उत्तराखण्ड इतिहास- आद्यऐतिहासिक काल

उत्तराखण्ड इतिहास आद्यऐतिहासिक काल(Uttarakhand History-Protohistoric Period)पुरातात्विक साक्ष्यों की कमी के कारण राज्य के आद्य इतिहास के प्रमुख्य स्रो

उत्तराखण्ड इतिहास आद्यऐतिहासिक काल(Uttarakhand History-Protohistoric Period)पुरातात्विक साक्ष्यों की कमी के कारण राज्य के आद्य इतिहास के प्रमुख्य स्रोत विभिन्न धार्मिक ग्रन्थ है । इसी कारण इस  काल को पौराणिक काल भी कहा जाता है 

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उत्तराखण्ड इतिहास- आद्यऐतिहासिक काल क्या है ?

इस युग का विस्तार चतुर्थ शताब्दी से ऐतिहासिक काल तक माना जाता है। इस काल के लोगों को लौह ताम्र धातुओं ,कृषि पशुपालन ,तथा ग्रामीण-नगरीय सभ्यता से परिचित होने  साक्ष्य मिले है । जैसे बहादराबाद से प्राप्त ताम्र संचय , मलारी तथा रामगंगा घाटी से विभिन सामग्री के साथ प्राप्त महापाषाणकालीन शवाधान अवशेष  आदि 

उत्तराखण्ड: सम्पूर्ण सामान्य ज्ञान

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उत्तराखण्ड  का प्रथम उल्लेख हमें ऋग्वेद से प्राप्त होता है ,जिसमें इस क्षेत्र को देव भूमि एवं मनीषियों की पूर्ण भूमि कहा गया है । 

वेदों के आलावा इसका उल्लेख उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रंथों ,पुराणों ,रामायण तथा महाभारत आदि ग्रंथों से भी प्राप्त होता है।  इन ग्रंथों मैं इस क्षेत्र को पूर्णभूमि, ऋषिभूमि, तथा पवित्र क्षेत्र कहा गया है । 

ऐतरेव ब्राह्मण मैं यहाँ उत्तर-कुरुओं का निवास होने के कारण इस क्षेत्र के लिए उत्तर-कुरु शब्द  का प्रयोग किया गया है । 

स्कंदपुराण मैं पांच हिमालय खंडों  ( नेपाल, मानसखंड, केदारखंड, जालंधर, एवं कश्मीर ) का उल्लेख है, जिसमें से दो खंड ( मानसखंड, और केदारखंड ) का सम्बन्ध उत्तराखण्ड  से है । 

उपरोक्त पुराणों मैं मायाक्षेत्र ( हरिद्वार ) से हिमालय तक के विस्तृत क्षेत्र को केदारखंड ( गढ़वाल क्षेत्र ) तथा नंदा देवी पर्वत से कलागिरि तक के क्षेत्र को मानसखंड ( कुमाऊ क्षेत्र ) कहा गया है। नंदादेवी पर्वत इन दोनों खण्डों की विभाजन रेखा पर स्थित है। 

पुराणों में  मानसखंड और केदारखंड के सयुक्त क्षेत्र को उत्तर-खंड ,ब्रह्मपुर , एवं खसदेश आदि  नामों से सम्बोधित किया गया है । 

बौद्ध साहित्य के पाली भाषा वाले ग्रंथों में  उत्तराखंड क्षेत्र के लिए हिमवंत शब्द प्रयोग किया गया है 

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गढ़वाल क्षेत्र - 

पहले इस क्षेत्र को बद्रिकाश्रम क्षेत्र , तपोभूमि, स्वर्गभूमि , (महाभारत व् पुराणों में ) एवं केदारखण्ड आदि नामों से जाना जाता था। लेकिन कालान्तर मै 1515 ई. के आसपास इस क्षेत्र के 52 गढ़ों ( पहाड़ी किला)  को पवार  शासक अजयपाल द्वारा जीत लेने के कारण  गढ़वाल नाम पड़ा

