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हस्त - मुद्रा - चिकित्सा विधि लाभ और सावधानियां

हस्त - मुद्रा - चिकित्सा(Hand Mudra medicine) के अनुसार हाथ तथा हाथों की अंगुलियों और अंगुलियों से बनने वाली मुद्राओं में आरोग्य का राज छिपा(the secr

हस्त - मुद्रा - चिकित्सा(Hand Mudra medicine) के अनुसार हाथ तथा हाथों की अंगुलियों और अंगुलियों से बनने वाली मुद्राओं में आरोग्य का राज छिपा(the secret of health) हुआ है । 

हाथ की अँगुलियों में पंचतत्त्व प्रतिष्ठित हैं । ऋषि - मुनियों ने हज़ारों साल पहले इसकी खोज कर ली थी एवं इसे उपयोग में बराबर प्रतिदिन लाते रहे , इसलिए वे लोक स्वस्थ रहते थे । ये शरीर में चैतन्य को अभिव्यक्ति देने वाली कुंजियाँ हैं । 

हस्त मुद्रा चिकित्सा, Hasta Mudra चिकित्सा and there Benfits

हस्त - मुद्रा - चिकित्सा Hasta Mudra chikitsa 

ज्ञान मुद्रा (Knowledge Mudra ( विधि )

अँगूठे को तर्जनी अँगुली के सिरे पर लगा दें । शेष तीनों अँगुलियाँ चित्र के अनुसार सीधी रहेंगी । 

लाभ : - स्मरण - शक्ति का विकास होता है , ज्ञान की वृद्धि होती है , पढ़ने में मन लगता है , मस्तिष्क के स्नायु मज़बूत होते ज्ञान मुद्रा हैं , सिरदर्द दूर होता है तथा अनिद्रा का नाश , स्वभाव में परिवर्तन , अध्यात्म - शक्ति का विकास और क्रोध का नाश होता है । 

सावधानी : - खान - पान सात्त्विक रखना चाहिये , पान- पराग , सुपारी , जर्दा इत्यादि का सेवन न करे । अति उष्ण और अति शीतल पेय पदार्थों का सेवन न करे । 

वायु मुद्रा( Air Mudra) : - ( विधि )

तर्जनी अँगुली को मोड़कर अँगूठे के मूल में लगाकर हलका दबाएं । शेष अँगुलियाँ सीधी रखें ।  

लाभ : - वायु शान्त होती है । लकवा , साइटिका , गठिया , संधिवात , घुटने के दर्द ठीक होते हैं । गर्दन के दर्द , रीढ़ के दर्द तथा पारकिंसन्स रोग में फायदा होता है ।  

आकाश  मुद्रा(Akash Mudra)  ( विधि )

मध्यमा अँगुली को अँगूठे के अग्रभाग से मिलायें । शेष तीनों अँगुलियाँ सीधी रहें । 

लाभ : - कान के सब प्रकार के रोग जैसे बहरापन आदि , आकाश मुद्रा हाड्ढया की कमजोरी तथा हृदय - रोग ठीक होता है ।

सावधानी : - भोजन करते समय एवं चलते - फिरते यह मुद्रा न करें । हाथों को सीधा रखें । लाभ हो जाने तक ही करें । 

पृथ्वी मुद्रा : - ( विधि )

अनामिका अँगुली को अँगूठे से लगाएं । 

लाभ : - शरीर में स्फूर्ति , कान्ति एवं तेजस्विता आती है । दुर्बल व्यक्ति मोटा बन सकता है , वजन बढ़ता है , जीवन शक्ति का विकास होता है । यह मुद्रा पाचन क्रिया ठीक करती है , सात्त्विक गुणों का विकास करती है , दिमाग़ में शान्ति लाती है तथा विटामिन की कमी को दूर करती है । 

सूर्य - मुद्रा :- ( विधि ) 

