और भी चीज है - वह है परिस्थितियों की शक्ति (power of circumstances) । इसकी भी पूरी तरह उपेक्षा नहीं की जा सकती । 
  • इसी दुर्बलता के कारण मेरा मन मेरे वश में नहीं रहता है । 
  • कम से कम व्यापार में अपने सामाजिक व्यवहार में तो क्रोध करना ही नहीं चाहिए । आपकी सफलता का द्वार क्रोध के कारण सदा के लिए । बंद हो भी सकता है ।
  • अपना निरीक्षण करके आपको अपने दोष ढूंढने होंगे और जो दोष आपकी सफलता की राह में बाधक हैं , उन्हें दूर करना होगा । यही आपकी सफलता की राह के कांटे हैं । यही बार - बार आपकी मंजिल का मार्ग बंद कर देते हैं । बहुत निकट पहुंचकर भी आप पुरस्कार से वंचित रह जाते हैं । 
  • प्रतिदिन रात को सोने से पूर्व आने वाले कल के सारे कार्यक्रम लिख लें । फिर जब अगला दिन आ जाए और सोने का समय हो तो विचार करके देखें , कौन - कौन सा कार्य है और उनका परिणाम क्या रहा ? 
  •  इस आदत ने मेरी शक्ति को नष्ट कर दिया है ।
  • क्रोध पर नियन्त्रण किये बिना आप अपनी सारी योग्यता और कठोर परिश्रम के उपरांत भी कुछ न पा सकेंगे । इसका मतलब यह नहीं है । कि आप क्रोध ही न करें । 
  • इसी कारण मेरा मन और मेरा शरीर भी स्वस्थ नहीं है । मेरी कार्य कुशलता भी कम हो गई है । जितना कार्य मुझे करना चाहिए , उतना मैं नहीं कर पा रहा हूं । 
  • क्रोध पर हर हालत में विजय प्राप्त करनी चाहिए । जिस समय आपको क्रोध आने लगे , उस समय आप तुरंत अपने स्थान से , उस व्यक्ति या वस्तु के सामन से हट जाएं जिसके कारण आपको क्रोध आ रहा हो ।
  • अपना क्रोध यथा संभव पी लेने की चेष्टा करें । क्रोध भूचाल या ज्वालामुखी का काम करता है । उसका लावा सब - कुछ राख कर देता है । 
  • क्रोध आप एक बात पर करेंगे पर उसके साथ अपने आप पचासों गड़े मुर्दे उखड़ जाएंगे और बात तिल का ताड़ , ताड़ से पहाड़ बन , ऐसा वितण्डावाद खड़ा कर देगी कि आपका सब कुछ खराब हो जाएगा । 
  • यदा कदा क्रोध आवश्यक है , पर एक सीमा तक और कम - से - कम अकारण क्रोध बिल्कुल न करें । 
  • क्रोध को एकदम सीमा में बांधकर रखिए । क्रोध के समय आप एकदम उठ कर चले जाएं ।
  • आपका क्रोध एक दायरे में होना । चाहिए । जितनी बात हुई है , वहीं तक होना चाहिए । क्रोध में आकर एकदम बम के समान फटने से नुकसान आपका होगा । शोभा देने की सीमा तक क्रोध करना उचित है ।  
  • इसके कारण मेरे मन में कोई उत्साह और साहस नहीं रहा है । 
  • क्रोध के समय कभी भी आपे से बाहर नहीं होना चाहिए । क्रोध करने से आपकी शक्ति भी क्षीण पड़ती है । बाद में आपको गहरा पश्चाताप होता है । इस प्रकार आपका ही सम्मान कम होता है । 
  • मैं इसी के कारण जीवन में पिछड़ गया हूं और लोग मेरा उपहास उड़ा रहे हैं ।
  • मैं दूसरों के आगे टिक नहीं पा रहा हूं । मुझमें योग्यता है , उन व्यक्तियों से ज्यादा जो इस समय आगे बढ़ गए हैं । केवल अपनी इस गंदी आदत के कारण मैं मार खा गया हूं । अब मैं निश्चय करता हूं कि इससे छुटकारा पाऊंगा .... अवश्य छुटकारा पाऊंगा । 
  • चरित्र एक शक्ति है , प्रभाव है । उसी के कारण लोग मित्र बनते हैं . सहायक और संरक्षक प्राप्त होते हैं , उसी के कारण धन , सम्मान तथा सुख के सुनिनिश्चत मार्ग खुलते हैं । 
  • अब मैं इस बात का निश्चय करता हूं कि इस आदत को एकदम छोड़ दूंगा । यह मेरे हृदय में न रह पाएगी ।
  • अगर कुछ कार्य पूरे नहीं कर पाये । तो क्यों ? इस प्रकार बीते दिन का विवेचन कर वह अगले दिन का कार्यक्रम फिर बना लें ।
  • बोया पेड़ बबूल का , तो आम कहां से होए । 
  • चरित्र को उपदेश , कला , कविता और नाटक आदि प्रत्येक कार्य का पोषक और सहायक होना चाहिए । बिना चरित्र के किसी वस्तु का रत्ती भर भी मूल्य नहीं होगा । 
  • मैं क्षीण , दीन व दुर्बल हो गया हूं
  • जीवन की औषधि बहुत कम है और मृत्यु अनिवार्य है । इसलिए जाओ , हम अपने आगे एक महान आदर्श खड़ा करें और उसके लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दें ।
  • महान बनो । तब अन्य मनुष्यों में । रहने वाली मनुष्यता तुम्हारी मानवता प्राप्त करने के लिए आतुर हो उठेगी ।
  • अकेले चंद्रगुप्त का मूल्य प्राचीन भारत की सब रियासतों से भी । बहुत अधिक है । 
  •  क्या भारतीय संस्कृति आज जीवित नहीं ? प्राचीन भारत के खंडहरों को देखकर आज भी हजारों दर्शक दांतों तले अंगुली दबाया करते हैं । 
  • श्री राम और कृष्ण अब नहीं है , किन्तु हमारे देश में, आज भी उन्हें आदर्श मानकर उनकी पूजा नहीं करता ? 
  •  उज्जवल विचार ही व्यक्ति को सही रास्ते पर ले जाते हैं ।
  • महान व्यक्ति वही माना जाता है जिसने समूची मानव जाति के लिए कुछ किया हो । जिसने दुनिया के दुःखों में कुछ कमी की हो । जिसने अपने बल का प्रयोग अबलाओं और अनाथों को ऊपर उठाने के लिए किया हो । जिसने कई औषधियों द्वारा मानव जाति को रोगों से मुक्त करने में कुछ सहायता की हो । जिसने सभी को अपने समान मानकर उनकी सुख सुविधा के लिए कुछ किया हो । 
  • मन की शक्ति सचमुच अजय है । आदिकाल से आज तक कभी मुनीषियों एवं महापुरुषों ने मन की इस उदात्त शक्ति का गुणगान किया है ।
  • संसार को ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो पैसा लेकर अपनी बात नहीं बेचते , अपने परामर्श का मूल्य नहीं लेते । जो ईमानदार हैं , जिनकी नस - नस में ईमानदारी है । जिनका हृदय दिग्दर्शक - यंत्र के समान अच्छाई के तारे की ओर ही देखता है , जो स्वर्ग से च्युत हो जाने पर भी अपना अधिकार नहीं छोड़ते और न ही उससे कभी विमुख होते हैं । 
  • चरित्र बल पर ही मनुष्य , दैनिक कार्य प्रलोभन और परीक्षा के संसार में दृढ़तापूर्वक स्थिर रहते हैं और वास्तविक जीवन की क्रमिक क्षीणता को सहन करने योग्य होते हैं ।
  • क्या आज भी हम मूसा के बिना । मिस्त्र की , डेवियल के बिना बेबी लोन की तथा सुकरात के बिना एथेन्स की कल्पना कर सकते हैं ? 
