Type Here to Get Search Results !

दृष्टि दान hindi story: रबिन्द्रनाथ टैगोर की श्रेष्ठ कहानी

दृष्टि दान hindi story: रबिन्द्रनाथ टैगोर की श्रेष्ठ कहानी 

दृष्टि दान

दृष्टि दान-hindi story| hindi kahaniyan | रबिन्द्रनाथ टैगोर की श्रेष्ठ कहानी

सुना है कि आजकल बहुत - सी भारतीय लड़कियों को अपनी कोशिश  से अपने लिए पति चुनना और संग्रह करना पड़ता है । मैंने भी ऐसा ही किया है , किन्तु देवता की मदद से । मैं बचपन ही से बहुत से व्रत - उपवास और शिव - पूजा करती आई हूँ । 

मैं पूरे आठ बरस की भी न हो पाई थी कि मेरा ब्याह हो गया । किन्तु शायद पहले जन्म के पाप के कारण मैं अपने अच्छे पति को पाकर भी पूरा न पा सकी । माता त्रिनयनी ने मेरी दोनों आखें ले ली । उन्होंने मुझे जीवन के अन्तिम क्षण तक पति को देखते रहने का सुख नहीं दिया । 

बचपन से ही मेरी अग्नि - परीक्षा शुरू हुई । चौदहवां साल पूरा भी न हो पाया कि मैंने एक मरा हुआ बच्चा जना , और खुद भी लगभग मौत के पास पहुंच गई । किन्तु जीवन में जिसे दुख भोगने हैं , भला वह मर कैसे सकती है ? जो दिया जलने के लिए पैदा हुआ है , उसमें तेल कम नहीं होता , वह तो रात - भर जलकर फिर बुझता है । 

मरते - मरते बच तो गई , किन्तु देह की कमजोरी , मानसिक दुख या और किसी भी कारण से हो , मेरी आंखों में दर्द शुरू हो गया , और आखें खराब होने लगी । 

मेरे पति उन दिनों डाक्टरी पढ़ रहे थे । नई विद्या सीखने के उत्साह में इलाज करने का कोई मौका हाथ लगते ही वे निहायत खुश हो जाते । मेरी आखें खराब होने लगी तो उन्होंने खुद ही मेरा इलाज करना शुरू कर दिया । 

मेरे बड़े भाई साहब उस साल वकालत की परीक्षा देने के लिए ला कालेज में पढ़ रहे थे । उन्होंने एक दिन आकर मेरे पति से कहा , " तुम यह कर क्या रहे हो , भाई ? कुमुद को अन्धी ही कर डालोगे क्या ? किसी अच्छे डाक्टर को क्यों नहीं दिखाते ? ' 

मेरे पति ने कहा , “ अच्छा डाक्टर आकर नया इलाज क्या करेगा ? दवा वगैरह तो सब मालूम ही है । " 

भाई साहब को कुछ गुस्सा - सा आ गया , बोले , " तब तो फिर तुममें और तुम्हारे कालेज के प्रिंसिपल में कोई फर्क ही नहीं ! " 

पति ने कहा , “ तुम कानून पढ़ रहे हो , डाक्टरी का तुम क्या जानो ! जब तुम ब्याह कर चुकोगे तब तुमसे मैं पूछूगा कि तुम्हारी पत्नी की जायदाद पर अगर कोई मुकदमा चला बैठे ,   तो तब तुम क्या मेरी सलाह पर चलोगे ?"

में मन - ही - मन सोच रही थी कि ' राजा - राजाओं की लड़ाई में बेचारे सिपाहियों की शामत है । मेरे पति के साथ भइया की खटपट हो गई , पर दोनों ओर से चोट मुझ ही पर पड़ने लगी । मैंने सोचा , ' मायकेवालों ने जब मुझे दान ही कर दिया है , तब फिर मेरे बारे में क्या करना चाहिए और क्या नहीं , इन सब बातों में वे क्यों पड़ते हैं ? मेरी बीमारी और तन्दुरुस्ती , मेरा सुख और दुख , सबकुछ मेरे पति का ही तो है । ' 

उस दिन मेरे इस मामूली - से आंख के इलाज को लेकर भाई साहब के साथ मेरे पति का मनमुटाव - सा हो गया । एक तो वैसे ही मेरी आंखों से पानी गिरता था , और फिर तो मेरी वह आंसुओं की धारा और भी बढ़ गई । इसका असल कारण मेरे पति या भाई साहब दोनों में से कोई भी न समझ पाए । 

मेरे पति के कालेज चले जाने पर , एक दिन शाम को , अचानक भाई साहब आ गए डाक्टर लेकर । डाक्टर ने परीक्षा करके कहा , " सावधानी से इलाज न हुआ और इसी तरह बदपरहेजी होती रही , तो ताज्जुब नहीं कि आँखों से ही हाथ धोना पड़े । ' डाक्टर ने दवा लिख दी और भाई साहब ने उसी वक्त दवा मंगाने के लिए आदमी भेज दिया ।

 डाक्टर के चले जाने पर मैने भाई साहब से कहा , " भइया , तुम्हारे में पैरों पड़ती हूँ , मेरा जो इलाज हो रहा है उसमें तुम अब किसी तरह की रुकावट मत डालो । 

बचपन ही से मैं भाई साहब से खूब डरा करती थी । उनसे मैं इस तरह मुह खोलकर बात कर सकी , मेरे लिए यह बड़े आश्चर्य की बात थी । किन्तु मैंने यह खूब अच्छी तरह समझ लिया था कि मेरे पति से छिपाकर भइया जो मेरा इलाज करा रहे हैं , मेरे लिए यह अशुभ के सिवा शुभ हर्गिज नहीं हो सकता । भाई साहब को भी मेरी इस ढिठाई से शायद कुछ अचम्भा हुआ । वे कुछ देर चुप रहकर , खूब सोच - विचारकर , अन्त में बोले , “ अच्छा , अब में डाक्टर नहीं लाऊंगा । लेकिन , जो दवा मंगाई है उसे ठीक तरीके से ले लेना , फिर देखा जाएगा । 

दवा आने पर मुझे उसकी सेवन - विधि समझाकर भाई साहब चले गए । 

पति के कालेज से वापस आने के पहले ही मैंने दवा की शीशी , डिबिया , फुरफुती वगैरह सब उठाकर अपने आंगन के कुएं में फेंक दी । 

भाई साहब के साथ मानो कुछ विरोध करके ही पति ने दूने उत्साह से मेरी आंखों का इलाज करना शुरू कर दिया । वे सुबह - शाम दोनों वक्त दवा बदलने लगे । आंखों पर पट्टी बांधी , चश्मा लगाया , बूंद - बूंद  दवा डाली , पाउडर लगाया , बदबूदार मछली का तेल पीया , भीतर का खाया - पीया और अंतड़ियां तक सब बाहर निकल आने लगी , उसे भी सहा । पति पूछते , “ अब कैसी मालूम होती हैं ? मैं कहती , “ अच्छी ही हैं , फायदा है । ' और मैं भीतर से भी महसूस करने की कोशिश किया करती कि मुझे आराम हो रहा है । जब ज्यादा पानी गिरने लगता तो सोचती कि पानी का निकल जाना ही अच्छा है और जब पानी गिरना बन्द हो जाता तो सोचती कि ' अब तो आराम हुआ ही समझो । '

किन्तु कुछ दिन बाद दर्द असह्य हो उठा , आंखों से धुंधला दीखने लगा , और सिर में तो ऐसा दर्द होने लगा कि उससे में बहुत ही दुखी और परेशान हो गई । मेरे पति भी शायद कुछ शर्मिन्दा - से मालूम हुए । और इतने दिन बाद अब वे किस बहाने से डाक्टर बुलावे , कुछ तय न कर सके । 

मेने उनसे कहा , ' भाई साहब की बात रखने के लिए एक बार किसी डाक्टर को दिखाने में हर्ज क्या है ? भाई साहब नाराज हो गए हैं , इससे मेरा जो दुख पा रहा है । इलाज तो तुम्ही करोगे , फिर भी एक डाक्टर का रहना अच्छा है ।

 पति ने कहा , " तुम ठीक कह रही हो । 

और फिर , उसी दिन वे एक अंगरेज डाक्टर को बुला लाए । दोनों में अगरेजी में क्या बातचीत हुई , सो मैं नहीं कह सकती , लेकिन इतना में समझ गई कि साहब ने मेरे पति को कुछ डाटा - फटकारा , और वे सिर झुकाए चुपचाप खड़े रहे । 

डाक्टर के चले जाने पर , मैंने अपने पति का हाथ पकड़कर कहा , तुम तो न जाने कहां से एक गवार गोरे गधे को पकड़ लाए , किसी देशी डाक्टर को लाते । मेरी आँखों की बीमारी को गोरा डाक्टर क्या तुमसे भी ज्यादा समझ सकता है । 

पति ने कुछ सकोच के साथ ही कहा , " आंखों में नश्तर कराना पड़ेगा । 

मैने जरा गुस्सा लाकर कहा , “ नश्तर कराना होगा , यह तो तुम खुद ही जानते थे , सिर्फ तुमने मुझसे छिपा रखा था । तुम क्या समझते हो कि मैं  नश्तर से डरती हूँ ? 

