वैदिक संस्‍कृत और लौकिक संस्‍कृत भाषा व् भाषा का जीवन्त रूप

वैदिक और लौकिक भाषा - जिन देशों में शिक्षा का समुचित रूप में प्रचार है , उनमें भी शिक्षित , अर्द्ध - शिक्षित तथा अशिक्षित जन - समूहो की बोल - चाल की

वैदिक संस्‍कृत और लौकिक संस्‍कृत भाषा

जिन देशों में शिक्षा का समुचित रूप में प्रचार है,उनमें भी शिक्षित,अर्द्ध-शिक्षित तथा अशिक्षित जन-समूहो की बोल-चाल की भाषा में भेद दिखायी देता है। उस वैदिक भाषा के, जिसे लोग बोल-चाल के भी काम में लाते हैं, शीघ्र ही दो रूप हो गये एक तो वह, जिसका विकास पढ़े-लिखे विद्वानों में हुआ और दूसरा वह,जो अपढ़ जनों में प्रचलित रहा। विद्वानों में जिस रूप का विकास अथवा अन्त में जिसकी स्थिति हुई, वह भी वैदिक भाषा में कुछ भिन्नता रखने लगा।

वैदिक संस्‍कृत और लौकिक संस्‍कृत भाषा व् भाषा का जीवन्त रूप

यदि वैदिक भाषा में विप्रास: और विप्राः देवास: और देवा: इस प्रकार के दोनों रूप प्रचलित थे तो विद्वानों की भाषा में केवल 'विप्राः 'और 'देवा:' रूप रह गये। ये सब उसी प्रकार हुए,जिस प्रकार हिन्दी-क्रियाओं के जाय है, जाता है- सरीखे दो रूपों में से केवल जाता है- सरीखे रूप रह गये है। यो धीरे-धीरे कई प्रकार के भेद पड़ते गये तथा वैदिक और लौकिक भाषाओं के पीछे दूसरा, यो कितने ही छोटे-बड़े व्याकरण भी बन गये- जैसे कि ब्राह्म, ऐशान, ऐन्द्र, प्राजापत्य ,आपिंशल, पाणिनीय, चाँन्द्र, शाकटायन आदि।

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इन व्याकरणों का ताला लगाकर उस समय के विद्वानों ने वैदिक तथा अपनी संस्कार की हुई भाषा को तंग कोठरियों में बन्द कर दिया, जिसमें उनको परिवर्तन की छूत न लगने पाये।‘पाणिनी' ने 'लोके वेदे च' कहकर वैदिक तथा लौकिक भाषा का पार्थक्य स्पष्ट रूप में स्वीकार किया है, किन्तु भाषा को क्षयी और मृत्यु से बचाने की जगह इस व्याकरण- रूपी सञ्जीवनी बूटी ने ठीक विपरीत असर डाला, जैसा कि कालान्तर में ज्ञात हुआ अर्थात् दोनों भाषाओं की गति सीमा-बद्ध हो गयी। भाषा को अछूता रखने की चिन्ता करनेवाले विद्वान् केवल व्याकरण बनकर चुप नहीं रहे। 

भिन्न-भिन्न भाषा-भाषियों के साथ जब आर्यों का व्यापारिक, राजनीतिक तथा सामाजिक सम्पर्क बढ़ा तब दूसरी भाषाओं के शब्दों को अपने घर में घुसता देखकर उन प्राचीनता-प्रिय आर्य-विद्वानों ने रोकथाम करने की और भी चेष्टाएँ कीं। विदेशी भाषाओं को ‘यावनी' अथवा 'मलेच्छ' भाषाएँ बताकर उनको न पढ़ने तक का आदेश दे दिया।

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इस प्रकार अपनी समझ में मज़बूत-से-मज़बूत ताला लगाकर विद्वज्जन अपने घर के भीतर बैठे-बैठे लौकिक तथा वैदिक संस्कृत के साथ चौसर खेला करते थे। इधर, जनसमुदाय की जो भाषा थी, वह चारों ओर से घिरे हुए सरोवर की भाँति न होकर, स्वेच्छाचारिणी नदी की भाँति थी। इस भाषा ने ,जिसे वैदिक काल के पीछे की प्राकृत कह सकते हैं, आवश्यकतानुसार अपनी शब्द सृष्टि की वृद्धि की। यो इसका विकास अनवरत होता चला गया। 

प्राकृत में जिस प्रकार से शब्दों में परिवर्तन हुए, उसके कुछ उदाहरण देते हुए यहाँ संस्कृत से उसका भेद स्पष्ट किया गया है। साथ ही यह दिखाने के लिए आधुनिक हिन्दी पर संस्कृत का कितना प्रभाव पड़ा है, हिन्दी शब्द भी दिये गये है- उल्लिखित उदाहरणों में से सिंह, कन्धा और ताप स्पष्ट रूप में सूचित करते हैं कि यद्यपि हिन्दी की उत्पत्ति अपभ्रंश से है तथापि संस्कृत द्वारा उसकी पुष्टि होती रही है  