  • मेरी दृष्टि में वही व्यक्ति सबसे बड़ा है , वही व्यक्ति महान है जो मुझे मेरे आस - पास के प्रभावों और बंधनों से मुक्त कर देता है , जो मेरी वाणी को स्वतंत्र कर देता है और मेरे लिए नित्य - नवीन सम्भावनाओं के द्वारा खोल देता है । 
  • यदि मुझे यह पता लग जाए कि तुम किस की सराहना करते हो तो मैं बता दूंगा कि तुम कैसे हो । 
  • व्यक्ति अभी असफल नहीं हुआ होता कि असफलता के भय से कांप उठता । 
  • जो जाग गया , वह भय मुक्त है , वहं बुद्ध बन गया । वह अपनी सारी चिंताओं , अपनी महत्त्वकांक्षाओं और अपने दु : खों को भी निस्सारता जाता है । 
  • मन के हारे हार है , मन के जीते जी । 
  • चरित्र स्वयं प्रकट हो जाता है । चोरी करने से कभी कोई धनवान नहीं । बन सकता और दान करने वाला कभी कंगाल नहीं होता । थोड़ा सा भी झूठ शीघ्र पकड़ा जाता है । यदि तुम सच बोलोगे तो सारी सृष्टि और सभी जीव तुम्हारी सहायता को तत्पर हो जाएंगे । चरित्र ही निर्धन व्यक्ति की पंजी है । 
  • जो संसार के लिए काम करे , वही महान पुरुष होता है । 
  • मैं उत्तम चरित्र के मार्ग पर चलकर ही शक्ति प्राप्त करना रहूंगा । मैं दूसरे किसी मार्ग का आश्रय न लूंगा । मुझे विश्वास है कि इस मार्ग से मुझे वांछित ध्येय की प्राप्ति जल्दी नहीं हो सकती , परन्तु इतने पर भी यही उचित और निश्चित मार्ग है । 
  • उसे रोग नहीं होता परन्तु रोग के भय की भावना ही उसे खोखला बना देती है । 
  • वह निर्धन नहीं होता , परन्तु निर्धन हो जाने की भावना उसे दीन - हीन बना देती है । 
  • मानव सभ्यता का कार्मक विकास इसी अपरिमित शक्ति की एक लम्बी विजय गाथा है । 
  • पशु आज भी वही है जहां आज से सहस्त्रों वर्ष पहले थे , परन्तु मन की अनुपम और अनन्त शक्तियों के स्त्रोत से परिप्लावित मनुष्य सभ्यता के रथ को नागरिक जीवन की सुख सुविधाओं तक खींच लाया । 
  • प्रभु मेरे हृदय में हैं । 
  • अपने काम को पूर्ण करने की संकल्प शारीरिक उत्साह की सबसे बड़ी कुंजी है । 
  • कर्त्तव्य पालन का निर्णय करते ही हमारे शरीर के आगे रोग नष्ट हो जाते हैं । 
  • हमें चाहिए कि मन को कभी जंग न लगने दें । मन प्रफुल्लित रहे तो कमजोर शरीर भी कठिन से कठिन काम कर सकता है ।
  • सफलता , संकल्प का ही दूसरा नाम है और मन इनसे संकल्पों का स्त्रोत है । 
  • अपने कर्त्तव्य की पुकार हमें रोगी बनकर बिस्तर पर नहीं पड़ा रहने देती बल्कि झिझोंड़कर जगा देती है । आलस्य ऐसे भाग जाता है जैसे सूर्य निकलने पर अंधेरा और व्यक्ति अकर्मण्यता की जंजीरों से स्वतन्त्र होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कमर कस कर निकल पड़ता है । 
  • जीवन की औषधि बहुत कम है और मृत्यु अनिवार्य है । इसलिए आगे , हम अपने आगे एक महान आदर्श खड़ा करें और उसके लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दें । 
  • अपने काम को पूर्ण करने के लिए । शारीरिक उत्साह की सबसे बड़ी कुंजी है । 
  •  कर्त्तव्य पालन का निर्णय करते ही हमारे शरीरी के आगे रोग नष्ट हो जाते हैं । 
  • अपने कर्त्तव्य की पुकार हमें रोगी बनकर बिस्तर पर नहीं पड़ा रहने देती । बल्कि झिझोंड़कर जगा देती है । आलस्य ऐसे भाग जाता है जैसे सूर्य निकलने पर अंधेरा , और व्यक्ति अकर्मण्यता की जंजीरों से स्वतन्त्र होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कमर कस कर निकल पड़ता है । 
  • सफलता , संकल्प का ही दूसरा नाम है , मन इनसे संकल्पों का स्त्रोत है !
  • हमे चाहिए कि मन को कभी जंग न लगने दें । मन प्रफुल्लित रहे तो कमजोर शरीर भी कठिन से कठिन काम कर सकता है । 
  • कमजोर व्यक्ति ऐसी परिस्थिति में निराश हो जाता है । उसे लगता है जैसे वह सांपों से भरी हुई किसी ऐसी गहरी सुरंग में छोड़ दिया गया है जिसका कोई भी ओर छोर नहीं है ।
  • किसी तूफान में बहते हुए तिनके की तरह वह अपने आपको अन्ध विश्वासों और भाग्य के सहारे छोड़ देता है । 
  • धनी बनने के लिए साहसी होना । भी उतना ही आवश्यक है जितना आत्म - विश्वासी होना ।
  • आंधियों से जलते रहने वाले दीये । की तरह असफलताओं के बावजूद भी मन में आशा बनाये रखना बहुत आवश्यक है । 
  • आप वाक्य ' मेरे दायें हाथ में तलवार है और बायें हाथ में विजय ' सच है । विषयाकांक्षी व्यक्ति सही सही रास्ते पर चले तो विजय श्री निश्चित रूप से उसका वरण करती है । ऐसा व्यक्ति कभी - कभार · हताश भले ही हो जाये , परास्त नहीं हो सकता । 
  • धनी बनने के लिए पहली बात है शंका और संदेह का त्याग करना हृदय से शंका दूर हो जाने पर आदमी आत्म - विश्वास से उद्भासित हो उठता है ।
  • तुच्छ और हीन विचारों वाला व्यक्ति कभी उन्नति नहीं कर सकता । यह बात उतनी ही सच है । जितनी यह बात कि उच्च विचारों वाला व्यक्ति कभी असफल नहीं हो सकता । संकीर्णता व्यक्ति को धनवान नहीं बना सकती । धनी होने के लिए मुक्त हृदय , प्रसन्न मन होना पहली शर्त है । 
  • हंसने की शक्ति , काम छोड़कर , खेलना - कूदना और आनन्द मनाना तथा जीवन के सभी विषादों को भूल जाना , यह सब मनुष्य के लिए । परमात्मा का वरदान है । 
  • यह संसार कायर पुरुषों के लिए । नहीं है अत एव पलायन का प्रयास । कभी मत करो ।
  • व्यक्ति को चाहिए कि वह धनवान । बनने के लिए कलुषित अतीत की ओर पीट फेर कर उज्जवल प्रकाशमय भविष्य की ओर अग्रसर हो ।
  •  आशावान होने के साथ - साथ सशक्त होना भी बहुत जरूरी है । जिन्दगी का संघर्ष इतना कठोर है कि दुर्बल व्यक्ति तो उसमें वैसे ही पिसकर रह जाता है ।
  • मनहूसियत , उद्विग्नता और अरूचि तो दुर्बलता के प्रतीक हैं । यही दुर्बलताएं आदमी को विनाश की ओर ले जाती हैं । 
  • परिस्थितियों के विरुद्ध लड़ने वाले व्यक्तियों को अपने भीतर शक्ति । का संचय करना चाहिए । यह निरन्तर उद्योग करने से आती है ।
  •  कभी - कभी मूर्खता भी ताजगी का आधार बन जाती है । हंसिए और मोटे हो जाइये । यदि प्रत्येक व्यक्ति हंसी को स्वास्थवर्द्धक और जीवनवर्द्धक औषधि के रूप में जान ले तो बहुत से डाक्टरों को अपना धन्धा ही बदलना पड़ जाएगा । 
  •  आशावाद धन की कुंजी है । 