उनका संकोच दूर हो गया । वे बोले " आंखों में नश्तर लगाने की बात सुनकर न डरे , मरदों में ऐसे बहादुर कितने निकलेंगे ? " 

मैंने मजाक में कहा , “ अजी , मरदों की बहादुरी तो सिर्फ औरतों के सामने ही है । 

उसी क्षण उनके चेहरे पर फीकी गम्भीरता छा गई , बोले , " ठीक कह रही हो तुम । मरदों में सिर्फ घमंड -  ही- घमंड है । "

मैंने उनकी गम्भीरता को फूंक से उड़ाते हुए कहा , " अजी , घमंड में भी तो तुम लोग औरतों से बाजी नहीं मार सकते । उसमें भी अन्त में हमारी ही जीत होती है । 

इस बीच में भाई साहब भी आ गए । मैंने उन्हें अकेले में ले जाकर कहा , " भाई साहब , तुम्हारे उस डाक्टर की दवा से अब तक मेरी आंखें कुछ - कुछ अच्छी हो रही थीं , पर एक दिन भूल से पीने की दवा आंखों में डालने और लगाने की दवा पी जाने से आंखों की यह हालत हो गई कि डाक्टर कहते हैं , आंखों में नश्तर लगवाना पड़ेगा । " 

भाई साहब ने कहा , " मैं तो समझता था कि तेरे पति का इलाज चल रहा है । इसी से मैं गुस्से में इतने दिनों से आया नहीं । ' 

मैंने कहा , " नहीं तो । मैं छिपे - छिपे उसी डाक्टर की दवा ले रही थी । कहीं वे नाराज न हो जाएं , इस डर से उनसे कहा नहीं मैंने । " ' 

स्त्री ' का जन्म लेकर इतना झूठ बोलना पड़ता है कि जिसकी हद नहीं । भाई साहब का मन भी नहीं दुखा सकती , और पति के यश को भी ज्यों - का - त्यों रखना मेरे लिए लाजिमी है । मां होकर बच्चे को भी बहलाना पड़ता है , और स्त्री होकर बच्चे के बाप को भी खुश रखना पड़ता है । उफ , स्त्रियों के लिए इतने छल - छन्द की जरूरत होती है ! 

इस छल - छन्द का नतीजा यह हुआ कि अन्धी होने के पहले मैं अपने भाई और पति का मिलन देख सकी । भाई ने सोचा कि ' छिपे - छिपे इलाज करने से यह गड़बड़ी हुई ' , और पति ने सोचा कि ' शुरू में ही अगर वे मेरे भाई की बात मान लेते तो ऐसा होता ही क्यों ! यह सोचकर दोनों भारी दिल से भीतर - ही - भीतर क्षमाप्रार्थी - से होकर आपस में एक - दूसरे के बहुत ही करीवी हो गए । मेरे पति भाई साहब की सलाह लेने लगे , और भाई साहब भी बड़े विनय के साथ सब विषयों में मेरे पति की राय पर ही भरोसा करने लगे । 

अन्त में दोनों की सलाह से एक दिन एक अंगरेज डाक्टर ने आकर मेरी वाईं आंख में नश्तर लगाया । कमजोर आंख उस नश्तर की चोट को झेल न सकी , और उसकी रही - सही मामूली ज्योति भी सहसा जाती रही । उसके बाद बची हुई दाहिनी आंख भी धीरे - धीरे अन्धकार से ढंक गई । वचपन में ब्याह के दिन ' शुभदृष्टि ' के समय जो चन्दन - चर्चित जवान मूर्ति मेरी आंखों के सामने पहले - पहल प्रकट हुई थी , मेरे लिए उस पर हमेशा के लिए परदा पड़ गया । 

एक दिन मेरे प्राणनाथ ने मेरे पलंग के पास बैठकर कहा , “ अब मैं तुम्हारे सामने अपनी झूठी बड़ाई न करूंगा - तुम्हारी आंखें मैंने ही ले ली ! ' 

मालूम हुआ , उनका गला भर आया है । मैंने दोनों हाथों से उनका दाहिना हाथ दवाकर कहा , " अच्छा किया , तुम्हारी चीज तुमने ले ली । सोचो तो जरा , अगर किसी डाक्टर के इलाज से मेरी आंखें जाती रहतीं , तो उससे मुझे क्या तसल्ली मिलती ! 

होनहार जबकि मिटती ही नहीं , तो आंखें तो मेरी कोई वचा ही नहीं सकता था , वे आंखें तुम्हारे हाथ से गईं , मेरे अन्धेपन का सबसे बड़ा सुख तो यही है ! जब पूजा के फूल घट गए थे , तो स्वयं रामचन्द्र अपने देवता को अपनी आंखें निकालकर चढ़ाने को तैयार हो गए थे । 

मैंने अपने देवता को अपनी दृष्टि दी है , इससे बढ़कर सौभाग्य मेरे लिए और क्या हो सकता है ! तुम्हें अपनी आंखों से जब जो अच्छा लगे , मुझसे कह दिया करना , उसे मैं तुम्हारी आंखों - देखा प्रसाद जानकर मन में रख लिया करूंगी । " 

मैं इतनी बातें नहीं कह सकी थी , मुंह से इस तरह की बातें शायद कही भी नहीं जा सकतीं । हां , सिर्फ इन बातों को मैं बहुत दिनों तक मन में विचारती रही हूं । बीच - बीच में ऐसी थकावट आती थी कि मेरी उस निष्ठा का तेज भी मन्द पड़ जाता । मैं अपने को वंचित , दुखित और दुर्भाग्य में जलती हुई अभागिनी समझने लगती , और तब मैं अपने मन से ये सब बातें कहला लेती । 

मैं अपनी इस शान्ति और भक्ति की सहायता से अपने को दुख से भी ऊंचा रखने की कोशिश करती रहती । उस दिन बातों - ही - बातों में और कुछ - कुछ चुप रहकर अपने मन के भाव को सायद मैं उन्हें किसी तरह समझा सकी थी । 

उन्होंने कहा ,"कुमुद, अपनी मूर्खता से मैं जो कुछ तुम्हारा नष्ट कर पुकार उसे अब मैं तुम्हें वापस नहीं दे सकता , किन्तु जहाँ तक मेरा बसच लेगा  , तुम्हारी आँखों की कमी दूर करने के लिए मैं हमेशा तुम्हारे साथ साथ रहूगा ।

मेने कहा," यह कोई काम की बात नहीं हुई । तुम अपनी घर - गृहस्थी को अंधों  का अस्पताल बना रखोगे , यह मैं हरगिज़ न होने दूंगी । तुम्हें दूसरा ब्याह करना ही होगा । ' 

किसलिए दूसरा ब्याह करना जरूरी है . इस बात को विस्तार से कहने के पहले ही मेरा गला रुक - सा आया । जरा खासकर , जरा कुछ संभाल , में कुछ कहना ही चाहती थी कि इतने में मेरे पति ठंडी सांस छोड़ने के साथ बोल उठे , ' मैं मूर्ख हूं , किन्तु दम्भी नहीं हूं , कुमू ! मैंने अपने हाथों से अन्धा बनाया है तुम्हें , उस पर सिर्फ अन्धी होने की वजह से तुम्हें छोड़कर अगर में दूसरा ब्याह करू , तो अपने इष्टदेव गोपीनाथ की सौगन्ध खाकर कहता हूँ , मैं ब्रह्म हत्या और पितृ - हत्या के पाप का पातकी होऊ । "

 इतनी बड़ी सौगन्ध उन्हें मैं हरगिज न खाने देती , उन्हें मैं वीच ही में रोक देती   ; किन्तु , मेरे आंसू उस समय छाती फाड़कर , कंठ दबाकर , आंखों में आकर झरना चाहते थे , मैं उन्हें रोकने में ही लगी हुई थी , मुंह से कुछ निकाल ही न सकी । 

उन्होंने जो कुछ कहा , उसे मैं परम आनन्द के और चरम सुख के बहाव से तकिये में मुंह छिपाकर रोने लगी । मैं अन्धी हूं , फिर भी वे मुझे नहीं छोड़ेंगे ! दुख की तरह मुझे अपने हृदय में छिपा रखेंगे ! इतना सुहाग , इतना सौभाग्य मैं नहीं चाहती , पर मन जो सुनकर स्वार्थी ठहरा ! 

