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हमारी आश्रम व्यवस्था एवं कुछ बातें माँ - बाप के लिए

आश्रम व्यवस्था वेदों के अनुसार , सौ वर्षीय जीवन को ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ और संन्यास के 25-25 वर्षों के चार बराबर भागों में बांटा गया है । वा
Santosh Kukreti

आश्रम व्यवस्था

वेदों के अनुसार , सौ वर्षीय जीवन को ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ और संन्यास के 25-25 वर्षों के चार बराबर भागों में बांटा गया है । वानप्रस्थ और संन्यास को लेकर आपको दो कथाएं सुनानी हैं । 

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महाभारत युद्ध के बाद विदुर अपने भ्राता धृतराष्ट्र व गांधारी को संन्यास आश्रम में प्रवेश करने को कहते हैं , परंतु धृतराष्ट्र कहते हैं कि अपने 100 पुत्रों की स्मृति को छोड़ कर वे कहां जाएं । लेकिन उनका राजमहलों में रहना भी कष्टदायक हो जाता है , क्योंकि भीम उन्हें तरह - तरह के ताने देते हैं । 

यहां तक कि अपने 100 पुत्रों के श्राद्ध के समय तर्पण के लिए सोना व गाय तक दान नहीं देने देते । काफी संत्रास झेलने के बाद अंतत : धृतराष्ट्र , गांधारी , कुंती , संजय और विदुर संन्यास आश्रम का पालन करने को वन में प्रस्थान करते हैं । 

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दूसरी कथा में वृद्ध होने के बाद भी बिंदूसार अपने पुत्र अजातशत्रु को राजपाठ नहीं सौंपते । अधीर हो अजातशत्रु अपने पिता की हत्या का षड्यंत्र करता है और पकड़ा भी जाता है । लेकिन पुत्रमोह में फंसे बिंदूसार अपने पुत्र को माफ कर देते हैं । बिंदूसार के चिकित्सक जीवक समझाते हैं कि या तो पुत्र को दंड दो या राज्य दे दो , परंतु सम्राट् राजमोह को त्याग न सके । 

उधर अजातशत्रु की धृष्टता समाप्त नहीं होती और एक दिन फिर विद्रोह कर अपने पिता को ही कारावास में डाल देता है । अपना पुत्र होने पर अजातशत्रु को जब पिता होने का एहसास होता है तो वह कारावास से अपने पिता को मुक्त करने का आदेश देता है , परंतु तब तक बिंदूसार इस दुनिया को ही छोड़ चुके होते.

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इन कथाओं का सार है कि अगर धृतराष्ट्र और बिंदूसार समय रहते वानप्रस्थ आश्रम का पालन करते , राजपाठ से मोहत्याग कर अपनी नई पीढ़ी को स्वेच्छा से शासन सौंप गृहत्याग देते तो उन्हें इन कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता । 

वानप्रस्थ आश्रम का अर्थ है ' आत्मोद्धाराय जगत हिताय ' अर्थात् अपना उत्थान कर जगत का कल्याण करना । अपने को निजी परिवार से ऊपर उठा पूरे संसार के साथ जोड़ना , जो उसी का ही परिवार है । वानप्रस्थ आश्रम ही व्यक्ति को सही अर्थों में संसार से जोड़ता है । 

ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम में व्यक्ति को घरेलू ज़िम्मेवारियों से बाहर सोचने की फुर्सत ही नहीं मिलती , परंतु संसार भी उसी का ही परिवार है यह सोचने का अवसर वानप्रस्थ आश्रम देता है । 

इस अवस्था में व्यक्ति को घरेलू ज़िम्मेवारियां अगली पीढ़ी को संभालानी चाहिएं और घर का मार्गदर्शन करते हुए सामाजिक कार्यों में अपने को लगाना चाहिए । याद रखें कि नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करें उसमें हस्तक्षेप नहीं ।

कुछ बातें माँ - बाप के लिए  

  • वर्तमान युग में व्यक्ति के लिए न तो परिवार छोड़ना और न ही वन में जाना संभव है , परंतु वह घर में रह कर ही इस आश्रम व्यवस्था का पालन कर सकता है । जैसे:-
  • बेटे के व्यवसाय व बहू के गृहकार्य में सहयोग करें , हस्तक्षेप करने से बचें । 
  • पौते - पौतियों को संस्कारित करें । उन्हें ज्ञानप्रद कहानियां , रामायण , महाभारत, उपनिषदों की कथाओं, महापुरुषों की कथायें सुनाए.
  • सामाजिक कार्यों में हिस्सा लें । जैसे कोई छोटा सा पुस्तकालय , कौशल विकास केंद्र , ट्यूशन सेंटर , सिलाई केंद्र , बाल संस्कार केंद्र चला सकते हैं । 
  • झुग्गी - झोंपड़ी के बच्चों को पढ़ाने , वहां माताओं - बहनों को स्वरोजगार का प्रशिक्षण देने का काम कर सकते हैं । 
  • गौशाला , बालाश्रम , वृद्धाश्रम , महिला केंद्र से जुड़ कर सेवा कर सकते 
  • छोटी - छोटी भजन मंडलियां , गीता प्रसारिणी सभा , रामायण प्रचार - प्रसार केंद्र चला कर ग़रीब बस्तियों , मोहल्लों , गांवों में निशुल्क भजन - कीर्तन , पाठ के आयोजन कर सकते हैं । 
  • वनवासी कल्याण आश्रम के साथ जुड़ कर देश के वनवासी क्षेत्रों में चल रहे सेवाकार्यों में अपना सक्रिय सहयोग दे सकते हैं । 
  • खाली स्थानों पर पौधे लगा कर , उनकी परवरिश करके पर्यावरण सुधारने की सेवा कर सकते हैं । 
  • इनके अतिरिक्त अपनी सुविधा , रुचि , संसाधनों की उपलब्धता , समाज की आवश्यकता अनुसार कोई अन्य सेवा का काम शुरू कर सकते हैं । कहने का भाव कि वानप्रस्थ जीवन का अर्थ है कि पूरे संसार को अपना परिवार मानते हुए अपने घर के दायरे से निकल कर इस बड़े परिवार की सेवा करना । अपने निजी परिवार के संचालन का काम अगली पीढ़ी को सौंपने की तैयारी करना है ।

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