  • उस समय , जब आप जोर का ठहाका लगाते हैं , शरीर के किसी भी अंग के किसी सुंदर कोने की कोई छोटी से छोटी भी रक्त वाहिनी ऐसी नहीं होती कि जिसमें सम्पन्दन होता हो । 
  • हमको मिटा सके , यह जमाने में । दम नहीं । हमसे जमाना खुद है , जमाने से हम नहीं ।
  • हंसने पर मनुष्य की श्वासोच्छवास की गति तीव्र हो जाती है और इससे सारे श्वास संस्थान को गर्मी और ताजगी प्राप्त होती है ।
  •  वह स्वास्थय सन्तुलन जो अनिद्रा के कारण , किसी बुरी सूचना अथवा समाचार के कारण , किसी प्रकार की उद्विग्नता के कारण नष्ट हो जाती है , हंसने से पूर्णतया पुनः प्राप्त हो जाता है । 
  •  आशावादी भी व्यक्ति तभी बन पाता है जब उसकी नसों में बहने वाला खून गर्म तथा उसे प्रेरित करने वाले आदर्श सुखदायी हों । 
  • प्रभु ने श्रद्धा और विश्वास की रचना धैर्य और मुसीबत में सहारा देने के लिए ही की है ।
  • आनन्द परमात्मा - प्रदत्त औषधि है . प्रत्येक व्यक्ति को इसका सदुपयोग करना चाहिए । उद्विग्नता , उदासीनता और चिन्ता रूपी जीवन की जो ' जंग ' है , उसको आनन्द रूपी तेल से मिटा देना चाहिए । 
  • सहज प्रकृति के लोग चिरकाल तक जीवित रहते हैं । 
  • प्रसन्नता ही स्वास्थय है । इसके विपरीत मलीनता ही रोग है । 
  • जिसका मन निर्बल है , उसका शरीर आप ही निर्बल हो जाता है । निर्बल मन में निर्बल विचार होता है जैसा विचार होता है , व्यक्ति वैसा ही बोलता है , जैसा बोलता है , वैसा करता है और जैसा करता है , उसे उसका वैसा ही फल प्राप्त होता है ।
  • आपका मार्ग कितना भी अन्धकार मय क्यों न हो , कितनी ही कठिनाइयां आपके मार्ग में क्यों न हों , कभी भी अपने आत्म - विश्वास और मानसिक धैर्य को न खोइए । 
  • आप दूसरों के विश्वास पात्र क्यों नहीं बन पाते । इसका कारण आपका सन्देह और भय है । आपकी असफलताओं का कारण भी यही है । 
  • आप स्वयं को जितना अधिक योग्य समझेंगे , उतना ही अधिक महत्वपूर्ण कार्य कर पाएंगे । वैसे ही आचार - विचार और भाव आपके चेहरे पर दिखाई देने लगेंगे । 
  •  खुली मुस्कान आम तौर पर शक्ति तथा सन्ह का प्रतीक होती है ।
  • जिस प्रकार तेज तूफान में दिशा सूचक यंत्र नाविक को सहायता देता है , उसी प्रकार कष्ट और मुसीबत के समय धैर्य और आत्म विश्वास ही मनुष्य के काम आते हैं । 
  • आप जिन गुणों को प्राप्त करना चाहते हैं उनको अपने मन में संजोइए तो वे गुण स्वतः आपके हो जाएंगे । आपका मुख मण्डल उन गुणों के प्रकाश से जगमगाने लगेगा । 
  • यदि आप अपने चेहरे , आचरण अथवा व्यवहार में उच्चता लाना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले अपने विचारों में उच्चता लानी होगी । तभी आपको सफलता प्राप्त होगी , अन्यथा नहीं ।
  • यदि आप अपने मन में यह विश्वास दृढ़ कर लेंगे कि भी महान कार्य करने की आप में योग्यता 1 है तो आप निश्चय ही सफल होंगे 
  • जो गुण आपमें विद्यमान हैं , आपके चेहरे पर उनकी झलक स्पष्ट अंकित रहती है । इन गुणों का प्रभाव दूसरों पर बिना कहे पड़ता है । 
  •  यदि परिस्थितियां अनुकूल न रहें , तो ईश्वर को दोष मत दो । अपना ही निरीक्षण करो । यदि जरा गहराई से सोचोगे तो तुम्हें स्वयं ही अपनी कठिनाइयों के कारण मालूम हो जाएंगे । 
  • मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं , अपितु परिस्थितियां ही मनुष्य की दास हैं ।
  • आत्मविश्वासी और दृढ़ निश्चयी व्यक्तियों को कोई भी वस्तु संसार में अपने ध्येय की ओर बढ़ने से नहीं रोक सकती । उन्हें अपने ऊपर भरोसा होता है और वे कठिन से - कठिन परिस्थितियों में भी अपना मार्ग बनाकर सफलता प्राप्त करते हैं । 
  •  बड़ी - बड़ी महत्वकांक्षाएं रखने से छोटी - छोटी इच्छाएं स्वयमेव पूरी हो जाती हैं पर छोटी - छोटी इच्छाएं । रखने से उनकी पूर्ति भी कठिन हो जाती है । 
  • कोई क्या कहता है ? इस प्रश्न पर कभी अधिक मत सोचिए । मान लीजिए आप किसी आफिस में काम करते हैं ।
  • परिस्थितियां जीवन को बदल देती हैं । 
  • उस परम सत्य के अंश होने के कारण हम सबके हृदय में सत्य के प्रति लगाव एवं आकर्षण सहज ही है । अंश में अंशी का आकर्षण होता है । जीव अंश है , परमात्मा अंशी है । अतः जीव का परमात्मा से प्रेम सहज है । यही भक्ति है । 
  • यदि मानव शरीर पाकर भी अपना शारीरिक , बौद्धिक , आर्थिक एवं आत्मिक विकार नहीं किया और उन्नति के पश्चात् देश तथा धर्म की सेवा नहीं की तो पशुओं से अधिक क्या किया ? 
  • किसी के भी सहारे की आशा मत कीजिए । आत्म - निर्भर हो जाइए , हो सकते हैं , संकल्प दृढ़ होना चाहिए ।
  • कम से कम पांच मिनट के लिए । प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन मूर्ख बनता ही है । हमारी बुद्धिमानी इसी में है कि इस पांच मिनट की अवधि को बढ़ने न दें । 
  •  कुछ लोग कड़ी टांगों वाली चाल चलते हैं । कठोर और न झुकने वालों की ऐसी चाल होती है । 
  •  भद्दी चाल , संकल्प के अभाव का द्योतक है । आप जांच करके देखते हैं । 
  • खिलाड़ी प्रकृति का व्यक्ति एड़ियां फर्श पर टिका कर बैठता है । प्रतियोगिता पसन्द करता है । 
  • परिस्थितियों का दास नहीं , अपितु परिस्थितियां ही मनुष्य की दास हैं । 
  • विकृत मुस्कान संशय दर्शाती है ।
  • जो व्यक्ति अपनी टांगों को आर पार करके खड़ा होता है । वह क्षमा मांगने की प्रवृति का भी है और प्रतिरक्षात्मक भी है । 
  • आप किसी की मुस्कान देखकर उसका स्वभाव भांप सकते हैं ।
  • इसी दुर्बलता के कारण मेरा मन मेरे वश में नहीं रहता है । 
  • कम से कम व्यापार में अपने सामाजिक व्यवहार में तो क्रोध करना ही नहीं चाहिए । आपकी सफलता का गे और जो दोष आपकी सफलता की राह में बाधक हैं , उन्हें दूर करना होगा । यही आपकी सफलता की राह के कांटे हैं । यही बार - बार आपकी मंजिल का मार्ग बंद कर देते हैं । बहुत निकट पहुंचकर भी आप पुरस्कार से वंचित रह जाते हैं । 
  • प्रतिदिन रात को सोने से पूर्व आने वाले कल के सारे कार्यक्रम लिख लें । फिर जब अगला दिन आ जाए और सोने का समय हो तो विचार करके देखें , कौन - कौन सा कार्य है और उनका परिणाम क्या रहा ? 