गढ़ों  का निर्माण इस क्षेत्र की बहुत प्राचीन विशेषता रही है। ऋग्वेद में वर्णित है कि इस क्षेत्र के असुर राजा शम्बर के 100 गढ़ों को देवराज इंद्र और सुदास ने नष्ट कर दिया था । 

ऋग्वेद के अनुसार प्रलय के बाद इस क्षेत्र के प्राणा  ग्राम मैं सप्तऋषियों ने अपने प्राणों की रक्षा की और यहीं से पुनः सृष्टि प्रारम्भ हुई तथा मरीच, अंगीरा , अत्रि ,अगस्त्य , भृगु , वशिष्ठ ,मनु आदि वंशों की परम्परा शुरू हुई ।  यहाँ के अल्कापुरी ( कुबेर की राजधानी ) नामक स्थान को मनुष्यों के आदि पूर्वक मनु का निवास स्थल कहा जाता है। 

ब्रह्मा के मानस पुत्रों दक्ष ,मरीचि ,पुलस्त्य, पुलह, ऋतु ,और अत्रि का निवास स्थल गढ़वाल ही था । 

हरिराम धस्माना, भजनसिंह ,और डॉक्टर शिवानन्द  नौटियाल आदि  इतिहासकारों मत की ऋग्वेद में जिस "सप्तसिंधु देश का उल्लेख है वह गढ़भूमि (गढ़वाल ) ही है ।  इस क्षेत्र के बद्रीनाथ के पास स्थित गणेश,नारद मुचकुन्द ,व्यास एवं स्कध आदि गुफाओं में  ही वैदिक ग्रंथों की रचना की गयी थी । ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी का सम्बन्ध भी यही से है। 

टिहरी गढ़वाल की एक पट्टी ( हिमालय) में विसोन नामक पर्वत पर वशिष्ठ कुंड,  वशिष्ठ गुफा ,  एवं  वशिष्ठश्रम  है । ऐसा माना  जाता  है की राम के वनवास चले जाने पर वशिष्ठ मुनि और उनकी पत्न्नी अरुंधती ने यही निवास किया था। 

देवप्रयाग में भगवान राम का एक मंदिर है,और ऐसी मान्यता है की भगवान राम ने अंतिम समय मैं यहाँ पर तपस्या की थी । 

 गढ़वाल क्षेत्र के देवप्रयाग की सितोन्स्यूं पट्टी मैं माता सीता पृत्वी मई समाई थी इसी कारन यहाँ प्रतिवर्ष (मनसार) मैं मेला लगता है । 

टिहरी गढ़वाल जिले में लक्ष्मण जी ने जिस स्थान पर तपस्या किया था उसे तपोवन कहा जाता है । 

रामायणकालीन बाणासुर का भी राज्य इसी गढ़वाल क्षेत्र में था और इसकी राजधानी ज्योतिषपुर (जोशीमठ ) थी। 

महाभारत के वन पर्व में हरिद्वार से केदारनाथ (भृंगतुंग ) तक के यात्रा में  पड़ने वाले स्थानों का वर्णन मिलता है।  इस पर्व में बद्रीनाथ की भी चर्चा की गई है। इसी पर्व में लोमश ऋषि के साथ पांडवों के इस क्षेत्र में आने का उल्लेख है। मान्यता है की कुन्ती व् द्रौपदी सहित पाण्डव यहीं से स्वर्गलोक गए थे । 

महाभारत के वनपर्व के अनुसार उस समय इस क्षेत्र मैं पुलिंद (कुणिन्द ) एवं किरात जातियों का अधिपत्य था ।  पुलिन्द राजा सुबाहु की राजधानी श्रीनगर थी। इसने पांडवों की और से युद्ध में  भाग लिया था । 

सुबाहु के बाद राजा विराट का उल्लेख है , जिसकी राजधानी जौनसार के पास विराटगढ़ी में  थी। इसी की पुत्री से अभिमन्यु का विवाह हुआ था । 

