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कहानी हरी मिर्च वाला दूध | kahani Hari mirch wala dudh

 Kahani Hari mirch wala dudh:  ग्रामीण अंचल के सुखों का पता पहली झलक में तो विरलों को ही मिलता है । यह वो सुकून है , जो धीरे - धीरे मन में दाख़िल होता है , वो भी पूरी मासूमियत के साथ । अपूर्वा के लिए यह अनुभव नया था । आइये देखते है - कहानी हरी मिर्च वाला दूध | Hari mirch wala dudh kahani

कहानी हरी मिर्च वाला दूध | Hari mirch wala dudh kahani

 कहानी हरी मिर्च वाला दूध | Hari mirch wala dudh kahani

सिविल सर्विसेज के प्रशिक्षण के बाद बतौर एसडीएम विकल्प की पहली पोस्टिंग झारखंड के सुदूर आदिवासी इलाके सरायकेला में हो गई । किंतु उसकी पत्नी अपूर्वा को यह जगह बिल्कुल भी पसंद नहीं आई । 

' ये भी कोई रहने की जगह है ? न कोई मॉल न ही कोई सिनेमा स्क्रीन । चारों तरफ बस जंगल ही जंगल । तुम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और तुम्हारे ..बाकी दोस्तों ने कोशिश कर रांची , जमशेदपुर जैसे अच्छे शहरों में पोस्टिंग करा लिया । अब लो ऐसी जंगल वाली पोस्टिंग और मौज करो । ' उसकी भुनभुनाहट जारी थी । 

कोलकाता की पली बढ़ी अपूर्वा का झल्लाना स्वाभाविक ही था । लेकिन यह विकल्प की पहली पोस्टिंग थी इसलिए मना करने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता था । सब डिवीजन का सबसे वरिष्ठ अधिकारी होने के कारण उसका बंगला भी कस्बे के बिल्कुल अंतिम छोर पर एकांत में बना हुआ था । 

बंगले में जगह तो ठीक - ठाक थी लेकिन आगे - पीछे सब तरफ जंगल ही जंगल और छोटी - छोटी पहाड़ियां और उनके बीच संथाल जनजाति के गांव । गांव ख़ूबसूरत थे लेकिन जब उसे इस निगाह से देखा जाए तब ना । अभी सामान ठीक से जम भी नहीं पाया था कि अपूर्वा की सास यानी विकल्प की मां का कॉल आया , ' बहू , पहली पोस्टिंग का पहला दिन है । कुछ मीठा बनना जरूरी है चाहो तो खीर बना लेना । विकल्प को भी खीर बहुत पसंद है । ' 

‘ जी मां । ' कॉल ख़त्म होते ही अपूर्वा की झल्लाहट फिर से उभर आई । ' बुजुर्गों को यह तो पता नहीं होता कि बच्चे किस हालत में हैं लेकिन परंपरा का निर्वाह करना जरूरी है । चलिए दूध मंगा लीजिए , नहीं तो मुझे ही सुनना पड़ेगा । अर्चित ने भी सुबह से दूध नहीं पिया है । अभी तो सफर के कारण थक कर सो रहा है , उठते ही दूध मांगेगा । ' 

' ठीक है । अभी मंगा देता हूं । ' अपूर्वा की बढ़ती हुई झल्लाहट देख एक आज्ञाकारी पति की तरह विकल्प फौरन दूध का इंतजाम करने के लिए उठ खड़ा हुआ । 

' सुनो ! जो लेने जाए , उसे साफ़ - साफ़ बता देना कि पॉश्चराइज्ड मिल्क ही लाना है । नहीं तो यहां के जाहिल , गंवार लोग पता नहीं कैसा गंदा दूध ले आएं । ' 

' ठीक है । अभी बोल देता हूं । '

चौकीदार देवी बाहर दरवाजे पर ही ड्यूटी में खड़ा था । विकल्प ने उससे बड़े प्रेम से पूछा , ' यहां इस वक़्त दूध मिल जाएगा ? '

' हां , हा । कहे नहीं बाबूजी । जरूर मिली । ' 

' अच्छा तो ठीक है दो लीटर दूध लाकर मैडम को दे देना और देखना दूध पॉश्चराइज्ड वाला ही हो । ' 

' जी , साहब ! अभी लेत आत हैं । ' इतना कह वह मुड़कर जाने लगा । 

' अरे सुनो तो ! पॉश्चराइज्ड दूध ही चाहिए । ' पॉश्चराइज्ड शब्द पर जोर देते हुए उसने देवी की ओर दो सौ का नोट बढ़ाया , ' ये लो पैसे और ज्यादा देर मत करना । मुन्ना उठते ही दूध मांगेगा । ' 

" अरे साहब ई पैसे की कोनो जरूरत नाहीं । हम लेत आत हैं । ' 

' अरे ! सुनो तो । दूध क्या बिना पैसे के मिलेगा ? " उसे ट्रेनिंग में बताया गया था कि अपने अधीनस्थ कर्मचारी से कोई चीज मुफ्त में कभी नहीं मंगानी चाहिए । 

' साहेब ! आप आज ही तो आए हो । आज तो आप ईहां के अतिथि हो अउर अतिथि की सेवा करना तो हमार धरम है । " 