  •  इस आदत ने मेरी शक्ति को नष्ट कर दिया है ।
  • क्रोध पर नियन्त्रण किये बिना आप अपनी सारी योग्यता और कठोर परिश्रम के उपरांत भी कुछ न पा सकेंगे । इसका मतलब यह नहीं है । कि आप क्रोध ही न करें । 
  • इसी कारण मेरा मन और मेरा शरीर भी स्वस्थ नहीं है । मेरी कार्य कुशलता भी कम हो गई है । जितना कार्य मुझे करना चाहिए , उतना मैं नहीं कर पा रहा हूं । 
  • क्रोध पर हर हालत में विजय प्राप्त करनी चाहिए । जिस समय आपको क्रोध आने लगे , उस समय आप तुरंत अपने स्थान से , उस व्यक्ति या वस्तु के सामन से हट जाएं जिसके कारण आपको क्रोध आ रहा हो ।
  • अपना क्रोध यथा संभव पी लेने की चेष्टा करें । क्रोध भूचाल या ज्वालामुखी का काम करता है । उसका लावा सब - कुछ राख कर देता है । 
  • क्रोध आप एक बात पर करेंगे पर उसके साथ अपने आप पचासों गड़े मुर्दे उखड़ जाएंगे और बात तिल का ताड़ , ताड़ से पहाड़ बन , ऐसा वितण्डावाद खड़ा कर देगी कि आपका सब कुछ खराब हो जाएगा । 
  • यदा कदा क्रोध आवश्यक है , पर एक सीमा तक और कम - से - कम अकारण क्रोध बिल्कुल न करें । 
  • क्रोध को एकदम सीमा में बांधकर रखिए । क्रोध के समय आप एकदम उठ कर चले जाएं ।
  • आपका क्रोध एक दायरे में होना । चाहिए । जितनी बात हुई है , वहीं तक होना चाहिए । क्रोध में आकर एकदम बम के समान फटने से नुकसान आपका होगा । शोभा देने की सीमा तक क्रोध करना उचित है ।  
  • इसके कारण मेरे मन में कोई उत्साह और साहस नहीं रहा है । 
  • क्रोध के समय कभी भी आपे से बाहर नहीं होना चाहिए । क्रोध करने से आपकी शक्ति भी क्षीण पड़ती है । बाद में आपको गहरा पश्चाताप होता है । इस प्रकार आपका ही सम्मान कम होता है । 
  • मैं इसी के कारण जीवन में पिछड़ गया हूं और लोग मेरा उपहास उड़ा रहे हैं ।
  • मैं दूसरों के आगे टिक नहीं पा रहा हूं । मुझमें योग्यता है , उन व्यक्तियों से ज्यादा जो इस समय आगे बढ़ गए हैं । केवल अपनी इस गंदी आदत के कारण मैं मार खा गया हूं । अब मैं निश्चय करता हूं कि इससे छुटकारा पाऊंगा .... अवश्य छुटकारा पाऊंगा । 
  • चरित्र एक शक्ति है , प्रभाव है । उसी के कारण लोग मित्र बनते हैं . सहायक और संरक्षक प्राप्त होते हैं , उसी के कारण धन , सम्मान तथा सुख के सुनिनिश्चत मार्ग खुलते हैं । 
  • अब मैं इस बात का निश्चय करता हूं कि इस आदत को एकदम छोड़ दूंगा । यह मेरे हृदय में न रह पाएगी ।
  • अगर कुछ कार्य पूरे नहीं कर पाये । तो क्यों ? इस प्रकार बीते दिन का विवेचन कर वह अगले दिन का कार्यक्रम फिर बना लें ।
  • बोया पेड़ बबूल का , तो आम कहां से होए । 
  • चरित्र को उपदेश , कला , कविता और नाटक आदि प्रत्येक कार्य का पोषक और सहायक होना चाहिए । बिना चरित्र के किसी वस्तु का रत्ती भर भी मूल्य नहीं होगा । 
  • मैं क्षीण , दीन व दुर्बल हो गया हूं
  • जीवन की औषधि बहुत कम है और मृत्यु अनिवार्य है । इसलिए जाओ , हम अपने आगे एक महान आदर्श खड़ा करें और उसके लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दें ।
  • महान बनो । तब अन्य मनुष्यों में । रहने वाली मनुष्यता तुम्हारी मानवता प्राप्त करने के लिए आतुर हो उठेगी ।
  • अकेले चंद्रगुप्त का मूल्य प्राचीन भारत की सब रियासतों से भी । बहुत अधिक है । 
  •  क्या भारतीय संस्कृति आज जीवित नहीं ? प्राचीन भारत के खंडहरों को देखकर आज भी हजारों दर्शक दांतों तले अंगुली दबाया करते हैं । 
  • श्री राम और कृष्ण अब नहीं है , किन्तु हमारे देश में, आज भी उन्हें आदर्श मानकर उनकी पूजा नहीं करता ? 
  •  उज्जवल विचार ही व्यक्ति को सही रास्ते पर ले जाते हैं ।
  • महान व्यक्ति वही माना जाता है जिसने समूची मानव जाति के लिए कुछ किया हो । जिसने दुनिया के दुःखों में कुछ कमी की हो । जिसने अपने बल का प्रयोग अबलाओं और अनाथों को ऊपर उठाने के लिए किया हो । जिसने कई औषधियों द्वारा मानव जाति को रोगों से मुक्त करने में कुछ सहायता की हो । जिसने सभी को अपने समान मानकर उनकी सुख सुविधा के लिए कुछ किया हो । 
  • मन की शक्ति सचमुच अजय है । आदिकाल से आज तक कभी मुनीषियों एवं महापुरुषों ने मन की इस उदात्त शक्ति का गुणगान किया है ।
  • संसार को ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो पैसा लेकर अपनी बात नहीं बेचते , अपने परामर्श का मूल्य नहीं लेते । जो ईमानदार हैं , जिनकी नस - नस में ईमानदारी है । जिनका हृदय दिग्दर्शक - यंत्र के समान अच्छाई के तारे की ओर ही देखता है , जो स्वर्ग से च्युत हो जाने पर भी अपना अधिकार नहीं छोड़ते और न ही उससे कभी विमुख होते हैं । 
  • चरित्र बल पर ही मनुष्य , दैनिक कार्य प्रलोभन और परीक्षा के संसार में दृढ़तापूर्वक स्थिर रहते हैं और वास्तविक जीवन की क्रमिक क्षीणता को सहन करने योग्य होते हैं ।
  • क्या आज भी हम मूसा के बिना । मिस्त्र की , डेवियल के बिना बेबी लोन की तथा सुकरात के बिना एथेन्स की कल्पना कर सकते हैं ? 
  • मेरी दृष्टि में वही व्यक्ति सबसे बड़ा है , वही व्यक्ति महान है जो मुझे मेरे आस - पास के प्रभावों और बंधनों से मुक्त कर देता है , जो मेरी वाणी को स्वतंत्र कर देता है और मेरे लिए नित्य - नवीन सम्भावनाओं के द्वारा खोल देता है । 
  • यदि मुझे यह पता लग जाए कि तुम किस की सराहना करते हो तो मैं बता दूंगा कि तुम कैसे हो । 
  • व्यक्ति अभी असफल नहीं हुआ होता कि असफलता के भय से कांप उठता । 
  • जो जाग गया , वह भय मुक्त है , वहं बुद्ध बन गया । वह अपनी सारी चिंताओं , अपनी महत्त्वकांक्षाओं और अपने दु : खों को भी निस्सारता जाता है । 
  • मन के हारे हार है , मन के जीते जी । 
  •  चरित्र स्वयं प्रकट हो जाता है । चोरी करने से कभी कोई धनवान नहीं । बन सकता और दान करने वाला कभी कंगाल नहीं होता । थोड़ा सा भी झूठ शीघ्र पकड़ा जाता है । यदि तुम सच बोलोगे तो सारी सृष्टि और सभी जीव तुम्हारी सहायता को तत्पर हो जाएंगे । चरित्र ही निर्धन व्यक्ति की पंजी है । 
  • जो संसार के लिए काम करे , वही महान पुरुष होता है । 
  • मैं उत्तम चरित्र के मार्ग पर चलकर ही शक्ति प्राप्त करना रहूंगा । मैं दूसरे किसी मार्ग का आश्रय न लूंगा । मुझे विश्वास है कि इस मार्ग से मुझे वांछित ध्येय की प्राप्ति जल्दी नहीं हो सकती , परन्तु इतने पर भी यही उचित और निश्चित मार्ग है । 
  • उसे रोग नहीं होता परन्तु रोग के भय की भावना ही उसे खोखला बना देती है । 
  • वह निर्धन नहीं होता , परन्तु निर्धन हो जाने की भावना उसे दीन - हीन बना देती है । 
  • मानव सभ्यता का कार्मक विकास इसी अपरिमित शक्ति की एक लम्बी विजय गाथा है । 
  • पशु आज भी वही है जहां आज से सहस्त्रों वर्ष पहले थे , परन्तु मन की अनुपम और अनन्त शक्तियों के स्त्रोत से परिप्लावित मनुष्य सभ्यता के रथ को नागरिक जीवन की सुख सुविधाओं तक खींच लाया । 
  • प्रभु मेरे हृदय में हैं । 
  • अपने काम को पूर्ण करने की संकल्प शारीरिक उत्साह की सबसे बड़ी कुंजी है । 
  • कर्त्तव्य पालन का निर्णय करते ही हमारे शरीर के आगे रोग नष्ट हो जाते हैं । 
  • हमें चाहिए कि मन को कभी जंग न लगने दें । मन प्रफुल्लित रहे तो कमजोर शरीर भी कठिन से कठिन काम कर सकता है ।
  • सफलता , संकल्प का ही दूसरा नाम है और मन इनसे संकल्पों का स्त्रोत है । 
  • अपने कर्त्तव्य की पुकार हमें रोगी बनकर बिस्तर पर नहीं पड़ा रहने देती बल्कि झिझोंड़कर जगा देती है । आलस्य ऐसे भाग जाता है जैसे सूर्य निकलने पर अंधेरा और व्यक्ति अकर्मण्यता की जंजीरों से स्वतन्त्र होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कमर कस कर निकल पड़ता है । 
  • जीवन की औषधि बहुत कम है और मृत्यु अनिवार्य है । इसलिए आगे , हम अपने आगे एक महान आदर्श खड़ा करें और उसके लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दें । 
  • अपने काम को पूर्ण करने के लिए । शारीरिक उत्साह की सबसे बड़ी कुंजी है । 
  •  कर्त्तव्य पालन का निर्णय करते ही हमारे शरीरी के आगे रोग नष्ट हो जाते हैं । 
  • अपने कर्त्तव्य की पुकार हमें रोगी बनकर बिस्तर पर नहीं पड़ा रहने देती । बल्कि झिझोंड़कर जगा देती है । आलस्य ऐसे भाग जाता है जैसे सूर्य निकलने पर अंधेरा , और व्यक्ति अकर्मण्यता की जंजीरों से स्वतन्त्र होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कमर कस कर निकल पड़ता है । 
  • सफलता , संकल्प का ही दूसरा नाम है , मन इनसे संकल्पों का स्त्रोत है !
