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Health Tips: स्वास्थ्य चालीसा | Health Chalisha for Good Health in Hindi

Health chalisa:-निरोग रहने के लिए सबसे पहले अपनी दिनचर्या को नियमित व व्यवस्थित करना होगा । प्रकृति के विपरीत जीवन जीने से बीमारियां तो आएंगी ही ।
Santosh Kukreti

नरो हिताहारविहार सेवी 

समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः । 

दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तो 

सेवी व भवत्य रोगः ॥ 

अर्थ : हितकारी आहार - विहार करने वाला , विचारपूर्वक काम करने वाला , काम , क्रोध , लोभ , मोह आदि में अनासक्ति रखने वाला , दानी समदर्शी , सत्यनिष्ठ , सहनशील और सेवा करने वाला व्यक्ति निरोग रहता है । - चरक संहिता 

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अरोग्यता की परिभाषा Definition of Health

 ' समदोषः समधातुः समाग्निश्च मलक्रियाः 

   प्रसन्नोत्मेन्द्रय मनः स्वस्थ इत्यामिद्यते । 

" अर्थात् दोष ( वात , पित , कफ ) , धातु ( रस , रक्त , माँस , मेदा , अस्थि , मज्जा , शुक्र ) सम हो , मल क्रिया सम्यक रूप से हो , अग्नि सम हो । आत्मा , इन्द्रियां , मन प्रसन्न हो । तब व्यक्ति स्वस्थ माना जाता है । 

Health chalisa:-निरोग रहने के लिए सबसे पहले अपनी दिनचर्या को नियमित व व्यवस्थित करना होगा । प्रकृति के विपरीत जीवन जीने से बीमारियां तो आएंगी ही । स्वस्थ जीवन के लिए :-

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स्वास्थ्य चालीसा | Health Chalisha for Good Health in Hindi 