अन्त में , आंसुओं की पहली वर्षा जोरों से हो चुकने के बाद , उनके मुह को अपनी छाती के पास लाकर मैंने कहा , " ऐसी कड़ी सौगन्ध क्यों खाई तुमने ? हाय - हाय मैंने क्यों तुम्हें अपने सुख के लिए ब्याह करने को कहा था । सौत से मैं अपना मतलब साधती । आंखों की कमी से तुम्हारा जो काम मुझसे ना होता वह काम मैं उससे करा लेना चाहती थी"

 उन्होंने कहा , “ काम तो दासी भी कर देती है , जो काम मुझसे न होता वह काम मैं उससे करा लेना चाहती थी । " कुमू ! मैं काम के सुभीते के लिए एक दासी के साथ ब्याह करके उसे अपनी इस देवी के साथ एक आसन पर बिठा सकता हूं ! " यह कहते हुए उन्होंने मेरा मुंह उठाकर मेरे माथे पर एक चुम्बन रख दिया । उस चुम्बन ने मानो मेरा तीसरा नेत्र खोल दिया । मानो उसी क्षण मेरा देवी के रूप में अभिषेक हो गया ।

 मैंने मन - ही - मन कहा , ' यही अच्छा है । जब अन्धी ही हो चुकी हूँ , तो बाहर की इस घर - गृहस्थी की गृहिणी ही क्यों बनी रहूं ! अब तो मैं उससे भी ऊपर रहकर , देवी होकर , पति का मंगल करूंगी । अब झूठ नहीं , छल नहीं , गृहिणी - रमणी के जितने भी छोटेपन हैं , जितने भी छल - छन्द सबको दूर करके , भीतर से , बाहर से बिल्कुल पवित्र हो जाना है मुझे । ' 

उस दिन , दिन - भर अपने ही साथ मेरा एक तरह का विरोध चलता रहा । कठिन प्रतिज्ञा में बंधकर मेरे पति हरगिज दूसरा ब्याह न कर सकेंगे , इसका आनन्द भीतर - ही - भीतर मानो मेरे दिल को काटता रहा । उसे किसी भी तरह छुड़ाकर अलग न कर सकी । आज मेरे अन्दर जिस नई देवी ने जन्म लिया है , उसने कहा , ' शायद ऐसा भी दिन आ सकता है कि जब प्रतिज्ञा पालने की अपेक्षा ब्याह करने से तुम्हारे पति का ज्यादा मंगल हो सकता है । 

किन्तु मेरे अन्दर जो पुरानी औरत थी , उसने कहा , ' इससे क्या , जबकि वे प्रण कर चुके हैं , तब तो ब्याह कर ही नहीं सकते । देवी बोली , ' पर इसमें तुम्हारे खुश होने की तो कोई वजह नहीं । ' मानवी ने कहा , ' सब समझती हूं , पर जबकि वे प्रतिज्ञा कर चुके हैं , तो फिर ' ... वह इत्यादि । बार - बार वही एक ही बात ! तब फिर देवी ने कुछ नहीं कहा , चुप बनी रही , उसने भौंहें चढ़ा लीं । किसी एक भयंकर आशंका के अंधेरे से मेरा सारा मन छा गया । 

मेरे दुखी स्वामी , नौकर - नौकरानियों से मेरा काम करने की मनाही करके , खुद ही मेरा सब काम करने लगे । जरा - जरा - सी बात के लिए इस तरह पति पर निर्भर रहना , पहले तो अच्छा ही लगने लगा । कारण , इसी बहाने उन्हें हर वक्त अपने पास पाती । आंखों से मैं उन्हें देख नहीं सकती थी , इसलिए हमेशा उन्हें अपने पास पाने की हवस बहुत ज्यादा बढ़ गई । 

पति के चेहरे का जो हिस्सा मेरी आँखों को मिला था , उसे अब अन्य इन्द्रियां आपस में बांटकर अपना हिस्सा बढ़ा लेने की कोशिश करने लगीं । फिर ऐसा हो गया कि मेरे पति अगर बहुत देर तक बाहर किसी काम के लिए चले जाते , तो ऐसा मालूम होता कि जैसे मैं बिल्कुल शून्य में हूं , और अपने चारों तरफ टटोलती फिरती हूं , फिर भी मुझे कहीं भी कुछ मिल नहीं रहा है , मानो मेरा सबकुछ खो गया हो । 

पहले , पति जब कालेज जाते थे तब मैं उनके आने में देर होती तो सड़क की तरफ की खिड़की को जरा खोलकर उसकी संध में से उनकी राह देखा करती थी । जिस दुनिया में वे घूमा - फिरा करते थे उस दुनिया को मैंने अपनी आंखों से अपने साथ बांध रखा था , पर आज मेरा दृष्टिहीन सारा शरीर उन्हें ढूंढ़ने की कोशिश करता रहता है । 

उनकी दुनिया के साथ मेरी दुनिया का जो पुल बंधा हुआ था , आज वह टूट गया है । अब , उनके और मेरे बीच एक गहरी ' अन्धता की खाई ' है - अब मुझे केवल निरुपाय बेचैनी के साथ बैठा रहना पड़ता है कि ' कब वे अपने उस पार से मेरे इस पार आकर मुझसे मिलें । ' इसलिए अब , जब वे क्षण - भर के लिए भी मुझे छोड़कर चले जाते हैं तो मेरा सारा अन्धा शरीर उद्यत होकर उन्हें पकड़ना चाहता है , हाय - हाय करके उन्हें पुकारने लगता है । 

किन्तु इतनी आकांक्षा , इतनी चाह , इतना आसरा - भरोसा तो अच्छा नहीं होता । एक तो वैसे ही पति पर पली का भार काफी होता है , उस पर अपने इस अन्धेपन का भारी बोझ उन पर लादना ठीक नहीं । अपनी इस दुनिया में फैले अन्धकार को मैं अकेली ही झेलूंगी , अकेली ही ढोऊंगी । मैंने एकाग्र मन से यही प्रतिज्ञा की कि अपनी इस अनन्त अन्धता की रस्सी से पति को मैं अपने साथ बांधकर हरगिज नहीं रखेंगी । 

थोड़े ही दिनों में केवल शब्द - गन्ध - स्पर्श से ही मैंने अपना सारा काम करना सीख लिया । यहां तक कि बहुत - से घर के काम तो मैं पहले से भी ज्यादा चुस्ती के साथ करने लगी । और बाद में तो ऐसा मालूम होने लगा कि दृष्टि हमारे काम में जितनी सहायता पहुंचाती है , उससे कहीं ज्यादा हमें विक्षिप्त कर देती है । 

जितना देखने से भलाई होती है , आंखें उससे कम बहुत ज्यादा देखा करती हैं । और , आंखें जब पहरा देने का काम करती है , कान तब आलसी हो जाते हैं , जितना उन्हें सुनना चाहिए उससे वे ही सुनते हैं । अब चंचल आंखों की अनुपस्थिति में मेरी और सब इन्द्रियां अपना कर्तव्य शान्ति के साथ पूरा पालन करने लगीं । 

अब मैं अपने पति को अपना कोई काम नहीं करने देती , बल्कि उनका सारा काम फिर मैं पहले की तरह ही करने लगी । 

स्वामी ने मुझसे कहा , “ मेरे प्रायश्चित्त से तुम मुझे दूर कर रही हो । ' 

मैंने कहा , “ तुम्हारा प्रायश्चित्त कैसा , सो तो मुझे नहीं मालूम - किन्तु अपने पाप का भार मैं क्यों बढ़ाऊं ? " 

मुंह से चाहे वे कुछ कहें , मैंने जब उन्हें छुटकारा दिया , तो वे सांस लेकर मानो जी - से गए । 

उसके बाद , मेरे पति डाक्टरी पास करके मुझे साथ लेकर कलकत्ते के वाहर देहात में चले गए । गांव में जाकर ऐसा मालूम हुआ जैसे मैं मां की गोद में पहुंच गई होऊ । आठ बरस की उमर में गांव छोड़कर कलकत्ता आई थी । इसी बीच दस बरस में जन्मभूमि मेरे मन के अन्दर छाया की तरह धुंधली हो चली थी । 

जब तक आंखें थीं , कलकत्ता शहर मेरे चारों तरफ मेरी समूची यादों को अपनी ओट में छिपाए खड़ा था । आंखों के जाते ही मैं समझ गई कि कलकत्ता सिर्फ आंखों को बहलाए रखनेवाला शहर है , और बचपन का वह गांव अंधियारी रात के चमकते हुए तारे की तरह मेरे मन में उजला हो उठा । 

अगहन के अन्त में हम लोग हासिमपुर पहुंच गए । नई जगह थी । चारों तरफ कैसा दृश्य है , मैं कुछ देख न सकी ; किन्तु वचपन के गांव की उस गन्ध ने , उन अनुभूतियों ने मेरी सारी देह जकड़ ली । ओस से भीगे और नए जुते खेतों से आनेवाली सुबह की हवा से , अरहर और सरसों के हरे - सुनहले खेतों की आकाश - भरी मीठी सुगन्ध से , अहीरों के उन गीतों से , और क्या , टेढ़ी - मेढ़ी कच्ची सड़क से जानेवाली बैलगाड़ियों के चलने की आवाज तक से मैं खिल उठी । 

