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लघुकथा-गुब्बारे वाला लड़का | short Story gubbare wala ladka

' जो छोटे - मोटे खिलौने बेचता है , वो ग़रीब तो होगा ही , धन का लालची भी होगा । क्या वाकई ऐसा होता है ? गुब्बारे वाला लड़का
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 लघुकथा-गुब्बारे वाला लड़का 

' जो छोटे - मोटे खिलौने बेचता है , वो ग़रीब तो होगा ही , धन का लालची भी होगा । क्या वाकई ऐसा होता है ? गुब्बारे वाला लड़का 

मैंने मार्केट जाने के लिए गाड़ी की चाबी उठाई, यह सोचकर निकली थी कि आधे - एक घंटे में वापस घर आ जाऊंगी , पर ऐसा हुआ नहीं । 

हम लोग जाम में फंस गए और जाम भी इतना ज्यादा लम्बा था कि हमें एक घंटा तो वहीं गाड़ी में बैठे - बैठे ही हो गया था । ऊपर से शाम होने को थी । इतने में वहां एक बच्चा लाइट वाले गुब्बारे लेकर आया और बेटे की तरफ देख कर बोला ' मैडम जी एक लाइट वाला गुब्बारा ले लो । ' 

मैंने मना कर दिया । लेकिन वह फिर भी बार - बार एक गुब्बारा ले लो की जिद पकड़े बैठा था । मेरा दिमाग़ पहले ही बहुत ख़राब हो रहा था और इस बच्चे ने उसे और हवा दे दी । मैं उसपर चिल्ला पड़ी , ' अरे तुम्हें एक बार में बात समझ में नहीं आती । 

जाओ , आगे बढ़ो , मुझे नहीं लेना तुम्हारा गुब्बारा । ' लेकिन इतने में ही मेरा बेटा गुब्बारे में जलती लाइट्स को देखकर लालायित हो गया और उसे लेने के लिए कहने लगा । जब मैंने उसे भी लेने से मना कर दिया तो वह रोने लगा । 

गुब्बारे वाला लड़का अब भी वहीं खड़ा था । 

मैनें उस लड़के से पूछा ' कितने का एक गुब्बारा ? ' 

उसने कहा , ' मैडम जी , तीस रुपया का । ' 

मैने झुंझलाते हुए कहा , ' इतना महंगा ? तुम लोगों ने तो गुब्बारे के नाम पर लूट मचा रखी है । दस रुपए का गुब्बारा है , जिसे तीस रुपए का दे रहा है । ' 

मैनें उसे बीस रुपए में देने के लिए कहा । वह लड़का नहीं माना और अपनी जिद पर अड़ा रहा । आखिर बेटे को देखते हुए मैंने उसे तीस रुपए में लेने का मन बना लिया । 

पर देखा तो मेरे पास पचास का नोट था , तीस रुपए छुट्टे नहीं थे और न ही उस लड़के के पास थे । काफ़ी देर हो गई और मेरा बेटा गुब्बारा लेने की जिद में अब रोने भी लगा । पैसे छुट्टे न होने कारण मैंने उस लड़के को सख्त हिदायत के साथ आगे जाने को बोल दिया ।

वह लड़का मेरी बात सुनते ही आगे बढ़ गया पर उसको न जाने क्या सूझी । वह वापिस आया और मेरे रोते बेटे को देख कर बोला ' बाबू रो मत , ये लो गुब्बारा । ' उसने एक गुब्बारा निकालकर उसे दे दिया और मुझे बिना कुछ भी बोले आगे बढ़ गया । 

मैं सन्न रह गई । कहां तो वह तीस रुपए से कम में गुब्बारा देने को तैयार नहीं था और अब ऐसे ही दे गया । और एक मैं थी जो छुट्टे न होने पर उसे पचास रुपए न दे सकी । मेरा अंतर्मन सवाल कर रहा था , ' बता अब कि कौन क्या महंगा दे रहा है ? लूट किसने मचा रखी है ? ' मैं अपने अंतर्मन को कोई जवाब न दे सकी ।

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