संस्कृत

 प्राकृत

आधुनिक हिन्दी

सिंहः

सीहोसिंधो

सिंह

गर्दभः

गडहोगद्दहो 

गदहागधा

गोपालः

गोवालो

ग्वाल

साधुकारः

साहुगारो

साहूकार 

अब क्रियाओं की बानगी का अध्ययन कीजिए :

संस्कृत

 प्राकृत

पुरानी हिन्दी

आधुनिक हिन्दी

हँसति

हँसइ

हँसइहँसै

हँसता है ।

कम्पते

कॅपइ

कँपईकँपै

काँपता है 

युध्यते

जुझइ

जुज्झईजूझइजूझै

जूझता है 

रक्षति

रक्खइ

रक्खइराखेरक्खै

रखता है 

उल्लिखित उदाहरणों में से सिंह,कन्धा,और ताप स्पष्ट रूप में सूचित करते हैं यद्यपि हिंदी की उत्त्पति अप्रभंश से है तथापि संस्कृत-द्वारा उसकी पुस्टि होती रही है।  

अशिक्षा,अनाभ्यास, जिह्वा-दोष, त्वरा ( शीघ्रता ) आदि कारणों से उत्पन्न एक-एक का एकेक, है ही का हई, हर एक का हरेक, रोवो, होवो आदि के रो, हो, होऊँ का हूँ आदि रूप हिन्दी में प्रचलित हैं, जो बड़े-बड़े आचार्यों द्वारा ठीक माने जाते हैं। हमारे देखते-ही-देखते तौ का तो हो गया है।

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दो बार किसी शब्द को लिखने की आवश्यकता पड़ती थी तो दो का अंक (२) लिखकर काम चला लिया जाता था। यह प्रथा बहुत पुरानी थी किन्तु यह भी धीरे-धीरे लुप्त होती गयी। इधर, शब्द-शुद्धि के कुछ पक्षपातियों ने राजनैतिक को राजनीतिक करके एकेक हरेक आदि को एक-एक, हर एक आदि रूप में फिर लिखना प्रारम्भ कर दिया है क्योंकि एकेक, हरेक, राजनैतिक आदि संस्कृत-व्याकरण के अनुसार शुद्ध नहीं हैं। 

हमारे विचार में इन शब्दों का रूप-परिवर्तन फारसी लिपि में लिखनेवालों की कृपा से हुआ था। संस्कृत व्याकरण का अनुसरण करनेवालों ने 'सामर्थ्य' शब्द को, जो हिन्दी में स्त्रीलिंग समझा जाता था, पुंल्लिंग बना डाला है। यह शब्द त्रिशंकु की भाँति लटक रहा है और दोनों लिंगों में इसका व्यवहार होने लगा है।

भाषा का जीवन्त रूप

इन्हीं सब बातों से प्रमाणित होता है कि हिन्दी भाषा एक जीवित भाषा है। मधुपुरी-मधुरा = मथुरा; वाराणसी = बनारस आदि भी इसी प्रकार के परिवर्तन के साक्षी हैं। 'मथुरा' को 'मट्रा', कलकत्ता को कैलकटा कहना देश-भेदजन्य जिह्वा-दोष का प्रत्यक्ष उदाहरण है। सदा से ही शब्दों का रूप इसी प्रकार बिगड़ता अथवा बदलता रहा है।यह रोग बहुत पुराना है। इसकी रोक थाम करने के लिए स्फोटक चन्द्रिका में लिखा है कि असाधु-शब्द बोलने से पाप और साधु शब्द बोलने से पुण्य होता है। 

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यही नहीं, एक बार ऐसा भी हुआ कि हेरय: हेरय: की जगह हेलय हेलयः कहने के कारण ही दैत्यों को युद्ध में देवों से हारना पड़ा। ( दैत्येयैर्हेरयोहेरय इति वक्त हेलयो हेलय इति प्रयुञ्जानाः पराबभूवुः ) इन्द्र को मारने के लिए त्वष्ट्रा ने वृत्रासुर की सृष्टि की थी किन्तु उसको आशीर्वाद देते समय उसने इन्द्रशत्रोविवर्द्धस्व को तत्पुरुष की जगह बहुव्रीहि के रूप में कह दिया। फिर क्या था, पासा पलट गया- बेचारा वृत्रासुर उलटा इन्द्र के हाथों मारा गया। 

प्राचीन आर्य-विद्वानों ने अपभ्रंशों से घबराकर ऐसी-ऐसी बातें कही हैं, जिनसे यही अनुमान होता है कि उस समय भी कई बार भाषा-विषयक क्रान्तियाँ हुईं और तरह-तरह की। कितनी ही रोकथाम करने पर भी केवल लोक भाषा का परिवर्तनशील प्रवाह न रुका बल्कि सात तालों में बन्द की गयी संस्कृत भाषा में भी बाहर के कितने ही शब्द आते रहे और आज भी। जबकि संस्कृत को मृतभाषा समझा जा रहा है,आवश्यकतानुसार आते रहते हैं। फुटबॉल, बेतार का तार, बर्की, गैस आदि के लिए नये शब्द गढ़ना व्यर्थ में क्लिष्ट कल्पना करना है।

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सन्धि 

समास 

उपसर्ग 

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संस्कृत के प्रमुख ' तद्धित ' प्रत्यय | tadhit suffix of Sanskrit

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