मेरी वे शुरू की जिन्दगी की पुरानी यादें अपनी नहीं कही जा सकनेवाली ध्वनि और सुगन्ध लिए मौजूदा वर्तमान की तरह मुझे घेर बैठीं । अन्धी आंखें उनका कुछ भी प्रतिवाद न कर सकीं । मैं अपने उसी बचपन में पहुंच गई । सिर्फ मां ही नहीं मिली , और सब मिल गया । भीतर - ही - भीतर मैं देखने लगी , मेरी दादी अपने बचे - खुचे सिर के बालों को खोलकर , धूप की ओर पीठ करके , बैठी - बैठी ' बड़ी दे रही हैं । 

पर उनके कांपते हुए पुराने कमजोर कंठ से गांव के साधु भजनदास के देहतत्त्व - सम्बन्धी गीत की गुनगुनाहट आज नहीं सुनाई दी । नवान्न का वह उत्सव सर्दियों की ओस से नहाए हुए आकाश में सजीव होकर उठ बैठा , किन्तु मूसल से नए धान कूटनेवाली गांव की औरतों में मेरी उन छोटी - छोटी सहेलियों का मेल - जोल कहां गया ! शाम होते ही जब पास से कहीं ' हम्बा ' ध्वनि सुनाई पड़ती तो याद उठ आती कि मां सन्ध्या - दीप हाथ में लिए ग्वालघर में दिया दिखाने जा रही हैं । 

साथ ही मानो भीगे हुए पुआल के जलने की गन्ध और धुआं आकर मेरे हृदय में प्रवेश करता , और फिर सुनाई देती तालाब के उस पार के विद्यालंकारों के मन्दिर से आती हुई कांसे के घंटे की ध्वनि । न जाने किसने मेरे बचपन के आठ वर्षों में से उनका सारा निचोड़ छानकर सिर्फ उसका रस और सुगन्ध मेरे चारों तरफ छोड़ दी है । 

इसी सिलसिले में बचपन के व्रत और सवेरे ही उठकर शिवपूजा के लिए फूल चुनने की बात याद आने लगती है । यह बात माननी ही पड़ेगी कि कलकत्ता में इधर - उधर की बातचीत और आने - जाने की गड़बड़ी से बुद्धि में थोड़ा - बहुत फर्क आ ही जाता है । धर्म - कर्म , भक्ति और श्रद्धा में गांव की - सी साफ - सुथरी नहीं रहती । 

उस दिन की बात मुझे याद आती है जिस दिन अन्धी हो जाने के बाद कलकत्ता में मेरी एक गांव की सखी ने आकर मुझसे कहा था , " तुझे गुस्सा नहीं आता . कुमू ? मैं होती तो अपने पति का कभी मुंह ही नहीं देखती । मैंने कहा , “ बहन , मुंह देखना तो वैसे ही बन्द है , उसके लिए इन जली आखों पर ही गुस्सा आता है । उन पर गुस्सा क्यों होऊ , बहन ! ' 

समय रहते अच्छे डाक्टर से इलाज नहीं कराया इसके लिए मेरी सहेली लावण्य को भी मेरे पति पर बहुत गुस्सा आया ; और उसने मुझे भी गुस्सा दिलाने की कोशिश की । 

मैंने उसे समझाया कि “ संसार में रहते हुए इच्छा और अनिच्छा से , जान और अनजान में , भूल और भ्रान्ति से अनेक प्रकार के सुख - दुख हुआ करते हैं , किन्तु मन के भीतर अपने पति को अगर स्थिर रख सकी , तो उस दुख में भी एक तरह की शान्ति मिलती है । नहीं तो सिर्फ गुस्से - गुस्सी में बक - झक करते - करते ही जीवन बीत जाता है ।

 आंखों से अन्धी हो गई , यही एक जबरदस्त दुख है , उस पर पति से मनमुटाव करके दुख का बोझ और क्यों बढ़ाऊं ? " मुझ जैसी लड़की के मुंह से पुराने जमाने की - सी बात सुनकर लावण्य गुस्सा होकर अवज्ञा से सिर हिलाकर झुंझलाती हुई चली गई । 

किन्तु , मुंह से में भी क्यों न कहूं , उसकी बातों में जहर तो था हो , उसकी बात बिल्कुल व्यर्थ नहीं गई । लावण्य के मुंह से निकली हुई क्रोध की बातों ने मेरे मन पर दो - एक चिनगारियां छोड़ दी थीं । मैंने उन्हें परा मे कुचलकर बुझा तो दिया , किन्तु फिर भी , दो - एक छाले तो रह ही गए । 

गांव में आकर शिव - पूजा के उस ठंडे शेफाली - फूल की सुगन्ध से मेरे दिल की सारी आशाएं और श्रद्धा , मेरे उस शिशुकाल की तरह ही , मानो नई और उज्ज्वल हो उठी । देवता ने मेरे दिल और मेरी घर - गृहस्थी को भरपूर कर दिया । मैं मस्तक नवाकर उनके चरणों पर लोट गई । कहा , " हे देव , मेरीआँखे  जाती रहीं , अच्छा ही हुआ , तुम तो मेरे हो । " 

किन्तु हाय , गलत कहा था मैंने । ' तुम मेरे हो ' ऐसा कहना भी दर्प है । में तुम्हारी हूँ ' , केवल इतना ही कहने का हक है मुझे । अरे , एक दिन मेरे देवता ही दबी आवाज में यह बात मुझसे कहला लेंगे । हो सकता है कि तब और कुछ भी न रहे , पर मुझे तो रहना ही होगा । किसी पर किसी तरह का मेरा जोर नहीं , सिर्फ अपने ही ऊपर है । 

कुछ दिन बड़े आनन्द से बीते । उधर डाक्टरी में मेरे पति का नाम भी होने लगा , सम्मान भी बढ़ने लगा । साथ ही कुछ रुपया भी इकट्ठा हो गया । मगर रुपया अच्छी चीज नहीं । वह मन को दबा देता है , हृदय को ढंक देता है । मन राज करता है तो वह अपना सुख आप ही गढ़ लेता है , किन्तु धन जब सुख इकट्ठा करने का भार लेता है , तो मन के लिए फिर कोई काम ही नहीं रह जाता । 

तब , पहले जहां मन का सुख रहता था , घर की चीज - बस्त , असबाब वगैरह उस जगह को घेर लेता है । तब सुख नहीं मिलता , सुख के बदले मिलता है , सिर्फ असबाब वगैरह ।

मैं किसी खास बात या खास घटना का वर्णन नहीं कर सकती । किन्तु अन्धों में महसूस करने की शक्ति कुछ ज्यादा होने से या और किसी कारण से इतना मुझे महसूस होने लगा कि आर्थिक उन्नति के साथ - साथ मेरे पति में परिवर्तन होने लगा है । यौवन के शुरू में तरह - तरह से धर्म - अधर्म के विषय में उनमें जो एक वेदना का अहसास था , उसमें मानो दिनों - दिन जड़ता आने लगी । 

मुझे याद है , वे किसी समय कहा करते थे , ' केवल रोजी के लिए ही डाक्टरी सीख रहा होऊ , सो बात नहीं , इससे गरीबों का भला भी किया जा सकता है । ' डाक्टर गरीब मरीजों के दरवाजे पर जाकर पेशगी फीस बिना लिए नाड़ी नहीं देखना चाहते , उनका जिक्र करते हुए मारे नफरत के उनकी जबान रुक जाती थी ।

मैं समझ रही हूं कि अब वे दिन नहीं रहे । अपने इकलौते लड़के की जान बचाने के लिए एक गरीब स्त्री ने उनके पैर पकड़ लिए थे , गिड़गिड़ाकर रोने लगी थी वह , किन्तु उन्होंने उसकी उपेक्षा की । अन्त में मैंने अपने सर की कसम देकर उन्हें भेजा , पर उन्होंने तबीयत से उसका इलाज नहीं किया । 

जब हम लोगों के पास रुपया कम था तब अन्याय से पैदा किए धन को वे किस दृष्टि से देखते थे , मैं जानती हूं । मगर अब , कि आज अब बैंक में बहुत रुपये जमा हैं । अब , एक दिन की बात है कि एक धना आदमी का गुमाश्ता आकर एकान्त में उनसे दो दिन तक बहुत - सी बाते कर गया । क्या वातचीत हुई मुझे नहीं मालूम , किन्तु उसके बाद जब वे मेरे पास आए और बेहद खुशी के साथ और - और विषयों में बहुत - सी बातें करने लगे , मुझे अपने भीतर की स्पर्शशक्ति से मालूम हुआ वे अपने ऊपर कालिख पोतकर आए हैं । 