  • हमे चाहिए कि मन को कभी जंग न लगने दें । मन प्रफुल्लित रहे तो कमजोर शरीर भी कठिन से कठिन काम कर सकता है । 
  • कमजोर व्यक्ति ऐसी परिस्थिति में निराश हो जाता है । उसे लगता है जैसे वह सांपों से भरी हुई किसी ऐसी गहरी सुरंग में छोड़ दिया गया है जिसका कोई भी ओर छोर नहीं है ।
  • किसी तूफान में बहते हुए तिनके की तरह वह अपने आपको अन्ध विश्वासों और भाग्य के सहारे छोड़ देता है । 
  • धनी बनने के लिए साहसी होना । भी उतना ही आवश्यक है जितना आत्म - विश्वासी होना ।
  • आंधियों से जलते रहने वाले दीये । की तरह असफलताओं के बावजूद भी मन में आशा बनाये रखना बहुत आवश्यक है । 
  • आप वाक्य ' मेरे दायें हाथ में तलवार है और बायें हाथ में विजय ' सच है । विषयाकांक्षी व्यक्ति सही सही रास्ते पर चले तो विजय श्री निश्चित रूप से उसका वरण करती है । ऐसा व्यक्ति कभी - कभार · हताश भले ही हो जाये , परास्त नहीं हो सकता । 
  • धनी बनने के लिए पहली बात है शंका और संदेह का त्याग करना हृदय से शंका दूर हो जाने पर आदमी आत्म - विश्वास से उद्भासित हो उठता है ।
  • तुच्छ और हीन विचारों वाला व्यक्ति कभी उन्नति नहीं कर सकता । यह बात उतनी ही सच है । जितनी यह बात कि उच्च विचारों वाला व्यक्ति कभी असफल नहीं हो सकता । संकीर्णता व्यक्ति को धनवान नहीं बना सकती । धनी होने के लिए मुक्त हृदय , प्रसन्न मन होना पहली शर्त है । 
  • हंसने की शक्ति , काम छोड़कर , खेलना - कूदना और आनन्द मनाना तथा जीवन के सभी विषादों को भूल जाना , यह सब मनुष्य के लिए । परमात्मा का वरदान है । 
  • यह संसार कायर पुरुषों के लिए । नहीं है अत एव पलायन का प्रयास । कभी मत करो ।
  • व्यक्ति को चाहिए कि वह धनवान । बनने के लिए कलुषित अतीत की ओर पीट फेर कर उज्जवल प्रकाशमय भविष्य की ओर अग्रसर हो ।
  •  आशावान होने के साथ - साथ सशक्त होना भी बहुत जरूरी है । जिन्दगी का संघर्ष इतना कठोर है कि दुर्बल व्यक्ति तो उसमें वैसे ही पिसकर रह जाता है ।
  • मनहूसियत , उद्विग्नता और अरूचि तो दुर्बलता के प्रतीक हैं । यही दुर्बलताएं आदमी को विनाश की ओर ले जाती हैं । 
  • परिस्थितियों के विरुद्ध लड़ने वाले व्यक्तियों को अपने भीतर शक्ति । का संचय करना चाहिए । यह निरन्तर उद्योग करने से आती है ।
  •  कभी - कभी मूर्खता भी ताजगी का आधार बन जाती है । हंसिए और मोटे हो जाइये । यदि प्रत्येक व्यक्ति हंसी को स्वास्थवर्द्धक और जीवनवर्द्धक औषधि के रूप में जान ले तो बहुत से डाक्टरों को अपना धन्धा ही बदलना पड़ जाएगा । 
  •  आशावाद धन की कुंजी है । 
  • उस समय , जब आप जोर का ठहाका लगाते हैं , शरीर के किसी भी अंग के किसी सुंदर कोने की कोई छोटी से छोटी भी रक्त वाहिनी ऐसी नहीं होती कि जिसमें सम्पन्दन होता हो । 
  • हमको मिटा सके , यह जमाने में । दम नहीं । हमसे जमाना खुद है , जमाने से हम नहीं ।
  • हंसने पर मनुष्य की श्वासोच्छवास की गति तीव्र हो जाती है और इससे सारे श्वास संस्थान को गर्मी और ताजगी प्राप्त होती है ।
  •  वह स्वास्थय सन्तुलन जो अनिद्रा के कारण , किसी बुरी सूचना अथवा समाचार के कारण , किसी प्रकार की उद्विग्नता के कारण नष्ट हो जाती है , हंसने से पूर्णतया पुनः प्राप्त हो जाता है । 
  •  आशावादी भी व्यक्ति तभी बन पाता है जब उसकी नसों में बहने वाला खून गर्म तथा उसे प्रेरित करने वाले आदर्श सुखदायी हों । 
  • प्रभु ने श्रद्धा और विश्वास की रचना धैर्य और मुसीबत में सहारा देने के लिए ही की है ।
  • आनन्द परमात्मा - प्रदत्त औषधि है . प्रत्येक व्यक्ति को इसका सदुपयोग करना चाहिए । उद्विग्नता , उदासीनता और चिन्ता रूपी जीवन की जो ' जंग ' है , उसको आनन्द रूपी तेल से मिटा देना चाहिए । 
  • सहज प्रकृति के लोग चिरकाल तक जीवित रहते हैं । 
  • प्रसन्नता ही स्वास्थय है । इसके विपरीत मलीनता ही रोग है । 
  • जिसका मन निर्बल है , उसका शरीर आप ही निर्बल हो जाता है । निर्बल मन में निर्बल विचार होता है जैसा विचार होता है , व्यक्ति वैसा ही बोलता है , जैसा बोलता है , वैसा करता है और जैसा करता है , उसे उसका वैसा ही फल प्राप्त होता है ।
  • आपका मार्ग कितना भी अन्धकार मय क्यों न हो , कितनी ही कठिनाइयां आपके मार्ग में क्यों न हों , कभी भी अपने आत्म - विश्वास और मानसिक धैर्य को न खोइए । 
  • आप दूसरों के विश्वास पात्र क्यों नहीं बन पाते । इसका कारण आपका सन्देह और भय है । आपकी असफलताओं का कारण भी यही है । 
  • आप स्वयं को जितना अधिक योग्य समझेंगे , उतना ही अधिक महत्वपूर्ण कार्य कर पाएंगे । वैसे ही आचार - विचार और भाव आपके चेहरे पर दिखाई देने लगेंगे । 
  •  खुली मुस्कान आम तौर पर शक्ति तथा सन्ह का प्रतीक होती है ।
  • जिस प्रकार तेज तूफान में दिशा सूचक यंत्र नाविक को सहायता देता है , उसी प्रकार कष्ट और मुसीबत के समय धैर्य और आत्म विश्वास ही मनुष्य के काम आते हैं । 
  • आप जिन गुणों को प्राप्त करना चाहते हैं उनको अपने मन में संजोइए तो वे गुण स्वतः आपके हो जाएंगे । आपका मुख मण्डल उन गुणों के प्रकाश से जगमगाने लगेगा । 
  • यदि आप अपने चेहरे , आचरण अथवा व्यवहार में उच्चता लाना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले अपने विचारों में उच्चता लानी होगी । तभी आपको सफलता प्राप्त होगी , अन्यथा नहीं ।
  • यदि आप अपने मन में यह विश्वास दृढ़ कर लेंगे कि भी महान कार्य करने की आप में योग्यता 1 है तो आप निश्चय ही सफल होंगे 
  • जो गुण आपमें विद्यमान हैं , आपके चेहरे पर उनकी झलक स्पष्ट अंकित रहती है । इन गुणों का प्रभाव दूसरों पर बिना कहे पड़ता है । 
  •  यदि परिस्थितियां अनुकूल न रहें , तो ईश्वर को दोष मत दो । अपना ही निरीक्षण करो । यदि जरा गहराई से सोचोगे तो तुम्हें स्वयं ही अपनी कठिनाइयों के कारण मालूम हो जाएंगे । 
  • मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं , अपितु परिस्थितियां ही मनुष्य की दास हैं ।
  • आत्मविश्वासी और दृढ़ निश्चयी व्यक्तियों को कोई भी वस्तु संसार में अपने ध्येय की ओर बढ़ने से नहीं रोक सकती । उन्हें अपने ऊपर भरोसा होता है और वे कठिन से - कठिन परिस्थितियों में भी अपना मार्ग बनाकर सफलता प्राप्त करते हैं । 
  •  बड़ी - बड़ी महत्वकांक्षाएं रखने से छोटी - छोटी इच्छाएं स्वयमेव पूरी हो जाती हैं पर छोटी - छोटी इच्छाएं । रखने से उनकी पूर्ति भी कठिन हो जाती है । 
  • कोई क्या कहता है ? इस प्रश्न पर कभी अधिक मत सोचिए । मान लीजिए आप किसी आफिस में काम करते हैं ।
  • परिस्थितियां जीवन को बदल देती हैं । 
  • उस परम सत्य के अंश होने के कारण हम सबके हृदय में सत्य के प्रति लगाव एवं आकर्षण सहज ही है । अंश में अंशी का आकर्षण होता है । जीव अंश है , परमात्मा अंशी है । अतः जीव का परमात्मा से प्रेम सहज है । यही भक्ति है । 
  • यदि मानव शरीर पाकर भी अपना शारीरिक , बौद्धिक , आर्थिक एवं आत्मिक विकार नहीं किया और उन्नति के पश्चात् देश तथा धर्म की सेवा नहीं की तो पशुओं से अधिक क्या किया ? 
