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सचिन तेंदुलकर: हर पल को जियो और उसका पूरा आनंद लो | Sachin Tendulkar motivational speech in Hindi

Sachin Tendulkar motivational story/speech: 11 साल की उम्र में खेलना शुरू किया था , तब पता नहीं था कि मैं भारत के लिए खेलूंगा मैं बस खेलना चाहता था ।
Sachin Tendulkar motivational story/speech: 11 साल की उम्र में खेलना शुरू किया था , तब पता नहीं था कि मैं भारत के लिए खेलूंगा मैं बस खेलना चाहता था । - सचिन तेंदुलकर , पूर्व क्रिकेटर

Sachin Tendulkar motivational story/speech: 11 साल की उम्र में खेलना शुरू किया था , तब पता नहीं था कि मैं भारत के लिए खेलूंगा मैं बस खेलना चाहता था । - सचिन तेंदुलकर , पूर्व क्रिकेटर

live every moment and enjoy it to the fullest- Sachin Tendulka

सचिन तेंदुलक- हर पल को जियो और उसका पूरा आनंद लो

मैं अपनी जिंदगी की दूसरी पारी " में बहुत मिलती - जुलती दशा में हूं । अपने परिवार के साथ बहुत सारा समय बिता रहा हूं । बहुत से लोगों ने मुझसे पूछा था कि मैं भविष्य में क्या करूंगा । सच कहूं , तो मैं खुद नहीं जानता था । 

जब मैंने ग्यारह साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू किया था , तब मुझे पता नहीं था कि मैं भारत के लिए खेलूंगा या 200 टेस्ट मैच खेलूंगा । 

मैं तो बस इतना जानता था कि मैं खेल को अच्छी तरह खेलना चाहता था और हर पल का आनंद लेना चाहता था । मैं उस क्षण में रुका रहा और सामने आने वाली हर परिस्थिति को अच्छी तरह से जिया । 

मैं किसी चीज की भविष्यवाणी नहीं करता । मैं तो बस चीजों को उसी तरह लूंगा , जिस तरह वे आती हैं , जैसा मैंने अपनी पहली बारी खेलते वक्त किया था । 

लेकिन एक फर्क है । जब मैं जीवन में आगे बढ़ता हूं , तो मैं हमेशा इस संतुष्टि के साथ जिऊंगा कि मैंने अपनी पहली पारी अपने अंदाज में खेली और मैं अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ने में कामयाब रहा हूं , जिस पर पलटकर मैं गर्व कर सकता हूं । 

क्रिकेट ने हमें अपना रैनबसेरा अपना घर लेने में सक्षम बनाया । हमारा घर बांद्रा वेस्ट में है । 

मैं बचपन में शिवाजी पार्क के पास एक कमरे के घर में बड़ा हुआ था , 1994 तक अजीत भाई के साथ हमारे लिविंग रूम में सोया था और इसके बाद बांद्रा में एक बंगले का मालिक बनना बहुत अच्छा लगता है- क्रिकेट के प्रति ईमानदार रहकर मैं अपने घर का मालिक बनने के आजीवन सपने को साकार कर पाया हूं । मैं हमेशा से एक चीज चाहता था कि मेरे माता पिता मेरे साथ रहें । 

हालांकि पिताजी 1999 में गुजर गए , लेकिन मां मेरे साथ रहती हैं । 28 सितंबर 2011 , जिस दिन हम बांद्रा के हमारे बंगले में आए , मैं सुबह छह बजे मां को बंगले मैं में लाया था और उन्हें व्हील चेयर पर पूरा मकान घुमाया था । 

मेरे लिए ये जीवन की सबसे बड़ी खुशी थी । - ' सचिन तेंदुलकर मेरी आत्मकथा ' से

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