Positive Thinking: मन में दुख की स्क्रिप्ट ना लिखें अभिव्यक्त कर दें.

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Do not write the script of sadness in your mind, express it.

Do not write the script of sadness in your mind, express it.


Positive Thinking: जब भी कोई आपदा या विपत्ति आ पड़े या कुछ बहुत बुरा हो जाए , जैसे बीमारी , आदि तब आश्वस्त रहिए कि इसका दूसरा पहलू भी है , कि आप एक अविश्वसनीय चीज से बस एक कदम दूर हैं । और वह है उस पीड़ा व दुख - तकलीफ रूपी घटिया धातु को सोने जैसी कीमती धातु में बदलने का समय । और एक कदम को समर्पण कहते हैं । 

इसका मतलब यह नहीं है कि आप ऐसी स्थिति में सुखी हो जाएंगे , खुश हो जाएंगे । लेकिन ऐसा अवश्य है कि आपका भय और दुख , शांति में , सुकून में बदल जाएगा । यह ईश्वरीय शांति है जो किसी भी बोध शक्ति से पार और परे है । उसकी तुलना में सुख तो एक बहुत ही उथली चीज है । जो कुछ बाहर है अगर उसे आप स्वीकार नहीं कर सकते हैं तो जो भीतर है उसे स्वीकार कीजिए ।

इसका अर्थ है दुःख का प्रतिराध न करें । उसे वहीं रहने दें । वह दुख जिस भी रूप में हो- शोक , विषाद , हताशा , निराशा , भय , चिंता , अकेलापन उसके प्रति समर्पण करें । मानसिक रूप से कोई ठप्पा लगाए बिना उसे साक्षी की तरह देखें । तब देखिए कि समर्पण का चमत्कार उस गहरे दुख को किस तरह एक गहरी शांति में बदल देता है । जब बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं होता है तो भी उससे पार पाने का कोई तो रास्ता होता ही है । 

इसलिए दुख - दर्द से बच कर मत भागिए । उसका सामना कीजिए । उसे महसूस कीजिए- पर उसके बारे में सोचिए मत । हो सके तो उसे अभिव्यक्त कीजिए , लेकिन उसके बारे में अपने मन में कोई स्क्रिप्ट न रचते रहिए । उस एहसास को पूरी तवज्जो दीजिए , न कि उस व्यक्ति , उस घटना या उस स्थिति को जो कि उस एहसास के पैदा होने का कारण लग रहा हो । मुश्किलों से अच्छी तरह लड़ने का यही कारगर रास्ता है । - एकहार्ट की किताब ' शक्तिमान वर्तमान ' से साभार

Thoughts of the day

ज्यादातर लोग अवसर गंवा देते हैं क्योंकि यह रूप बदलकर आता है और हम पहचान नहीं पाते । 

यदि हम हर वो चीज कर दें जिसे करने में सक्षम हैं , तो सचमुच हम खुद को चकित कर देंगे । थॉमस अल्वा एडीसन , वैज्ञानिक

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