अन्धी होने के पहले जिन्हें मैंने अन्तिम बार देखा था , आज मेरे वे दिल के देवता कहां हैं ? जिन्होंने मेरी दृष्टिहीन दोनों आंखों के बीच में चुम्बन करके मुझे एक दिन देवी के पद पर अभिषिक्त किया था , मैं उनका क्या कर सकी ? एक ही दिन की रिपु की आंधी से जिनका अचानक पतन होता है , और एक दिन के हृदयावेग से फिर वे चढ़ सकते हैं ; किन्तु यह जो दिन पर दिन क्षण - क्षण में भीतर से कठोर होते जाना है , बाहरी बातों में बढ़ते हुए हृदय - मन को तिल - तिल करके दबाते जाना है , इसका प्रतिकार सोचती हूं तो कोई राह ही ढूंढ़े नहीं मिलती । 

पति के साथ मेरा जो आंखों से देखने का अलगाव हुआ है , वह कुछ भी नहीं किन्तु प्राणों के भीतर जब मैं और भी ज्यादा हांफने लगती हूं , तब मैं समझती हूं कि जहां मैं हूं वहां वे नहीं हैं ! मैं अन्धी हूं , संसार के अंधेरे हृदय - प्रदेश में अपनी उस पहली उमर के नए प्रेम , परिपूर्ण भक्ति , अखंड विश्वास को लिए बैठी हूं मैं ; अपने देव - मन्दिर में जीवन के आरम्भ में अपने बचपन के उन नन्हें - नन्हें हाथों से मैंने जो हरसिंगार के फूलों की भेंट चढ़ाई थी , 

अभी तो उनकी ओस भी न सूख पाई होगी कि मेरे नाथ छाया से शीतल इस चिर नवीनता के देश को छोड़कर रुपये कमाने के पीछे इस संसार के रेगिस्तान में न जाने कहां अदृश्य होते चले जा रहे हैं ! जिन पर मेरा विश्वास है , मैं जिन्हें धर्म कहती हूं , जिन्हें मैं सारी सुख - सम्पत्ति से बढ़कर समझती हूं , वे बहुत दूर से मेरी ओर हंसते हुए

देख - भर रहे है । पर , कोई दिन ऐसा भी था जब यह अलगाव नहीं था । बचपन में हम दोनों ने एक ही रास्ते से यात्रा की थी । उसके बाद कब से मार्ग - भेद होना आरम्भ हुआ , उसे न तो वे ही समझ सके और न ही मुझे ही मालूम हुआ । अन्त में , आज जब मैं उन्हें पुकार रही हूं तो कोई जवाब ही नहीं मिलता । 

कभी - कभी मैं सोचती हूं कि शायद अन्धी होने की वजह से मामूली - सी बात को मैं बढ़ा - चढ़ाकर देखती हूँ । आखें होती तो शायद मैं संसार को ठीक संसार की तरह ही देख सकती और पहचान सकती । 

मेरे पति ने भी एक दिन मुझे यही बात समझाई थी । उस दिन सवेरे एक बूढ़ा किसान अपनी पोती को हैजे से बचा लेने की उम्मीद से उन्हें बुलाने आया था । मेरे कानों में भनक पड़ी , वह कह रहा था , " बेटा , मैं बहुत गरीब हूँ , पर परमात्मा तुम्हारा भला करेंगे । " मेरे दिल के देवता ने कहा , “ परमात्मा जो करेंगे , सिर्फ उतने ही से हमारा काम नहीं चलेगा । 

पहले तुम क्या करोगे सो बताओ । " सुनते ही मैं सोचने लगी , भगवान ने मेरी आंखें ले लीं , साथ ही कान भी क्यों नहीं ले लिए ! ' बूढ़े ने एक गहरी सांस ली , और ' हाय भगवान ' कहकर चल दिया । मैंने उसी वक्त महरी से कहकर उसे पीछे के दरवाजे से बुलवा लिया । उससे मैंने कहा , " यह रुपयों से तुम अपनी पोती का इलाज कराना , मेरे पति का भला चाहते हुए तुम इस मुहल्ले से हरीश डाक्टर को लेते जाओ । " 

किन्तु दिन - भर मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा , मुंह में रुचा ही नहीं कुछ । तीसरे पहर सोते से उठकर उन्होंने पूछा , " तुम आज उदास क्यों दीख रही हो ? " पहले की आदत का - सा उत्तर जबान पर आ रहा था कि ' नहीं तो , कुछ नहीं ' , पर छल - छन्द का जमाना मेरा बीत चुका , मैंने साफ - साफ कहा , " 

कितने ही दिनों से तुमसे कहना चाहती हूं , पर कहते - कहते क्या कहना है सो भूल जाती हूँ । मालूम नहीं , अपने मन की बात मैं ठीक तौर से समझा सकूगी या नहीं , लेकिन तुम चाहो तो जरूर अपने मन में समझ सकते हो कि हम दोनों ने जिस तरह एक होकर जीवन आरम्भ किया था , आज वह कुछ और ही तरह का हो गया है । " 

उन्होंने हंसकर कहा , “ परिवर्तन ही तो संसार का नियम है । " 

मैंने कहा , “ रुपया - पैसा , रूप - यौवन , सभी का तो परिवर्तन होता है , किन्तु नित्य वस्तु क्या संसार में कुछ है ही नहीं ? "

 तब उन्होंने जरा गम्भीर होकर कहा , " देखो , और - और स्त्रियां तो सचमुच के अभाव को रोती हैं - किसी का पति कमाई नहीं करता , तो किसी का प्रेम नहीं करता , और एक तुम हो कि आसमान से दुख ढूंढ़ लाती हो ! " 

मैं उसी वक्त समझ गई कि मेरी अन्धता मेरी आंखों में सच्चाई का काजल लगाकर मुझे इस परिवर्तनशील संसार से बाहर ले गई है , मैं अन्य स्त्रियों की तरह नहीं हूं , मुझे मेरे पति समझेंगे नहीं । 

इतने में , देश से एक फुफुआ सास चली आईं , अपने भतीजे की खबर - सुध लेने । हम दोनों ने उन्हें प्रणाम किया । आशीर्वाद देने के पहले ही वे बोल उठीं , " बहू , तुम तो अपनी तकदीर से अन्धी हो गईं , अब हमारा अविनाश अन्धी स्त्री को लेकर कैसे घर - गृहस्थी चलावे , बताओ ? उसका दूसरा ब्याह करा दो न ! ' 

इस पर मेरे पति अगर हंसी - हंसी में कह देते कि ' ठीक तो है , बुआजी , तुम्हीं लोग देख - भालकर कोई सम्बन्ध ठीक करा दो ' , तो सब झगड़ा ही तय हो जाता , किन्तु उन्होंने संकोच के साथ कहा , “ तुम तो , बुआजी , ऐसी ही बातें किया करती हो , जिसका सिर न पैर।"

बुआजी ने कहा , " क्यों , बेजा क्या कह रही हूं मैं ? अच्छा , बहू , तुम्ही बताओ , इसमें बेजा क्या कहा मैंने ? ' 

मैंने हंसते हुए कहा , " बुआजी , खूब अच्छे आदमी से तुम सलाह लेने बैठी ! जिसकी गांठ काटी जाएगी , उसी से राय पूछी जाती है कहीं ? " 

बुआजी बोली , “ हां , बात तो ठीक है । तो फिर हम दोनों अकेले में सलाह करेंगे , क्यों रे अविनाश ? लेकिन एक बात है बहू , कुलीन घर की स्त्रियों की जितनी ज्यादा सौतें हो उतना ही उनका स्वामी - गौरव बढ़ता है । हमारा लड़का डाक्टरी न करके अगर ब्याह करता रहता , तो उसे रोजगार की परवाह ही क्या थी ! 

रोगी डाक्टरों के हाथ पड़ते ही मर जाता है , मरने पर फिर फीस भी नहीं मिलती ; किन्तु विधाता का श्राप ऐसा है कि कुलीन की स्त्री मरती ही नहीं , और जितने दिन वह जीती है , उतना ही पति को फायदा - ही - फायदा है । " 

दो दिन बाद मेरे पति ने मेरे सामने ही बुआजी से पूछा , " बुआजी , अपना समझकर बिल्कुल अपनी - सी होकर बहू को मदद पहुंचाया करे ऐसी कोई अच्छे घराने की स्त्री तुम्हारी निगाह में है , जो यहां रह सके ? इसे आंखों से दीखता नहीं , इसलिए इसकी साथिन बनकर हमेशा कोई इसके पास रहे , तो मैं निश्चिन्त हो जाऊं । " 

मैं जब शुरू - शुरू में अन्धी हुई थी , तब वे यह बात कहते , तो ठीक भी था , किन्तु अब तो आंखों के अभाव में अपने या घर - गृहस्थी के काम में कोई खास अड़चन होती हो सो भी नहीं ; फिर भी बिना प्रतिवाद किए मैं चुपचाप बैठी रही । बुआजी ने कहा , “ बहुत , बहुत ! इसकी क्या कमी ! 

