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कहानी हरी मुस्कराहटें | Hari Muskurahatein Hindi Kahani

कहानी - हरी मुस्कराहटें Hari muskurahatein, जो अबोले प्यार को समझते हैं, उनके लिए इंसान और पेड़-पौधे में कोई अन्तर नहीं. पत्तियों की बढ़त, शाखों के
Santosh Kukreti

Kahani Hari Muskurahatein: जो अबोले प्यार को समझते हैं, उनके लिए इंसान और पेड़-पौधे में कोई अन्तर नहीं. पत्तियों की बढ़त, शाखों के विस्तार और तने के स्पन्दन को वे हर पल महसूस कर सकते हैं. और हरी मुस्कराहटे के बनाए रखने की उनकी कोशिशें भी कम नहीं होती है. एक ऐसी ही कहानी है रत्ना और अंबुआ के रिश्ते की.

कहानी-मेहा गुप्ता

कहानी - हरी मुस्कराहटें Hari Muskurahatein Hindi Kahani 

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उस दिन रत्ना सुबह से ही पेड़ तले बने चबूतरे पर खोई सी बैठी थी । वहीं बैठे - बैठे कब धूप की तेजी ढल गई और कब दिन भर की थकी चिड़ियाएं फिर से पेड़ में बने अपने घोंसले में लौटने लगीं , उसे पता ही नहीं चला । 

वह रात इस घर में उसकी आख़िरी रात थी । सुबह वो और उसके पति शहर में बेटे मन्नू द्वारा ख़रीदे फ्लैट में रहने चले जाएंगे । वह प्रार्थना कर रही थी कि काश ! यह रात उसके जीवन की आख़िरी रात बन जाए ।  

उसका मन दौड़ता हुआ वापिस उसी वक़्त में लौटने को बेचैन था जब लाल साड़ी पहने और मांग में सिंदूर भरे इस आंगन में उसने पहली बार कदम रखा था और इस आम के पेड़ से उसका नाता जुड़ा था । तब वह कुछ 17-18 बरस की थी । यह घर , शहर से थोड़ी दूरी पर है जहां आसपास में खेत ही खेत हैं ।

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उन्हीं खेतों में कभी पांच बीघा खेत उनका भी था । उस नन्हे - कद निकालते पेड़ के नीचे ही उसकी मुंह दिखाई करते हुए ससुरजी ने कहा था ' पांच बरस पहले मैंने ये पेड़ लगाया था , अभी तक तो इसमें फल आए नहीं हैं । 

तू छोटे बच्चे की तरह इसकी देखभाल करना । ' रत्ना ने भी पेड़ के चारों तरफ रक्षा का धागा बांध दिया था । पति बिशन शादी के दो दिन बाद ही अपनी कॉलेज की पढ़ाई करने फिर से शहर चले गए । सरसों की कटाई का समय था । अम्मा , बाबूजी के साथ सवेरे ही खेत पर निकल जातीं । 

घर के भीतर अकेले उसका मन नहीं लगता । वह तरकारी काटना , बाजरा फटकना , कूटना सारे काम पेड़ के नीचे बैठकर करती । दोनों पालतू बकरियां भी वह पेड़ के नीचे ही बांध देती थी । 

एक बार पेड़ की जड़ों के पास की मिट्टी पर सफ़ेद परत देख जान गई थी कि मिट्टी में नमक की मात्रा अधिक है इसलिए आंगन में पेड़ नहीं पनपते । वह सफ़ेद परत को खुरचती । कुएं से पानी के घड़े भरकर लाती और पेड़ की जड़ों को पिलाती । बकरी की मींगनी की खाद बना पेड़ की जड़ों में डाल देती । वह प्यार से उसको अंबुआ बुलाने लगी । 

तीन साल बीत गए । वह पेड़ अब युवा और बलिष्ठ हो गया । रत्ना भी एक परिपक्व युवती बन गई । जिस दिन रत्ना ने पहली बार पेड़ पर लगे छोटे से बौर को देखा उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था । कुछ दिनों बाद पेड़ पर नन्ही - नन्ही अंबोरिया आने लगी । 

उसी साल बिशन भी अपनी पढ़ाई पूरी कर लौट आया और पास में लगी एक ऑइल मिल में नौकरी करने लगा । उसने लाड़ में रत्ना के लिए एक डाली पर मोटी रस्सी लटका झूला डाल दिया । अब वह उस पर झूलती और बिशन से खूब बातें करतीं.

