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आत्मबल: एक बोधकथा

 आत्मबल: एक बोधकथा 

Aatmbal ek Bodhkatha: मिस्र देश में एक संत हुए हैं , उनका नाम था हिलेरियो । हिलेरियो 15 वर्ष के थे तब उनके पिता का निधन हो गया । माता पहले से ही नहीं थीं । पिता उनके लिए काफी संपत्ति छोड़ गए थे । लेकिन हिलेरियो ने वह संपत्ति संबंधियों में बांट दी । स्वयं मरुभूमि में ही जीवनयापन करने का निश्चय किया । 

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जिस स्थान पर हिलेरियो ने डेरा डाला , वह स्थान समुद्र - तट से दूर घने जंगल में था । जहां डाकुओं का भय हमेशा बना रहता था । हिलेरियो के शुभचिंतकों ने उस स्थान पर न रहने का आग्रह किया । किन्तु हिलेरियो का आत्मबल बढ़ा हुआ था । वे मृत्यु से भी भयभीत होने वाले नहीं थे । 

जैसी कि मित्रों को आशंका थी , एक दिन कई लोग वहां एकत्रित हो गए और रौब से हिलेरियो से पूछने लगे , ' तुम इस बियावान वन में अकेले रहते हो , यदि कोई तुम्हें कष्ट पहुंचाए और तुम्हारा साज - सामान उठा कर ले जाए तो ?

' हिलेरियों ने उत्तर दिया , ' जहां तक साज - सामान का प्रश्न है , मेरे पास है ही क्या । पहनने के दो कपड़े और लोटा । 

यदि उनकी भी आपको आवश्यकता हो , तो मैं अभी देने के लिए तैयार हूं । ' वे फिर बोले , ' यदि कुछ डाकू , जो इन जंगलों में निवास करते हैं , तुम्हें अपने कार्य में बाधा समझकर तुम्हें मौत के घाट उतार दें तो तुम सहायता के लिए किसको पुकारोगे?

 ' ' जान से मारना चाहे तो मार दें , मैं सहायता के लिए किसी को नहीं पुकारूंगा । 

जीवन में मरना तो एक ही बार है , तो फिर जब कभी भी वह समय आ जाए उसका में हृदय से स्वागत करूंगा । ' हिलेटियो से प्रश्न करने वाले कोई सामान्य नागरिक नहीं , परिवर्तित वेश में उस क्षेत्र में रहने वाले डाकू ही थे । वे उनका उत्तर सुनकर स्तब्ध रह गए । डाकुओं का समूह वहां से चलता बना ।

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