  • जल्दी सोयें और जल्दी उठें । सुबह 4-6 बजे के बीच उठना चाहिए । बिस्तर पर लेटे हुए सर्वप्रथम पैरों की अंगुलियों को देखें । 
  • उठकर बैठे हुए ही बिस्तर छोड़ने से पहले धरती माता को प्रणाम करें ।
  • हाथों की हथेलियों को देखते हुए अपने इष्ट का ध्यान करें । फिर हथेलियों को आपस में रगड़ें । इसकी उष्मा को बन्द आँखों पर हथेलियों को रखकर महसूस करें । कुछ समय बाद आँखों को धीरे - धीरे खोलें । 
  • प्रातः मुँह में पानी भरकर ठण्डे जल से आँखों में छीटें मारें । अँगूठे से मुंह में स्थित तालू की सफाई करने से आँख , कान , नाक एवं गले के रोग नहीं होते हैं । दाईं नासिका व बाईं नासिका साफ करें ।   
  • मलोत्सर्ग एवं गुदाप्रक्षालन : दिन में उत्तर दिशा में तथा रात्रि में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके , चुप रहते हुए मुख को बन्द कर , दाँतों को दबाकर मलोत्सर्ग करें । यत्न से मलोत्सर्ग न करें ।
  • शुद्ध पानी से मलमार्ग साफ करें । ध्यान दें सफाई करते समय जल शरीर के दूसरे अंगों पर न गिरे । हाथों को शुद्ध पानी से , किटाणुनाशक पदार्थ या राख से धोएं ।
  • मलोत्सर्ग के अतिरिक्त नाखुन काटने के बाद , किसी मल को हाथ लगाने के बाद , भोजन करने के पूर्व तथा भोजन करने के पश्चात् , देव पूजा के प्रारम्भ में , सोकर उठने के पश्चात् हाथ एवं मुख को धोएं ।
  • मुख प्रक्षालन : मुख को पूरी तरह से पानी से भरकर आँखों पर कई बार छीटें भी मारने चाहिएं । इससे आलस्य दूर होता है । नेत्रज्योति बढ़ती है ।
  • दन्तधावन : दांतों की सफाई दातुन से की जाती है । कषाय ( कसैला ) , तिक्त ( कड़वा ) , कटु ( तीखा ) रस की दातुन करना श्रेष्ठ । मधुर , अम्ल , लवण रस से बनी दातुन का त्याग करना चाहिए । कोलगेट , पैप्सोडेंट जैसे पेस्ट का इस्तेमाल न करें । अगर पेस्ट ही करनी है तो डाबर लाल ( पेस्ट व मंजन ) , बबूल , दिव्य दन्तमंजन का प्रयोग करें । दातुन 12 अंगुल लम्बी एवं छोटी अंगुली के बराबर मोटी होनी चाहिए । कषाय रस में बबूल , तिक्त रस में नीम , कटु रस में करंज की दातुन श्रेष्ठ है । 
  • जीभ की सफाई : जीभ की सफाई करने वाले यन्त्र से जिह्वा की सफाई करें । इससे मुखरोग , दन्तरोग , जिह्वारोग नहीं होते तथा मुख स्वच्छ होता है ।
  • मंगलकारक कार्य : किसी शुभ वस्तु का दर्शन करें । स्वर्णपात्र में रखे घी को देखें । दूध पिलाती गाय ( देसी गाय ) एवं उसके बछड़े को देखें । स्वास्तिक चिन्ह ( ) को देखें । जमी हुई दही को देखें । 
  •  ऋतु अनुसार अर्थात् शीतकाल में गर्म तेल तथा गर्मी में ठण्डे सुखकारक तेल से मालिश करें । मालिश वहां बैठ कर करें जहाँ सीधी हवा न आए । सिर पर , शंखप्रदेश पर , पैरों के तलुओं पर मालिश करनी चाहिए । इससे शरीर की पुष्टि होती है , नींद अच्छी आती है । पैरों के तलुओं पर मालिश करने से पांवों में मज़बूती आती है , नेत्रज्योति बढ़ती है । 
  • प्रातः दांतों को साफ करने के लिए नीम या बबूल की दातुन का प्रयोग करें तथा रात्रि को सोने से पहले तथा प्रत्येक भोजन लेने के बाद दांतों के बीच फंसे अन्न कणों को बुश से साफ करें । 
  • पानी में नीबू का रस मिलाकर नहाने से शरीर की दुर्गन्ध दूर होती है । 
  • नाश्ते में रेशेयुक्त खाद्य , अंकुरित अन्न , फलों व दलिये का इस्तेमाल करें । 
  • दोपहर भोजन के बाद कुछ समय शवासन में लेटें । रात्रि के भोजन के उपरान्त 10 मिनट वज्रासन में बैठें । 
  • दिन में कम से कम 8 से 12 गिलास पानी ज़रूर पियें । 
  • रीढ़ को सीधे रखकर बैठें । ज़मीन पर बैठ कर बगैर सहारे के उठें । नाखुनों को दातों से कभी न काटें । 
  • दोपहर के खाने में पौष्टिक एवं रेशेयुक्त खाद्यों का प्रयाग करें । 
  • खाने के दौरान पानी न लें । खाने के आधा घंटा पहले तथा आधा घंटे बाद पानी का सेवन करें । पानी घूंट - घूंट करके पीयें । 
  • स्नान करने से पूर्व दोनों पैरों के अंगूठों में सरसों का शुद्ध तेल मलने से वृद्धावस्था तक नेत्रों की ज्योति कमज़ोर नहीं होती ।
  • प्रातः नंगे पांव हरी घास पर टहलें , इससे आंखों की रोशनी बढ़ती है । सप्ताह में एक दिन पूरे शरीर की सरसों के तेल से मालिश करें तथा पैर के अंगूठों व पैर के पंजों की दायें हाथ से बायें पंजे की तथा बायें हाथ से दायें पंजे की मालिश करें । 
  • शाकाहारी , सुपाच्य , सात्विक खाना भूख लगने पर ही चबाचबा कर खायें । फास्ट फूड , कोल्ड ड्रिंक , धूम्रपान , अंडे व मांस - मदिरा का प्रयोग न करें । 
  • जीने के लिए खाएं न कि खाने के लिये जियें । आमाशय का आधा भाग भोजन , चौथाई भाग पानी तथा शेष चौथाई वायु के लिए खाली रखें । 
  • पानी बैठकर ही पीयें , खड़े होकर पीने से घुटनों में दर्द होने लगता है । 
  • भोजन हमेशा धरती पर बैठकर ही करें । खूब चबा - चबा कर खायें । भोजन करते समय मौन रहें , क्रोध न करें , पूरा ध्यान खाने पर ही रखें । भोजन करते समय टेलीविज़न न देखें । 
  • भोजन में मिर्च मसाले कम व हरी सब्ज़ी व सलाद अधिक बरतें । 
  • अधिक गर्म व अधिक ठंडी वस्तुएं पाचन क्रिया के लिए हानिकारक हैं ।
  • खाने के पश्चात् पेशाब अवश्य करें । सावन में दूध तथा भादों मास में छाछ का प्रयोग हानिकारक है । 