  • किसी के भी सहारे की आशा मत कीजिए । आत्म - निर्भर हो जाइए , हो सकते हैं , संकल्प दृढ़ होना चाहिए ।
  • कम से कम पांच मिनट के लिए । प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन मूर्ख बनता ही है । हमारी बुद्धिमानी इसी में है कि इस पांच मिनट की अवधि को बढ़ने न दें । 
  •  कुछ लोग कड़ी टांगों वाली चाल चलते हैं । कठोर और न झुकने वालों की ऐसी चाल होती है । 
  •  भद्दी चाल , संकल्प के अभाव का द्योतक है । आप जांच करके देखते हैं । 
  • खिलाड़ी प्रकृति का व्यक्ति एड़ियां फर्श पर टिका कर बैठता है । प्रतियोगिता पसन्द करता है । 
  • परिस्थितियों का दास नहीं , अपितु परिस्थितियां ही मनुष्य की दास हैं । 
  • विकृत मुस्कान संशय दर्शाती है ।
  • जो व्यक्ति अपनी टांगों को आर पार करके खड़ा होता है । वह क्षमा मांगने की प्रवृति का भी है और प्रतिरक्षात्मक भी है । 
  • आप किसी की मुस्कान देखकर उसका स्वभाव भांप सकते हैं । 
  • सजीव , अप्रत्याशित , मुस्कराहट ऐसे व्यक्ति की होती है जो वाक संयम या मौन भाव रखते हुए भी भीतर से सहृदय हैं । अच्छी प्रवृति का है । 
  • जो व्यक्ति बहुत कम मुस्कराता है , उसके बारे में निर्णय लेते समय अधिक ध्यान देना चाहिए । वह कठोर भी हो सकता है , परन्तु उसमें बहुमूल्य सद्गुण साधुता भी हो सकती है ।
  • जो आदमी अपनी पतलून या पायजामो को झटका देकर ऊपर खींचता है , उसे निकट आने वाले कार्य की चिंता है । वह उस काम को करने की आशा रखता है । 
  • जो मनुष्य बातें करते समय कुछ बोलते - कहते समय लगातार सामने बैठे हुए का स्पर्श करते हैं , कमीज , कोट या टाई को छूते या खींचते हैं । बांह पकड़कर अपनी बात कहते हैं तो आप बुरा मत मानिए । वह आत्मनिर्भर नहीं है , उनमें विश्वास की कमी है । 
  • हर वक्त विचारों में मत खोये रहिए । मस्तिष्क को तनावों से मुक्त रखें । तनाव ग्रस्त लोग अपनी याददाशत लगभग खो बैठते हैं । बड़े काम की छोटी बातें
  • महान की उपासना करना , स्वयं महान होने के बराबर है । 
  • आप अपनी स्मृति पर विश्वास करें । कभी भी यह न सोचें कि आपकी स्मरण - शक्ति कमजोर है । किसी भी कार्य में जल्दबाजी न करें तो ही अच्छा है । धैर्य को बनाए रखें । 
  • बदहवास कभी न हों । 
  • बदहवास हो गये तो कार्य बिगड़ जाएगा या और भी देर में होगा । गलत हो गया तो दोबारा करना पड़ सकता है । आप भूल कर सकते हैं । कुछ छूट भी सकता है । 
  • विश्वास ही हमारी योग्यताओं और शक्तियों को सजीव व सशक्त करता है ।
  • जिससे भी बात करें , प्रेम से करें । आपके व्यवहार में मिठास , सादगी और दृढ़ता होनी चाहिए । ऐसा होगा तो दो लाभ होंगे - सामने वाले । पर प्रभाव भी अच्छा पड़ेगा और आप अपनी बातें भी याद रख सकेंगे । 
  •  वायदों को भूले नहीं । एक कागज पर लिखकर रख लें । भूले कम होंगी । स्मरण - शक्ति बढ़ाने का अभ्यास हो सकेगा । 
  • सर्वप्रथम तो अपने आत्मविश्वास को जगाना चाहिए । बिना आत्मविश्वास के कभी कोई कार्य । नहीं हो सकता । कार्य क्षमता बढ़ाने के लिए भी दृढ़ आत्मविश्वास की आवश्यकता है ।
  • माता - पिता पर निर्भर नहीं होना । चाहिए । जवान हो जाने पर अपने पांव पर खड़े होना बहुत आवश्यक है । 
  • यह कभी मत सोचिए कि आपके शरीर या मन में कम शक्ति है , कम क्षमता है । आपके अन्दर बहुत शक्ति है । बहुत कार्य क्षमता आप बढ़ा सकते हैं । बस अपनी शक्ति को पहचान लीजिए । 
  •  अपने निश्चय को दृढ़ कर लीजिए । अपने निर्णय पर अटल रहिए । 
  • अस्थिरता दुर्बलता का संकेत है । 
  • साधारण योग्यता होने पर भी यदि बुद्धिमता से कार्य किया जाए तो प्रशंसा प्राप्त होगी । इससे इतनी ख्याति प्राप्त होती है जितनी वास्तविक योग्यता से भी नहीं होती ।
  • जो भी काम करें , पूर्ण आत्म विश्वास के साथ करें । यह कभी न सोचें कि आप नहीं कर सकते । आप सब कुछ कर सकते हैं । आपकी कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए । जो आप कहते हैं उस पर आचरण भी करें । 
  • क्रोध से जितना बच सकते हो , बचें । क्रोध से स्मृति नष्ट होने लगती है । जरा - जरा सी बात पर यदि आप भड़क उठते हैं , कुढ़ते हैं तो आप अपना नुक्सान करते हैं । जितना भी आप शान्त और संयत रहेंगे , उतने ही स्वस्थ रहेंगे स्मृति शक्ति बढ़ा सकेंगे । 
  • कर्म से मुंह ना मोड़ों । कर्म शरीर | द्वारा ईश्वर की सर्वोत्तम प्रार्थना है ।
  • खाली पुलाव ही न पकायें । कल्पना - शीलता या ऊंचे सपने देखना बुरी बातें नहीं हैं , किन्तु केवल कहना और कर्म करने से बचे , तो यह अकर्मण्यता अनुचित है । आपको कर्मशील होना चाहिए । जो आप करें , उस पर तुरन्त आचरण शुरू कर दें । 
  • जिस न्यूटन ने अपनी बुद्धि वैभव से विश्व के रहस्य को समझ लिया था , वह काम करते समय बिल्ली की आवाज से डर जाता था ।
  • जीवन है छोटा । शक्ति है सीमित । समय है अल्प । इसलिए जो विचारपूर्वक , सावधानी और सजगता से चलते हैं , वे ही कहीं पहुंच पाते हैं ।
  •  डीन स्विफ्ट जैसा प्रतिभावन लेखर भूखों मरता था और बहुत कम योग्यता वाले लेखक हलुआ - पूरी उड़ाते थे ।
  • नेपोलियन का एक सेनापति अपने मालिक के समान युद्ध कला में निपुण था परन्तु उसमें नेपोलियन के समान मनुष्यों को परखने की शक्ति नहीं थी , विवेक बुद्धि नहीं थी । 
  • आपकी दुकान का माल यदि खरा है तो आज हो या कल या चार दिन बाद ग्राहक जमा होंगे ही । माल अच्छा नहीं होने पर हजार कोशिशें करने पर भी दुकान नहीं । चलेगी । दो - चार दिन हो या महीने में दिवाला पिट हो जाएगा ।
  • जीवन में वास्तविक असफलता एक ही है और वह यह कि मनुष्य जिस बात को जिस रूप में जानता है , उसी में तल्लीन न रहे । 
  • अपने सुधार के बिना परिस्थितियां नहीं सुधार सकती । अपना दृष्टिकोण बदले बिना जीवन की गतिविधियां नहीं बदली जा सकती । इस तथ्य को मनुष्य जितनी जल्दी समझ लें , उतना ही अच्छा है । 