मेरे ही जेठजी की एक लड़की है । जैसी देखने में सुन्दर , वैसी स्वभाव की भी लक्ष्मी ! लड़की काफी बड़ी हो चुकी है , योग्य वर मिल नहीं रहा , लड़के की तलाश में हैं वे । तुम्हारे जैसा कुलीन मिल जाने पर तो वे तुरन्त ब्याह कर देंगे । " 

उन्होंने कुछ चौंककर कहा , " ब्याह के लिए कौन कह रहा है ! " 

बुआजी बोली , " लो , सुन लो , ब्याह बिना किए क्या भले घर की लड़की तुम्हारे घर यों ही आकर पड़ी रहेगी ? "

 वात विलकुल ठीक थी । मेरे पति से उसका कोई जवाब देते न बना । 

अपनी बन्द आंखों के अनन्त अन्धकार में अकेली खड़ी - खड़ी मैं ऊपर को मुंह उठाए पुकारने लगी , " भगवान , मेरे पति की रक्षा करो । " 

कुछ दिन बाद , एक रोज सवेरे मैं पूजा करके घर से निकल ही रही थी कि इतने में बुआजी ने आकर कहा , “ बहू , अपनी जिस जेठौती हेमांगिनी का मैने जिक्र किया था , आज वह आ गई देश से । हिम , ये तुम्हारी जीजी इन्हें प्रणाम करो । 

इतने में अचानक कहीं से वे भी आ पहुंचे , और आते ही मानो वे इस अजनबी स्त्री को देखकर लौट जाने के लिए तत्पर हुए । 

बुआजी ने कहा , " कहाँ चला , अविनाश ? ' 

मेरे पति ने पूछा , " ये कौन है ? " 

बुआजी ने कहा , “ यही तो है मेरी जेठीती हेमागिनी ! ' 

ये कब आई ' , ' किसके साथ आई ' , ' कैसे आई ' इत्यादि नाना प्रश्न करके वे बेकार का आश्चर्य प्रकट करने लगे । मैंने मन - ही - मन कहा , जो हो रहा है , सो तो मैं सब समझ रही हूँ , फिर उस पर छल - छन्द क्यों किया जा रहा है , दुबका - चोरी , दाबना ढकना , झूठी बात ? अगर अधर्म करना ही है , तो करो न । करोगे तो अपनी अशान्त आदत के लिए ही करोगे । मेरे लिए ऐसी गिरावट , इतना छल - छन्द क्यों करते हो ? मुझे बहलाए रखने के लिए इतना ढकोसला क्यों ? ' 

हेमागिनी का हाथ पकड़कर मैं उसे अपने सोने के कमरे में ले गई । उसके मुह पर , गालों पर हाथ फेरकर देखा , मुंह शायद सुन्दर ही होगा । उमर भी चौदह - पन्द्रह से कम न होगी । 

बालिका सहसा जोर से हंस पड़ी । बोली , " यह क्या कर रही हो ? मेरे ऊपर से भूत झाड़ रही हो क्या ? ' 

उसकी उस खुली सरल हसी से हम दोनों के बीच जो काले बादल थे , दे एक क्षण में दूर हो गए । दाहिना हाथ उसके गले में डालकर मैंने कहा , " मैं तुम्हे देख रही हूँ , बहन ! ' इतना कहकर मैंने उसके कोमल मुह पर फिर एक बार हाथ फेरा । " 

देख रही हो । ' कहकर वह फिर हंसने लगी । बोली , " मैं क्या तुम्हारे बगीच की सेम हूँ या बैंगन , जो इस तरह हाथ फेरकर देख रही हो कि कितनी बड़ी हुई । 

तब मुझसहसा खयाल आया कि हेमागिनी को शायद मालूम नहीं कि में अन्धी हूं । 

मैंने कहा , " बहन , मैं अन्धी जो हूं । " 

सुनते ही वह अचम्भे में पड़कर कुछ देर तक गम्भीर बनी रही । मुझे बिलकुल साफ मालूम हुआ कि उसने अपनी उत्सुकता - भरी बड़ी - बड़ी जवान आंखों से मेरे दृष्टिहीन नेत्र और चेहरे के भाव को खूब गहराई के साथ देखा , और उसके बाद कहा , “ अच्छा ! इसीलिए शायद चाची को तुमने यहां बुलाया है ? ” मैंने कहा , " नहीं , मैंने नहीं बुलाया , तुम्हारी चाची अपने आप ही आई हैं । " 

बालिका फिर हंसकर बोली , “ दया करके ! तब तो मालूम होता है दयामयी जल्दी टलनेवाली नहीं ! पर बाबूजी ने मुझे क्यों भेजा ? " 

इतने में बुआजी आ गईं । अब तक मेरे पति के साथ उनकी बातचीत हो रही थी । बुआजी के कमरे में घुसते ही , हेमांगिनी ने उनसे पूछा , " चाची , देश कब चलोगी , बताओ ? " 

बुआजी ने कहा , “ वाह री लड़की ! आते देर न हुई , जाने की पड़ गई तुझे ! ऐसी चंचल लड़की तो मैंने कहीं नहीं देखी ! " 

हेमांगिनी ने कहा , " सुनो चाची , तुम तो जल्दी यहां से जाती नहीं दिखाई देतीं । खैर , तुम्हारा तो यह घर ही ठहरा , जितने दिन चाहो , रहो तुम , पर मैं तो जाऊंगी , पहले ही से कहे देती हूं तुमसे ! ” इतना कहकर चट् - से उसने मेरा हाथ पकड़कर कहा , “ क्यों बहन , ठीक है न ? तुम लोग तो मेरे ठीक अपने नहीं हो ? " 

इसके इस सरल प्रश्न का कुछ उत्तर न देकर मैंने उसे अपनी छाती के पास खींच लिया । मैंने देखा कि बुआजी वैसे चाहे कितनी ही जबरदस्त क्यों न हों , पर इस लड़की को सम्हालना उनके बूते से बाहर है । बुआजी ने ऊपर से जरा भी गुस्सा न दिखाकर हेमांगिनी को लाड़ करने की कोशिश की , पर उसने उन्हें अपने ऊपर से झाड़कर फेंक दिया । बुआजी ने इन सब बातों को लाड़ली लड़की का लाड़ समझकर हंसकर उड़ा देना चाहा , और वे चली जा रही थी कि इतने में फिर क्या जाने क्या सोचकर लौट आई , और हेमागिनी से कहने लगीं , " हिमू , चल तेरे नहाने का वक्त हो गया । " 

हेम ने मेरे पास आकर कहा , " हम दोनों जनी घाट पर जाकर जाएगा । नहाएंगी , क्यों बहन ? " 

बुआजी की इच्छा के खिलाफ होने पर भी उन्होंने इस बात का विरोध नहीं किया , वे जानती थीं कि धींगा - धींगी करने से हेमागिनी की ही जीत होगी , और दोनों के बीच का विरोध भद्दे रूप में मेरे सामने प्रकट हो जाएगा।

पीछे के तालाब की तरफ जाते - जाते हेमांगिनी ने मुझसे पूछा , “ तुम्हारे कोई लड़का - बाला क्यों नहीं हुआ , बहन ? " 

मैंने जरा मुस्कुराकर कहा , “ क्यों नहीं हुआ , सो मैं कैसे कह सकती हूं ? भगवान ने नहीं दिया । " 

हेमांगिनी बोली , “ जरूर तुमने पहले जन्म में कोई पाप किया होगा । ' 

मैंने कहा , “ सो भी भगवान जानते होंगे । " 

बालिका ने प्रमाण के तौर पर कहा , " देखो न चाची को । मन की बहुत काली हैं न वे , इसी से उनकी कोख से कोई बच्चा ही नहीं होता । ' 

पाप - पुण्य , सुख - दुख , दंड और पुरस्कार का सिद्धान्त मैं खुद भी नहीं समझती , बालिका को भी समझाने की कोशिश नहीं की । सिर्फ एक गहरी सांस लेकर मैंने मन - ही - मन उससे कहा , ' तुम्हीं जानो । हेमागिनी उसी क्षण मुझसे लिपट गई , और हंसकर बोली , " अरे वाह रे , मेरी बात सुनकर तुम गहरी सांस लेती हो ! मेरी बात पर भला कोई ध्यान देता होगा । " 

 धीरे - धीरे मालूम होने लगा कि मेरे पति के डाक्टरी व्यवसाय में बड़ी रुकावटें आने लगी हैं । दूर से बुलावा आने पर तो वे जाते ही नहीं , और आस - पास कहीं से बुलावा आने पर वे झटपट काम खत्म करके घर चले आते हैं । पहले तो काम से फुरसत मिलने पर दोपहर को खाने और सोने के समय सिर्फ भीतर आते थे , पर अब तो बुआजी चाहे जब उन्हें बुला भेजती और वे भी बगैर जरूरत बुआजी की खबर - सुध लेने चले आते हैं । 