  • रात का खाना सोने के 2 घंटे पहले खाएं , खाने के बाद थोड़ी चहल कदमी करें , खाने के तुरन्त बाद न लेटें । बिना तकिये के सोने में हृदय और मस्तिष्क मज़बूत होता है । 
  • प्रतिदिन मौसम के फलों का प्रयोग स्वास्थ्य के लिए अति उत्तम है । फलों को भोजन के साथ न लेकर अलग से भोजन से पहले खायें ।
  • मुख से सांस नहीं लेना चाहिए ।
  • फल सब्ज़ियों व दालों का प्रयोग छिलके सहित धोकर करें । 
  • सप्ताह में एक दिन का उपवास रखें । कुछ नहीं खायें केवल पानी पियें । 
  • मल , मूत्र , छींके , पाद आदि के वेगों को रोकने से रोग उत्पन्न होते हैं । 
  • सोने के लिए सख्त बिस्तर का प्रयोग करें , सिंथेटिक के गद्दे , रज़ाई , सिरहाने व चद्दरें हानिकारक हैं । अगर गद्दे ज़रूरी हों तो वे रूई के भरे होने चाहिएं । 
  • स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए रात में सोने से पहले पूरे दिन की दिनचर्या का आंखें बन्द कर सिंहावलोकन करें । मुंह ढक कर न सोयें । रात को कमरे में सोते समय खिड़कियां खोलकर सोयें । बाईं करवट सोने से दायां श्वास चलता है जो खाना हज़म करने में सहायक है । 
  • रात को 10 से 4 बजे तक नींद पूरी हो जाती है । दिन में न सोयें । 
  • सब्जियों में सीताफल , मिठाई में पेठा व फलों में पपीता सर्वोत्तम है । 
  • उत्तर तथा पश्चिम दिशा की ओर सिर करके सोने वालों की आयु क्षीण होती है । पूर्व तथा दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने वालों की आयु दीर्घ होती है । 
  • प्रसन्नता स्वास्थ्य की सबसे बड़ी कुन्जी है । खुलकर हंसें । 
  • आलस्य , भूख तथा नींद को जितना बुलाएंगे उतना ज्यादा नज़दीक आयेंगे । इनसे दूरी बनाये रखें । 
  • रात को सोते समय साधारण कुनकुना पानी पीने से कब्ज़ , अम्ल रोग , दमा , नज़ला , सांस की बीमारी ठीक होती है और कैस्ट्रोल भी कम होता है । कोसा पानी कई रोगों की अचूक दवा है ।
  • देर रात तक टी.वी. देखने से कई तरह की बीमारियां लग सकती हैं ।
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