  • विश्वास कार्य सिद्धि का जनक है , इससे योग्यता को ही बल मिलता है । वह दूनी हो जाती है , मानसिक शक्तियों को सहारा मिलता है , वह पुष्ट हो जाती है और शक्ति बढ़ जाती है ।
  • महत्वाकांक्षी बनो और उसकी कोई सीमा न होने दो । अकर्मण्यता के जीवन से यशस्वी जीवन और मृत्यु अधिक अच्छी है । 
  • दृढ़ निश्चय और परिश्रम के बल पर किसी जगह भी पैदल चलकर पहुंचने की सम्भावना है । परन्तु वे लोग कभी अपने लक्ष्य तक नहीं । पहुंच पाते जो घोघों के दलदल में ही परिक्षण करते हैं । 
  • सफल होने का दृढ़ विश्वास अथवा आस्था , हमारा संकल्प हमें कठिनाइयों से पार ले जाते हैं । 
  •  विश्वास के बल पर ही कुछ लोग बुरे समय में भी मुस्कुराते रहते हैं । और अपनी कार्यसिद्धि की शक्ति को प्रबल करते हैं । 
  • एक बार मन की खिड़कियां खोलिए , बुद्धि पर पड़ा पर्दा उठाइये । और इसी समय यह दृढ़ निश्चय कीजिए कि मैं आशावादी हूं , मुझमें निराशा का नामोनिशां भी नहीं है । 
  • यदि तुम ध्यान से देखोगे तो पाओगे कि प्रतिक्षण तुम्हारा विश्वास आगे की ओर बढ़ता जा रहा है ।  
  • बहुत सी तथा बड़ी गलतियां किए बिना कोई मनुष्य बड़ा या अच्छा नहीं बनता । 
  • तुम्हारे अन्दर दृढ़ विश्वास है तो आने वाली प्रत्येक बाधा तुम्हारे लिए सहायक बन जाएगी । यदि कोई मनुष्य अप्रसन्न है , तो यह उसी का दोष है , क्योंकि ईश्वर ने तो सभी को प्रसन्न बनाया है । 
  •  सफलता होगी ही , ऐसा मन में । दृढ़ विश्वास करें । विश्वास ही जीवन है और संदेह मृत्यु है । 
  • जो दूसरों पर शासनकाल करना चाहता है , पहले उसे स्वयं पर शासन करना चाहिए । 
  • शांत रहो और धैर्य रखो , तुम प्रत्येक पर शासन कर सकते हो । 
  • चारित्रिक सौन्दर्य के दो आधार हैं इच्छा शक्ति और आत्म संयम । इनके लिए दो बातें अनिवार्य हैं गहरी अनुभूति और उन पर सुदृढ़ नियंत्रण | 
  • वास्तविक गौरव आत्म विजय से उत्पन्न होता है , अन्यथा विजेता होकर भी विजित ही रहोगे । 
  • जिस समय क्रोध उत्पन्न होने वाला हो , उस समय उसके परिणामों पर विचार करो । 
  • सम्पूर्ण संसार को एकता के सूत्र में बांधने की योजनाएं बनाना सरल है , किन्तु अपने हृदय में रहने वाले क्रोध पर विजय पाना अत्यन्त कठिन है ।  
  • यह कमरा कभी वीर सम्राट हेनरी पंचम का आवास था । उसने अग्नि कोर्ट के समरांगण में शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी , किन्तु स्वयं को वश में करने के लिए उसे बड़ा कठिन संघर्ष करना पड़ा । 
  • तुम्हारा मन सफलता , कार्यसिद्धि और सांमजस्य के भावों से परिपूर्ण होनी चाहिए । 
  • बुराई से कभी किसी को लाभ नहीं हुआ , न ही होगा ।
  • धर्महीनता से कभी कोई सम्पन्न । नहीं हुआ । समाज ऐसे व्यक्ति को पसन्द नहीं करता । शिष्ट लोग ऐसी हैं दुर्बलताओं से दूर भागते हैं और उनके घृणा करते हैं । 
  • मात्र एक आवेश पूर्ण बात से । परिवार में , आस - पड़ोस में , राष्ट्र में झगड़ा पैदा हो सकता है और हुआ है । संसार में भी जितने संघर्ष छिड़े हैं , उनमें से आधे तो कुवचन के कारण हुए हैं । 
  • स्त्रियों के रोने - धोने का आधा भाग अस्तित्व में ही न आए , यदि वे व्यर्थ की बातें , जिन्हें वे स्वयं व्यर्थ मानती हैं , मुंह से न निकालें । कई 
  • बार तो ऐसी बातें न कहने का संकल्प भी कर बैठती हैं , परन्तु फिर भी कह बैठती हैं । 
  • यदि केवल बड़े - बड़े अपराधों से व्यक्ति का पाला पड़ता है तो यह पतन से बच सकता है और सदा सुकर्मी रह सकता है , किन्तु दिन प्रति - दिन छोटे - छोटे दुष्कर्मों के कारण मानव को पराजय का मुंह देखने का अभ्यास सा हो जाता है । 
  • मनुष्य जब तक अपना संकल्प दृढ़ नहीं करता , तब तक आगे नहीं बढ़ सकता । 
  • व्यक्ति को चाहिए कि भय को स्वयं पर हावी न होने दें । भयग्रस्त रहना एक बीमारी है । एक ऐसी बीमारी जो आपके जीवन को नर्क बना देती है । 
  • चलते चलो , जनाब बढ़ते चलो जो कठिनाइयां तुम्हारे समक्ष आएंगी , वह क्रमश : तुम्हारे लिए प्रगति के साथ ही साथ सुलझती जाएंगी । बढ़ते चलो , उजाला हो जाएगा और तुम्हारे मार्ग में नित बढ़ने वाली स्वच्छता के साथ | चमक - दमक आती जाएगी । 
  • एक सामान्य सी कल्पना ने ही बड़ा रूप धारण किया है ।  
  • एक साधारण सा वाक्य यदा कदा इतिहास की धारा पलट देता है 
  • एक छोटा सा पवित्र विचार व्यक्ति का जीवन बदलकर रख देता आत्मविश्वास के द्वारा दुर्गम पथ भी सुगम हो जाता है । 
  • केवल वही जीवन में उन्नति कर रहा है जिसका हृदय कोमल , रूधिर उष्ण और मस्तिष्क तीक्ष्ण होता जाता है और जिसके मन को शांति मिलती जाती है । 
  • हमारी समस्त सफलता का रहस्य यह है कि हमने तत्काल जुट जाने का स्वभाव बना लिया था और अवसर को उसकी शिखा से पकड़ लेते थे , लेकिन दूसरों का स्वभाव था कि वे शिथिल में पड़े रहते । और अंत तोगल्वा हाथ मलते रह जाते हैं । 
  • किसी एक व्यक्ति को रोशनी दिखाना अच्छा है , बजाए इसके कि सारी सृष्टि के अलोकित करने के स्वप्न ही देखें ।
  • इस प्रकार एक बीज में सम्पूर्ण वृक्ष की प्रकृति निहित रहती है , ठीक उसी प्रकार से प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के प्रारम्भिक काल में उसके भावी जीवन का विकास एवं तैयारी छिपी होती है । 
  • पशुत्व का एक क्षण किसी भी मनुष्य से घोरतम पाप करा सकता है । 
  • गरीब होना और गरीब मालून पड़ना , यह कभी तरक्की न करने का एक निश्चित मार्ग है । 
  • आत्मविश्वास बढ़ाने की रीति यह है कि तुम यह काम करो , जिसे करते हुए तुम डरते हो । इस प्रकार ज्यों - त्यों तुम्हें सफलता मिलती जाएगी , तुम्हारा आत्मविश्वास बढ़ता चला जाएगा । 
  • जो आलसी है , कायर है , अभिमानी और लोक चर्चा से डरने वाले हैं । तथा सदा समय की प्रतीक्षा में बैठे रहते हैं , ऐसे लोगों को अपने अभिष्ट की प्राप्ति नहीं होती । 
  • गरीबी लज्जा नहीं परन्तु गरीबी से लज्जित होना लज्जा की बात है । आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है. 