अनामिका अँगुली को अँगूठे के मूल पर लगाकर अँगूठे से दबायें । 

लाभ : - शरीर संतुलित होता है , वज़न घटता है , मोटापा कम होता है । शरीर में उष्णता की वृद्धि , तनाव में कमी , शक्ति का विकास , खून का कोलेस्ट्रॉल कम होता है । यह मुद्रा मधुमेह , यकृत् ( जिगर ) के दोषों को दूर करती है ।

सावधानी : दुर्बल व्यक्ति इसे न करें । गर्मी में ज्यादा समय तक न करें । 

वरुण - मुद्रा : - ( विधि )

कनिष्ठा अँगुली को अँगूठे से लगाकर मिलायें ।  

लाभ : - यह मुद्रा शरीर में रूखापन नष्ट करके चिकनाई बढ़ाती है , चमड़ी चमकीली तथा मुलायम बनाती है । चर्मरोग , रक्त - विकार एवं जल - तत्त्व की कमी से उत्पन्न व्याधियों को दूर करती है । मुँहासों को नष्ट करती और चेहरे को सुन्दर बनाती है. 

सावधानी : - कफ प्रकृति वाले यह प्रयोग अधिक न करें । 

अपान - मुद्रा : - ( विधि )

मध्यमा तथा अनामिका अँगुलियों को अँगूठे के अग्रभाग से लगा दें । 

लाभ : - शरीर व नाड़ी की शुद्धि , कब्ज़ , मल - दोष , बवासीर , वायु - विकार , मधुमेह , मूत्रावरोध , गुदर्दों , दांतों के दोष दूर होते हैं । अपान मुद्रा पेट व हृदय रोग में फायदा होता है तथा यह पसीना लाती है । 

सावधानी - इस मुद्रा से मूत्र अधिक आएगा । 

अपानवायु या हृदय  रोग- मुद्रा : - ( विधि )

तर्जनी अँगुली को अँगूठे के मूल में लगाये तथा मध्यमा और अनामिका अँगुलियों को अँगूठे के अग्रभाग से लगा दे । 

लाभ : - दिल कमज़ोर है , उन्हें इसे प्रतिदिन करना चाहिये । दिल का दौरा पड़ते ही यह मुद्रा कराने पर आराम होता है । पेट में गैस होने पर यह उसे निकाल देती है । सिरदर्द होने तथा दमे की शिकायत होने पर लाभ होता है । सीढ़ी चढ़ने से पाँच - दस मिनट पहले यह मुद्रा करके चढ़ें । इससे उच्च रक्तचाप में फायदा होता है ।

सावधानी - हृदय का दौरा आते ही इसका आकस्मिक उपयोग करें । 

प्राण  मुद्रा : - ( विधि )

कनिष्ठा तथा अनामिका अँगुलियों के अग्रभाग को अँगूठे के अग्रभाग से मिलायें । 

लाभ : - यह मुद्रा शारीरिक दुर्बलता दूर करती है , मन को शान्त करती है , आँखों के दोषों को दूर करके ज्योति बढ़ाती है , शरीर को रोग - प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाती है , विटामिनों की कमी को दूर करती है तथा थकान दूर करके नव शक्ति का संचार प्राण मुद्रा करती है । लम्बे उपवास - काल के दौरान भूख - प्यास नहीं सताती तथा चेहरे और आँखों एवं शरीर को चमकदार बनाती है । 

स्तंभ - मुद्रा : - विधि 

चित्र के अनुसार मुट्ठी बाँधें तथा बायें हाथ के अँगूठे को खड़ा रखें , अन्य अँगुलियाँ बँधी हुई रखें । 

लाभ : - शरीर में गर्मी बढ़ाती है । सर्दी , जुकाम , दमा , खाँसी साइनस , लकवा तथा निम्र रक्तचाप में लाभप्रद है , कफ को सुखाती है । 

सावधानी : - इस मुद्रा का प्रयोग करने पर जल , फल , फलों का रस , घी और दूध का सेवन अधिक मात्रा करें । इस मुद्रा को अधिक लम्बे समय तक न करें । 

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