बुआजी जब पुकारकर कहतीं कि ' हिमू , मेरा पानदान तो ले आ जरा ' , तो में समझ जाती कि बुआजी के कमरे में मेरे स्वामी मौजूद हैं । पहले - पहल दो - चार दिन तक हेमांगिनी पानदान , तेल की प्याली , सिन्दूर की डिबिया आदि लेकर पहुंचाती रही , किन्तु बाद में वह बार - बार बुलाई जाने पर भी खुद न जाकर महरी के हाथ ही सब चीजें भेजने लगी । बुआजी बुलाती , हेमागिनी , हिमू , हिमी ! ' पर बालिका मानो मेरे प्रति अपने एक दर्द के बहाव से मुझसे उलझी ही रहती , एक तरह की आशंका और दुख उसे घेरे रहता । और इसके बाद से तो वह भूलकर भी मेरे सामने मेरे पति का जिक्र तक न करती । 

इतने में , एक दिन भाई साहब मुझे देखने आए । मैं समझती थी कि भइया की दृष्टि तेज है । यहां क्या हो रहा है , उनसे छिपाना लगभग असम्भव है , क्योंकि वे बड़े कठोर विचारक हैं ; वे अन्याय पर रत्ती भर भी रहम करना नहीं जानते । सबसे ज्यादा डर मुझे इस बात का था कि मेरे स्वामी उन्हीं के सामने अपराधी के रूप में खड़े होंगे । मैंने ज्यादा ही खुशी दिखलाकर सबकुछ को ढंक रखा । 

मैंने ज्यादा बातें करके , ज्यादा उतावली दिखाकर , बहुत ज्यादा धूमधाम मचाकर चारों ओर मानो एक तरह की धूल उठा रखने की कोशिश की । किन्तु मेरे लिए यह सब इतना अस्वाभाविक सिद्ध हुआ कि वही मुझे पकड़वा देने का कारण बन गया । किन्तु भाई साहब ज्यादा दिन ठहर न सके । 

मेरे पति ऐसा ढीलापन दिखाने लगे कि साफतौर से उसने रुखाई का रूप धारण कर लिया । भइया चले गए । जाने के पहले अपने दिल के समूचे स्नेह के साथ मेरे माथे पर बहुत देर तक अपना कापता हुआ हाथ रखे रहे , और मन - ही - मन एकाग्र चित्त से क्या आशीर्वाद देते रहे सो मैं समझ गई । उनके आंसू मेरे आसू से भीगे हुए गालों पर आ - आकर गिरने लगे । 

साफ याद है मुझे , चैत के दिन थे । उस दिन शाम के वक्त लोग हाट 

धिक्कार है , धिक्कार है मुझे ! मेरे लिए इतनी चातुरी , इतना छल , इतना कपट ! क्यों ? मैं क्या सचाई से डरती हूँ ? मैं क्या चोट से कभी  घबराई हूँ ? उन्हें क्या मालूम नहीं कि जब मैंने उनकी खुशी में अपनी खुशी समझकर अपनी दोनों आंखें दी थीं , तब मैंने अपने चिर अन्धकार को कितनी ख़ुशी से अपना लिया था ?

अब तक मेरे और उनके बीच सिर्फ अन्धता का ही परदा था , पर आज से उस पर एक और परदा पड़ गया ।मेरे पति भूलकर भी कभी हेमांगिनी का नाम मेरे सामने जबान पर नहीं लाते । मानो उनकी दुनिया से हेमागिनी सदा के लिए एकदम गायब हो गई हो , मानो उनके मन पर उसने कभी भी जरा - सी लकीर तक न खींची हो ! किन्तु इधर चिट्ठी - पत्री से वे हमेशा उसकी खबर पाते रहते हैं , इस बात का मैं अनायास ही अनुभव कर लिया करती हूं । 

जैसे , तालाब में बरसात का पानी जिस रोज जरा भी ज्यादा आ जाता है , उसी वक्त कमल के डंठल में खिंचाव पड़ता है , उसी तरह उनके भीतर जिस दिन जरा भी बाढ़ आती , जरा भी उफान आता , उसी दिन अपने दिल की जड़ में मुझे उसका पता लग जाता है । खिंचाव ऐसी ही चीज है ! कब उन्हें हेमांगिनी की खबर मिलती और कब नहीं , मुझसे कुछ छिपा नहीं रहता । 

किन्तु मैं उन्हें उसकी याद नहीं दिला सकती थी । मेरे अंधेरे दिल के आकाश में वह जो एक उन्मत्त , उद्दाम , उजला , सुन्दर तारा जरा देर के लिए उगा था , उसकी जरा खबर पाने और थोड़ी - बहुत चर्चा करने के लिए मेरा जी प्यासा - सा बना रहता , किन्तु फिर भी अपने पति के सामने क्षण - भर के लिए उसका नाम लेने का भी मुझे अधिकार न था और इस तरह हम दोनों के बीच वाक्य और वेदना से भरा ऐसा एक तरह का सन्नाटा जमा बैठा था , जिसकी याद आते ही दिल दुखने लगता है । 

बैसाख महीने के बीचोंबीच एक दिन महरी ने आकर मुझसे पूछा , " बहूजी , नदी किनारे घाट पर आज अपनी नाव कहां के लिए तैयार हो रही है ? बाबूजी कहीं जा रहे हैं क्या ? " 

मैं खुद समझ रही थी कि कुछ तैयारियां - सी हो रही हैं , और अब फिर मेरे भाग्य के आकाश में आंधी के पहले का - सा सन्नाटा और उसके बाद प्रलय के छितराए हुए बादल आ - आकर जम रहे हैं ; और यह भी अनुभव कर रही थी कि स्वयं संहार करनेवाले शंकर सूनी उंगली के इशारे से अपनी सारी प्रलय - शक्ति को मेरे सिर पर इकट्ठा कर रहे हैं । महरी से मैंने कहा , " कहां , मुझे तो अभी तक कोई खबर नहीं मिली ! " 

महरी ने फिर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं की । एक गहरी सांस लेकर चली गई वह । 

बहुत रात बीते पति ने आकर मुझसे कहा , " दूर से मेरा बुलावा आया है , सो कल सवेरे ही मुझे रवाना होना पड़ेगा । लौटने में दो - तीन दिन की देरी होगी । " 

मैं तुरन्त बिस्तर से उठकर खड़ी हो गई , और बोली , “ क्यों तुम मुझसे झूठ बोल रहे हो ? " 

पति ने कांपते हुए स्वर से कहा , “ झूठ मैंने क्या कहा ? " 

मैंने कहा , " तुम ब्याह करने जा रहे हो ! " 

वे चुप रह गए । मैं ज्यों - की - त्यों स्थिर खड़ी रही । बहुत देर तक घर में बिलकुल सन्नाटा रहा । अन्त में मैंने कहा , " कुछ तो जवाब दो । कहो कि हां , मैं ब्याह करने जा रहा हूं ! ' 

उन्होंने प्रतिध्वनि की भांति उत्तर दिया , " हां , मैं ब्याह करने जा रहा हूँ। " 

मैंने कहा , “ नहीं , तुम नहीं जा सकते । मैं तुम्हें इस महासंकट से , इस महापाप से बचाऊंगी ही । इतना भी अगर न कर सकी , तो मैं तुम्हारी पत्नी ही किस बात की ? किसलिए मैंने इतनी शिव पूजा की थी ? " 

फिर बहुत देर तक सन्नाटा रहा । मैंने जमीन पर पड़कर उनके पैरों से लिपटकर कहा , " मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है , कौन - सा अपराध किया है मैंने तुम्हारा , जो आज तुम्हें दूसरी पत्नी की जरूरत पड़ गई ? तुम्हें मेरे सर की कसम है , सच - सच बताओ । " 

तब मेरे स्वामी ने धीरे - धीरे कहा , " सच - सच ही कह रहा हूँ । तुम्हारे अन्धेपन ने तुम्हे एक न खत्म होनेवाले पर्दे में घेर रखा है , तुम तक में किसी भी तरह पहुंच ही नहीं पाता । तुम मेरी देवी हो , देवी के समान भयानक हो , तुम्हारे साथ मैं रोजमर्रा की घर - गृहस्थी नहीं चला सकता । 

ऐसी एक साधारण स्त्री चाहिए मुझे कि जिस पर में बक - झक सकू , गुस्सा हो सकू , जिससे मैं प्यार कर सकू , लाड़ कर सकू , जिसे मैं गहने - कपड़े बनवाके दे सकू । " 