प्राचीन काल में  इस क्षेत्र मैं बद्रिकाश्रम और कण्वाश्रम नामक दो प्रसिद्ध विद्यापीठ  थे । इनमें से कण्वाश्रम दुष्यंत और शकुंतला के प्रेम -प्रसंग के कारण  विशेष रूप से प्रसिद्ध है । इसी आश्रम मैं चक्रवर्ती सम्राट भरत का जन्म हुआ था, जिनके नाम पर अपने देश का नाम भारत पड़ा । 

महाकवि कालिदास ने महाकाव्य अभिज्ञान शाकुंतलम की रचना मालिनीनदी  के तट पर स्थित इसी कण्वाश्रम मैं ही की थी । अब इस स्थान को चौकाघाट कहा जाता है । 

धार्मिक ग्रंथों मैं कही-कही पर केदारखसमण्डले शब्द का प्रयोग किया गया है । इस शब्द के अनुरूप केदारखंड को खस प्रदेश का पर्यायवाची माना  जाता है। कुछ लोगों के अनुसार पहले प्राचीनकाल मैं गढ़वाल क्षेत्र मैं खस जाति के लोग बहुत सशक्त थे। उस समय गढ़वाल क्षेत्र मैं बौद्ध मत का प्रचार-प्रसार अधिक हुआ था । कुछ विद्वान इन्हे आर्य मानते है । 

कुमाऊं क्षेत्र - 

पौराणिक ग्रंथों मैं चंम्पावत के पास (चंपावत नदी के पूर्व ) स्थित कच्छप के पीठ की आकृति वाले कांतेस्वर पर्वत (वर्तमान नाम कांडादेव या कानदेव ) पर विष्णुभगवान का कूर्मा या कच्चपावतार हुआ था । कालान्तर मैं इस पर्वत के नाम पर मानसखंड के इस क्षेत्र को कूर्माचल (संस्कृत शब्द ) कहा जाने लगा । आगे चलकर कूर्माचल शब्द प्राकृत मैं कुमू और हिंदी मैं कुमाऊं  पड़ा। 

पहले चंम्पावत के आस-पास के क्षेत्र को कुमाऊं कहा जाता था, लेकिन बाद मैं चलकर वर्तमान अल्मोड़ा, बागेश्वर ,तथा उधमसिंह नगर वाले सम्पूर्ण क्षेत्र को कुमाऊं कहा जाने लगा । 

कुमाऊं का सर्वाधिक उल्लेख स्कंदपुराण के मानसखंड मैं मिलता है। 

ब्रह्मा एवं वायुपुराण के अनुसार यहाँ किरात, किन्नर, यक्ष, गंधर्व ,विद्याधर ,नाग आदि जातियां निवास करती थी । 

महाभारत मैं भी कुर्मांचल क्षेत्र मैं किरात,किन्नर,यक्ष ,तंगव,कुलिंद ,तथा खास जातियों के निवास करने का उल्लेख है। 

जाखन देवी मंदिर (अल्मोड़ा) का अस्तित्व अत्यंत प्राचीन काल  क्षेत्र मैं यक्षों के निवास करने की पुष्टि करता है । 

कुमाऊ क्षेत्र मैं बीनाग या बेनीनाग ,धौलनाग, कालीनाग,पिंगलनाग,खरहरीनाग ,बासुकिनाग आदि नाग देवता के मंदिरों की उपस्थिति प्राचीन काल मैं नाग जाति के लोगों के निवास को प्रमाणित करता है । 

उपरोक्त नाग मंदिरों मैं पिथौरागढ़ का बीनाग या बेनीनाग मंदिर सबसे प्राचीन है। 

अपने स्वतंत भाषाई अस्तित्व (मुंडा भाषा ) के साथ किरातों के वंशज आज भी कुमाऊ के अस्कोट एवं डोडीहाट नामक स्थान पर निवास करते है । 

बाद की कुमाऊ की जातियों मैं खस का उल्लेख मिलता है,कुमाऊं मैं राजपूतों के प्रवेश से पहले खसों का ही प्रभुत्व था। 

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