  • आवश्यकता बहुधा प्रतिमा को प्रोत्साहित करती है । 
  • आवश्यकता कायर को भी वीर बना देती है । 
  • यह आत्मविश्वास रखो कि तुम पृथ्वी के सबसे आवश्यक मनुष्य हो । कृतज्ञता का गुण बड़े परिणाम के पश्चात् विकसित होता है ।  बड़े काम की छोटी बातें
  • आत्मविश्वास सरीका दूसरा मित्र नहीं । आत्मविश्वास ही भावी उन्नति की प्रथम सीढ़ी है । 
  • इस धरती पर वीर पुरूष ही नाम अमर कर जाते हैं । कायर नर तो जीवन भर बस रो - रोकर मर जाते हैं । 
  • जीवन में कठिनाइयां या संघर्ष हमें निराश करने अथवा उदास करने के लिए नहीं आते , बल्कि हममें साहस और शक्ति का संचार करने के लिए आते हैं । 
  • जिस मनुष्य को अपने मनुष्यत्व का मान है , वह ईश्वर के सिवा और किसी से नहीं डरता । 
  • आप जिस किसी पर दया करते हैं , उसके मन में आपका नाम अमिट अक्षरों में लिखा जाता है । 
  • संकट के समय मनुष्य को जब कोई हमदर्दी दिखाता है तो चाहे बाह्य संकट से निवृति न भी हो , तो भी उसके दिल को तसल्ली हो जाती है । 
  • जब तक आप अपने आप में ऊंचे चढ़ने की शक्ति न प्राप्त कर लें , तब तक आप अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते हैं । 
  • मनुष्य के शुभ और कल्याणकारी कार्य इस संसार में उसी प्रकार चमकते हैं जैसे सूर्य , चन्द्र और तारे । 
  • जिसके विचार जितने आशावादी होंगे उसे उतनी ही सफलता मिलेगी । वह उतनी ही उन्नति करेगा । 
  • निराशा या शंका आपका मन तोड़ देती है ।
  • आपके मुख से निकले ' दया ' के दो । शब्द यदि किसी को प्रसन्नता प्रदान कर सकते हैं और आप वे न करें तो इससे बढ़कर अन्य नीच काम कोई नहीं हो सकता । दया वह भाव है । जिसमें आपको न तेल लगाना है न बाती । परन्तु यह किसी के अंधेरे घर में प्रकाश फैला सकती है । 
  • जो व्यक्ति परोपकार में अपना सब कुछ गंवा देता है वह मरकर भी अमर हो जाता हैं ।
  • जो अपने सद्गुणों की स्मृतियां छोड़ जाते हैं , समय की गर्त उसके नाम को धूमिल नहीं कर पाती । 
  • जिस प्रकार सुगंध के बिना पुष्प व्यर्थ है , उसी प्रकार व्यक्तित्व के बिना व्यक्ति । 
  • सौ में से निन्यानवें व्यक्ति उन्नति नहीं कर पाते और मध्यम दर्जे के हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी वाणी को प्रशिक्षित करने की पूरी योग्यता का ज्ञान अर्पण ही नहीं किया । 
  • कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं , जो दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं , जो दूसरों के व्यक्तित्व को आकर्षित करके उसको दबा देते हैं और उसको अपना दास बना लेते हैं । 
  • मानव मुख उसका अपना जीवन ग्रंथ है । 
  • जो व्यक्ति जीवन के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहता है , उसे हमेशा आशावादी होना चाहिए । 
  • जो बुरे , निषेधात्मक , विध्वंसात्मक , निराशाजनक विचारों से मुक्त हो । गया , वह सफल हो गया समझो ।  
  • जिसमें लगन है , वह साधन भी पा जाता है । यदि नहीं तो वह उन्हें पैदा करता है । 
  • यदि हमारी इच्छा शक्ति शुद्ध और कमजोर होगी तो हमारी मानसिक शक्तियों का कार्य भी वैसा ही होगा । 
  • मनुष्य जीवन की सफलता इसी में है । कि वह उपकारी के उपकार को कभी न भूले । उसके उपकार से भी बढ़कर उसका उपकार कर दे । 
  • जीवन में सफलता पाना प्रतिभा और अवसर की अपेक्षा एकाग्रता | और निरन्तर प्रयास पर कहीं । अधिक अविलम्बित है । 
  •  किसी काम को करने से पहले उस काम को करने की दृढ़ इच्छा मन में कर लें और सारी मानसिक शक्तियों को उस ओर झुका दें जिससे आपको बहुत अधिक सफलता प्राप्त होगी । 
  • पवित्र और दृढ़ इच्छा सर्वशक्तिमान होती है । 
  • लग्नशीलता के बल पर आप सब कुछ कर सकते हैं । अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए आप अपने में लगन को पैदा करें । लगन के साथ काम करें । 
  • छोटी - सी लोहे की पिन चुभ जाए तो टिटनैस हो सकता है । 
  • भूलने की छोटी - सी आदत हमें दूसरों की दृष्टि में गिरा देती है । 
  • सदा आनन्दमय और नयी - नयी । अभिलाषाएं उत्पन्न करने वाले वातावरण में रहे ।  
  • अपना लक्ष्य , अपना आदर्श हमेशा प्रकाशमान रखें । उसे कभी धुंधला न पड़ने दें । 
  • छोटी - छोटी बातें अत्यंत महत्वपूर्ण होती है । इनकी उपेक्षा न कर , हमेशा इन पर ध्यान रखना चाहिए । 
  • एक छोटी - सी फुंसी लापरवाही के कारण बड़ा नासूर बन जाती है । 
  • कुछ लोग बातें करते समय कंधे । उचकाकर अजब ढंग से हाथ पैर हिला हिला कर बातें करते  हैं । बातचीत के दौरान इस प्रकार | की हरकतें भद्दी लगती हैं । सीधे सीधे बात करिए । 
  • जीवन को व्यवस्थित कीजिए । उबड़ - खाबड़ जीवन तो जानवर भी नहीं जाते , वे भी अपने नियमों पर चलते हैं । 
  • काम को टालने की बुरी आदत छोड़ दीजिए । जो सामान जहां से लें . वहीं रखें । 
  • हर काम को एक डायरी में नोट करें और यथा समय करें ।  
  • जो काम न कर सके , उसे करने में हामी न भरें । शालीनता से इंकार कर दें ।   स्वयं पर आवश्यका से अधिक काम का बोझ न लादें । 
  • बातें करते समय शरीर काबू में रखें । अनावश्यक रूप से हाथ पैर या दीदे न मटकाएं । 
  • बिना आज्ञा लिए किसी - दूसरे की । वस्तु इस्तेमाल न करें । 
  • शिष्टाचार का मूल सिद्धांत है , दूसरे को अपने प्रेम व आदर का परिचय देना व ध्यान रखना कि किसी को असुविधा या कष्ट न पहुंच जाए । अकेले सुकरात का मूल्य दक्षिण केरोलिन की सब रियासतों से भी । बहुत अधिक है । 
  • नम्र होना एक महान गुण है । अनेक व्यक्ति इस संसार में जो काम धन के बल से निकालते हैं , वही काम अकेली नम्रता भी करके दिखा सकती है । उसका तत्काल प्रभाव पड़ता है । 
  • जो पैसा लेकर अपनी बात नहीं बेचते , अपने परामर्श का मूल्य नहीं लेते । 
  • जिन्हें अपने काम का ज्ञान है , उसकी सूझ - बूझ है और सदैव तन - मन से लगे रहते हैं. 
  • कई बार विवेक बुद्धि आवश्यक बातों के आगे झुक जाती है और उनका उपयोग करती है । यदि व्यक्ति कार्य - कुशल न हो अथवा न रहे तो उसके बने बनाए सब काम बिगड़ जाते हैं । इसके अतिरिक्त वह उपहास का पात्र भी बन जाता है । 
  • जो नाम की इच्छा के बिना साहस और खामोशी से अपना काम करते रहते हैं । 
  • जो अपने हृदय में भावनाओं को | छिपाए बिना सच्ची स्थिति को निःसंकोच प्रकट कर देते हैं । 
  • जो ईमानदार हैं , जिनकी नस - नस में ईमानदारी भरी है जिनका हृदय दिशा दर्शक यन्त्र के समान अच्छाई की ओर ही दिखता है । 
  • बात प्रिय हो , पर ओछी न हो . चुहलपूर्ण हो , पर बनावट न लिए । हो , स्वच्छंद हो , पर अश्लील न हो , विद्वता पूर्ण हो , पर दम्भयुक्त न हो , अनोखी हो , पर असत्य न हो । 



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