अभी वह आगे कुछ कहता तब तक देवी वहां से जा चुका था । ' चलो आएगा तो पैसे दे दूंगा । ' यह सोचकर विकल्प ऑफिस के लिए निकल गया । ऑफिस में आज पहला ही दिन था इसलिए मिलने - जुलने का कार्यक्रम लगातार चल रहा था कि अपूर्वा का फोन आया , ' मैंने आपसे कहा था न कि पॉश्चराइज्ड मिल्क ही मंगवाना । ' 

' हां , मैंने देवी को बता दिया था । ' विकल्प ने तुरंत अपना पक्ष रखा । 

' हुंह । अब अपने चौकीदार देवी का कारनामा सुनो । वह पता नहीं कहां से एक पुराने पिचके से बरतन में खुला हुआ दूध ले आया है । उसने जरूर पैसे मारने के लिए किसी सड़कछाप दुकान से दूध ख़रीद लिया होगा । '

 विकल्प ने उसे बताना चाहा कि पैसे तो उसने लिए ही नहीं हैं । लेकिन गुस्से में आग - बबूला अपूर्वा ने सुनी ही नहीं । उसका बोलना जारी रहा , ' और यही नहीं महाशय दूध में हरी मिर्च भी डालकर लाए हैं । मैं तो इन गंवारों के बीच रहकर कुछ ही दिनों में पागल हो जाऊंगी । ' 

विकल्प ने मौके की नजाकत को समझते हुए अपने अर्दली से पूछा कि आसपास में कहीं पॉश्चराइज्ड दूध बिकता है तो दो लीटर मंगवा दे | लेकिन आज उसकी किस्मत ही ख़राब थी । अर्दली ने बताया कि शहर से मात्र एक गाड़ी सुबह - सुबह बोतलबंद दूध लेकर आती है लेकिन अब दोपहर हो चुकी है और इस इलाके में इस समय ऐसा दूध नहीं मिल सकता । 

अब किया ही क्या जा सकता था ? वह घर पहुंचा । तो भूख से बेहाल होकर अर्चित रो रहा था । 

' अरे ! यह रो क्यों रहा है ? ' विकल्प ने पुचकारते हुए अपूर्वा से पूछा ।

 ' दूध पीने के लिए रो रहा है । ' अपूर्वा का टका सा जवाब आया । 

' तो दे दो । देवी का लाया हुआ दूध तो होगा न । ' 

' वही गंदा सा दूध दे दूं , जो पुराने पिचके हुए बर्तन में वह लाया है ,हरी मिर्च डालकर ? ' उसने घूरकर विकल्प को देखा । ' 

अरे ! क्या दिक़्क़त है ? हम भी तो ऐसे ही दूध पीकर बड़े हुए हैं । ' 

' तुम पागल हो गए हो क्या ? ऐसा अनहाइजीनिक दूध पिलाकर उसे बीमार करना है क्या ? 

" इस खिच खिच से विकल्प का मूड भी अब तक ख़राब हो चुका ' मैंने था । उसने चौकीदार देवी को बुलाकर थोड़ा सख्त लहजे में पूछा , ' तुमसे पॉश्चराइज्ड दूध लाने को कहा था , तुम यह दूध कहां से ले आए ? ' 

' साहब यह वही दूध तो है । पछाहीं भैंस का दूध । हम अपने घर से ले कर आइन हैं । हमारी औरत मुन्ने की खातिर ताजा - ताजा दूध अपनी हाथ से दूह के दीहिन हैं । ' उसकी बात सुनकर विकल्प को हंसी आ गई । वह समझ गया कि देवी पॉश्चराइज्ड को पछाहीं समझ रहा है । 

' अच्छा ! अच्छा ! वो तो ठीक है लेकिन उसमें तुम मिर्च क्यों डाल दिए ? इससे दूध ख़राब हो गया न । अब उसको कौन पिएगा ? ' 

' साहेब ! उ बाबू को दूध पीए का रहा न । इसीलिए हमरी औरत दूध में हरी मिरच डाल दीहिस ताकि किसी की बुरी नजर बाबू को ना लगे । हमारे यहां जब कच्चा दूध घर से बाहर जात हमलोग उसमें हरी मिरच डाल देते हैं जिससे बुरी नजर वाले की काट हो जाए । ' 

' ओह । ' आदिवासी देवी की निश्छल बात सुनकर विकल्प को अपने आप पर पछतावा होने लगा क्यों उसने इस भोले - भाले व्यक्ति पर गुस्सा किया । उसने अपने पीछे खड़ी अपूर्वा को देखा । उसे भी अपनी ग़लती का एहसास हो चुका था । पश्चाताप से उसका गला रुंध आया , ' देवी ! मुझे माफ़ कर दीजिए । मैंने आपको ग़लत समझ कर पता नहीं कितना कुछ कह डाला । ' 

' अरे नहीं मालकिन । कोनो अपने सेवक से माफी मांगत है का ? आप हमका पाप का भागीदार न बनाओ । बस आप मुन्ना को दूध दे दो । उ हलकान हुआ जा रहा है । अउर आप निश्चिंत रहो , ई दूध एकदम साफ है । माई किरिया । ' अपने गले पर हाथ रख कसम खाते हुए देवी की बात में तिल बराबर भी बनावट नहीं दिख रही थी । 

' हां , हां , अभी उसे देती हूं और मैं खीर बनाने जा रही हूं । आप भी खा कर जाइएगा । ' 

' जी , मालकिन , जरूर । ' गहरे सांवले देवी के उजले दांत मालकिन की बात सुनकर मोतियों से चमक उठे ।

 लेखक चिरंजीव सिन्हा

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