" मेरी छाती के भीतर चीरकर देखो , मैं बिलकुल साधारण स्त्री हूं या नहीं ! देखोगे , ब्याह के दिन की उस बालिका के सिवा और कुछ भी नहीं हूँ मैं । मैं तुम पर श्रद्धा करना चाहती हूं , भरोसा करना चाहती हूं , तुम्हारी में पूजा करना चाहती हूं । तुम अपना अपमान करके , मुझे दुसह दुख देकर , मुझे अपने से बड़ा मत बनाओ , प्रियतम ! मुझे सब विषयों में अपने पैरों के नीचे रखो , नाथ ! " 

मैंने क्या - क्या बातें कही थीं , सो क्या मुझे याद हैं ! विक्षुब्ध समुद्र क्या अपना गर्जन स्वयं सुन पाता है ? सिर्फ इतना याद है कि मैंने कहा था , ' अगर मैं सती होऊं , तो भगवान साक्षी रहे , तुम किसी भी तरह अपनी धार्मिक प्रतिज्ञा भंग न कर सकोगे । उस महापाप के होने के पहले या तो में विधवा हो जाऊंगी , या हेमांगिनी नहीं बचेगी । ' यह कहते - कहते मैं देहोश होकर गिर पड़ी । 

जब मुझे होश आया , तब तक पौ फटने पर बोलनेवाली चिड़ियों ने चहचहाना शुरू नहीं किया था , और मेरे स्वामी चले गए थे । 

अपने घर के ठाकुरद्वारे में दरवाजा बन्द करके मैं पूजा करने बैठ गई । तमाम दिन में बाहर नहीं निकली । शाम को बड़े जोर की आधी आई , तूफान था वह , सारा मकान कापने लगा । फिर भी मैंने यह नहीं कहा कि ' हे भगवान , मेरे पति इस समय नदी में हैं , उनकी रक्षा करो ! ' मैं एकाग्र चित्त से केवल यही कहने लगी कि ‘ भगवान् , मेरे भाग्य में जो बदा है सो होगा , पर मेरे स्वामी को तुम इस महापातक से बचाओ । ' 

सारी रात बीत गई । उसके दूसरे दिन भी मैंने अपना आसन नहीं छोड़ा । बिना खाए - पीए और बिना सोए मुझे किसने बल दिया , मालूम नहीं , मैं पाषाण - मूर्ति के सामने पत्थर की मूरत की तरह ज्यों - की - त्यों स्थिर बैठी रही । 

शाम के वक्त बाहर से दरवाजे पर धक्के का शब्द सुनाई दिया । दरवाजा तोड़कर जब लोग भीतर घुसे , तब मैं बेहोश पड़ी थी । 

बेहोशी दूर होने पर मैंने सुना , ' जीजी ! ' आंख खोलकर देखा कि मैं हेमांगिनी की गोद में पड़ी हूं । सिर हिलाते ही मालूम हुआ कि वह ब्याह के कपड़े पहने हुए है । भीतर से मेरी पसलियां तक चीख उठी , ' हां भगवान , मेरी प्रार्थना नहीं सुनी तुमने ! आखिर मेरे स्वामी का पतन हो ही गया ! ' 

हेमांगिनी ने सिर झुकाकर धीरे - से मुझसे कहा , “ जीजी , तुम्हारी असीस लेने आई हूं मैं । " 

पहले तो मैं क्षण - भर के लिए पत्थर - सी कठोर हो गई , फिर दूसरे ही क्षण उठके बैठ गई । मैंने कहा , " तुम्हें आशीर्वाद दूंगी , बहन ! तुम्हारा क्या कसूर ! " 

हेमांगिनी अपने स्वाभाविक मिठास - भरे और ऊंचे स्वर में हंस उठी , और बोली , “ कसूर ! तुम खुद ब्याह करो तो कसूर नहीं , और मैं करूं तो कसूर है ? " 

हेमांगिनी से लिपटकर मैं भी हंसने लगी । मन - ही - मन कहा , ' संसार में मेरी ही प्रार्थना क्या सबसे बढ़कर है ? उनकी इच्छा क्या कोई चीज ही नहीं ! जो चोट पड़ी है वह मेरे ही सिर पर पड़े , पर दिल के भीतर जहां मेरा धर्म है , जहां मेरी श्रद्धा है , वहां उसे हरगिज न पड़ने दूंगी । मैं जैसी थी वैसी ही रहूंगी । ' 

हेमांगिनी ने मेरे पांव पड़कर पांव की धूल अपने माथे से लगा ली । मैंने कहा , “ तुम चिर सौभाग्यवती होओ , बहन , चिर सुखी होओ ! "

हेमागिनी ने कहा , " आज सिर्फ असीस देकर ही छुटकारा नपा सकोगी , जीजी ! अपनी बहन और बहनोई को भी तुम्हें अपने हाथों से वरण करना होगा । तुम सती हो , तुम्हारा आशीवाद ही हम दोनों के जीवन का मूलधन होगा , जीजी ! उनकी शरम करने से काम न चलेगा । अगर आज्ञा हो , तो उन्हें मैं ले आऊ भीतर ? " 

मैंने कहा , " जाओ , ले आओ । " 

कुछ देर बाद मेरे कमरे में नई आहट ने प्रवेश किया । स्नेह का एक प्रश्न मेरे कानों में पड़ा , “ अच्छी तरह हो , कुमू ? " 

मैंने उतावली के साथ बिछौने से उठकर भाई साहब के पांव के पास प्रणाम करके कहा , “ भइया ! " 

हेमागिनी बोली , “ भइया कैसे ? जरा कान तो ऐंठ दो इनके । अब ये तुम्हारे भइया नहीं , छोटे बहनोई हैं ! " 

तब मैं सब बात समझ गई । मुझे मालूम था , भइया की प्रतिज्ञा थी कि वे ब्याह नहीं करेंगे । मां नहीं थी , कह - सुनकर ब्याह करानेवाला और कोई भी न था । अब शायद मैंने ही उनका ब्याह करा दिया । मेरी दोनों आंखों से आंसुओं की वर्षा - सी होने लगी , किसी भी तरह मैं उन्हें रोक न सकी । भइया धीरे - धीरे मेरे बालों में हाथ फेरने लगे , और हेमांगिनी मुझसे लिपटकर सिर्फ हंसती ही रही । 

रात को नींद नहीं आ रही थी , मैं बेचैन मन से पति के आने की आशा कर रही थी । लज्जा और निराशा को वे कैसे दूर करेंगे , मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था । 

बहुत रात बीते धीरे - धीरे दरवाजा खुला । मैं चौंककर बैठ गई । मेरे पति के पैरों की आहट थी । छाती के भीतर मेरा दिल और उसके साथ मेरी पसलियां भी पछाड़ें खाने लगीं । 

उन्होंने बिस्तर पर आकर मेरा हाथ थामकर कहा , " तुम्हारे भइया ने ही मुझे बचाया है । मैं क्षण - भर के मोह में आकर मरने जा रहा था । उस दिन जब मैंने नाव पर पैर रखा , तब मेरी छाती पर कितना भारी पत्थर जमा बैठा था , सो मैं जानता हूं या भगवान ही जानते हैं । जब नदी में जोर की आंधी आई तो प्राणों का भी भय हो रहा था , और साथ ही यह भी सोच रहा था कि डूब जाऊं तो मेरा उद्धार हो जाए । 

माथुरगंज में पहुंचते ही सुना कि एक दिन पहले ही तुम्हारे भइया के साथ हेमांगिनी का ब्याह हो गया है । कितनी लज्जा से और कितने आनन्द से नाव पर वापस आया , सो मैं कह नहीं सकता । इन्हीं दो दिनों में मैं खूब अच्छी तरह समझ गया हूं कि तुम्हारे बगैर मुझे सुख नहीं , तुम्हारे सिवा मेरे लिए और कहीं भी कोई शान्ति नहीं , तुम मेरी देवी हो । ' 

मैंने हंसकर कहा , “ नहीं , मुझे देवी बनाने की जरूरत नहीं , मैं तुम्हारे घर की गृहिणी हूं , मैं तुम्हारी साधारण पली - मात्र हूं , और कुछ भी नहीं । " 

स्वामी ने कहा , “ मेरी भी एक बात तुम्हें रखनी होगी । मुझे अब देवता कहकर कभी भी किसी दिन शर्मिन्दा मत करना । मैं भी तुम्हारा साधारण पति हूं , तुम्हारा प्रेमी हूं , और कुछ भी नहीं । " 

दूसरे दिन उलू - ध्वनि और शंख - ध्वनि से सारा मुहल्ला गूंज उठा । 

हेमांगिनी उठते - बैठते , नहाते - खाते , सोते - जागते , शाम - सवेरे , हर वक्त मेरे पति का मजाक उड़ाने लगी । वे बेचारे तंग आ गए , परेशान हो गए । किन्तु , वे कहां गए थे , क्या हुआ था , मुझसे किसी ने भी उसका कोई जिक्र तक नहीं किया ।

इस कहानी ने आपको कितना प्रभावित किया कमेँट करके बताये-

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

Top Post Ad

Below Post Ad

Hollywood Movies