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रत्ना के लिए वह आम से हरे - पीले , खट्टे - मीट्ठे दिन थे । यहां कुछ दिनों से रत्ना ज्यादा ही चटकारे लेकर कैरियां खा रही थी ।

सास की अनुभवी नजरें समझ गईं कि उनके घर में किलकारियां गूंजने वाली हैं । अब बिशन ने उसके लिए पेड़ तले एक चबूतरा बना दिया और रत्ना ने उसे मिट्टी - गोबर से लीप दिया । रत्ना ने एक बेटे को जन्म दिया ।

पर ये हरे - भरे दिन सदा के लिए कैसे टिक पाते ? उन दिनों गांव में टीबी का प्रकोप हुआ और अम्मा - बाबूजी हमेशा के लिए उनका साथ छोड़ गए । बिशन को अपनी नौकरी छोड़ खेती सम्भालनी पड़ी । 

खेतों में अंधड़ के साथ धूल के रेले के उठते ही बिशन को खांसी का दौरा उठता । वह शुरू से ही शारीरिक रूप से कमजोर था । खेती उसके बूते के बाहर की बात थी इसलिए खेत बेच वह फिर से नौकरी करने लगा । पर उसका दमा बढ़ता ही जा रहा था । उसे नौकरी भी छोड़नी पड़ी । 

उसके इलाज में बहुत पैसा लगता । थोड़े पैसे रत्ना ने मन्नू की पढ़ाई के लिए अलग रख लिए और मन्नू का दाखिला शहर की एक सरकारी बोर्डिंग स्कूल में करवा दिया । 

जिंदगी के संघर्ष में रत्ना बिल्कुल अकेली पड़ गई थी वह घंटों अपने अंबुआ के नीचे बैठी रहती । घर में जीविका का कोई साधन ना था और मन्नू की पढ़ाई के लिए रखे पैसों को वो हाथ नहीं लगाना चाहती थी । ऐसे में अंबुआ ने रत्ना द्वारा बांधे धागे की लाज रख घर का कमाऊ पूत होने का फ़र्ज निभाया । उसमें हर साल खूब फल आने लगे । 

रत्ना कच्ची कैरियों का अचार - मुरब्बा बना उनको और पके फलों को शहर में बेच पूरे साल की जरूरत लायक़ पैसा जमा कर लेती । रत्ना ने उस पेड़ के तने की सूखी दरारों को सींचा था , उस पेड़ ने भी अपनी छांव देकर , जिंदगी से मिले लू के थपेड़ों से उसकी रक्षा की थी । अब मन्नू भी इंजीनियरिंग कर शहर में नौकरी करने लगा था ।

इन सालों में पहली बार ऐसा हुआ है कि जेठ के महीने में भी आंगन आम की रसीली ख़ुशबू से नहीं महक रहा है । रत्ना जानती है उसका अंबुआ उससे नाराज है । शायद उसे रत्ना के घर बेचने के फ़ैसले की आहट मिल गई है । 

वह चबूतरे पर चढ़ उसकी शाख़ों , चिकने पत्तों को दुलारने लगी ' तुम मेरे छोटे भाई हो । मुझ पर नाराज होने का हक़ है तुम्हें । मैं क्या करती ? मन्नू ने अपने लिए लड़की पसंद कर ली है और जल्द ही उनकी शादी करनी है । 

आजकल बच्चे गांवों में कहां रहना चाहते हैं ? मन्नू शहर में घर ख़रीदना चाहता था । तुम तो जानते हो मैं घर ख़रीदने के पैसे कहां से लाती ? पर मैंने कम क़ीमत लेकर भी तुम्हें एक ऐसे परिवार के हाथ में सौंपा है जो मेरी तरह हरी मुस्कुराहटों का प्रेमी है । 

मुझे पूरा विश्वास है , वे लोग तुम्हारी मुस्कुराहट कभी पीली नहीं पड़ने देंगे । मैं तुमसे मिलने आती रहूंगी । " कहते हुए वह पेड़ के तने से लिपटते हुए फूट - फूटकर रो पड़ी ।

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