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भाषाओं का पारस्परिक प्रभाव,भाषा - शास्त्र का समीक्षण और परीक्षण

भाषाओं का पारस्परिक प्रभाव,भाषा -शास्त्र का समीक्षण और परीक्षण- भाषाओं का पारस्परिक प्रभाव परदेशी भाषाएँ न पढ़ने का उपदेश पहले दिया गया था । 

उसका भी वही परिणाम हुआ , जो अँगरेज़ी शासन - काल के प्रारम्भिक काल में अँगरेज़ी - भाषा के प्रति अथवा पहले - पहल जब जल - प्राप्ति के लिए नल लगाये गये थे तब उनके प्रति घृणा की भावना पनपी ; 

अर्थात् सर्वसाधारण ने विरोधियों की बात न मानी और निषेधों का विचार न करके लोग अन्य देशों की भाषाएँ पढ़ते रहे ।

भाषाओं का पारस्परिक प्रभाव,भाषा - शास्त्र का समीक्षण और परीक्षण
भाषाओं का पारस्परिक प्रभाव,भाषा - शास्त्र का समीक्षण और परीक्षण

 यदि ऐसा न किया जाता तो राजधर्म और व्यापार कैसे चलता ? ' महाभारत ' में हम पढ़ते हैं कि लाक्षागृह के विषय में सचेत करते समय महात्मा विदुर ने युधिष्ठिर से म्लेक्ष - भाषा में सम्भाषण किया है । 
तात्पर्य यह कि हज़ार रोक - थाम करने पर भी भाषाओं का प्रभाव एक - दूसरे पर पड़ ही जाता है । इस भाषा - संघर्ष के समय कितने ही शब्द अपना देश छोड़कर दूसरी जगह जा बसते हैं और कुछ दोनों देशों में अड्डा जमाये रहते हैं ।

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 लड़ाई में घायल हो जाने के कारण कुछ का रूप बदल जाता है और कुछ बेचारे अपनी जान से ही हाथ धो बैठते हैं । इसी नियम के अनुसार प्राकृत में भी बहुत - से शब्द ऐसे पाये जाते हैं , जिनका पता देववाणी में नहीं मिलता । 

ये दूसरे देशों के रूप बदले हुए शब्द हो सकते हैं अथवा उस भाषा के हो सकते हैं , जो उन लोगों में बोली जाती थी ।

 जो आर्यों के यहाँ आने के समय बसे हुए थे किन्तु प्राकृत का भी सब जगह एक ही रूप प्रचलित न था । 

जिन कारणों से बंगाल के निवासी आज सौम्य को शौम्य और पंजाब के निवासी स्कूल को सकूल तथा आत्म को आतम कहते हैं , उन्हीं अथवा उनसे मिलते-भाषा - शास्त्र का समीक्षण और परीक्षण

जुलते किन्हीं दूसरे कारणो से प्राकृत के भी कई रूप दिखायी देने लगे थे यद्यपि उनमें समानता अधिक थी । जब प्राकृत में साहित्य - रचना होने लगी तब बोल चाल की भाषा और उसमें भेद हो गया । 

इसी प्रकार प्राकृत ने कई रूप बदले । उसका दूसरा व्यापक रूप पालि है , जो गौतम बुद्ध के सम्बन्ध के कारण सबसे महत्त्व का माना जाता है । पालि में भी बहुत कुछ साहित्य रचना हुई ।

Next Read : - भाषा शब्द - शास्त्र का तुलनात्मक अध्ययन

 उस समय के जो शिलालेख ताम्र पत्र आदि मिलते हैं , उनसे पालि के भिन्न - भिन्न रूपों का कुछ हाल ज्ञात हो सकता है । 

यहाँ हम पहली प्राकृत से दूसरी प्राकृत यानी पालि का सम्बन्ध दिखाकर व्यर्थ आपका समय लेना नहीं चाहते । 

हाँ , इतना अवश्य बता देना चाहते है कि बोल - चाल की भाषा होने और साहित्य - रचना के लिए बहुत पुरानी न होने पर भी प्राकृत किसी समय अगणित अलंकारों से सजी हुई संस्कृत से अधिक मधुर और चमत्कृत समझी जाती थी ; और वह भी मूों में नहीं बल्कि उद्भट विद्वानों में ।

 राजशेखर ने कर्पूरमञ्जरी में लिखा है ,

 " परुसा सक्क अबन्धा पाउ अबन्धो विहोई सुउमारो 

   पुरुस महिलाणं जेन्ति अमिह अन्तरं तेतिय मिमाणं । "

 इसका अर्थ यह है कि संस्कृत की रचना ' कठोर ' और प्राकृत की ' सुकुमार ' होती है । इन दोनों भाषाओं में पुरुष और स्त्री में बराबर अन्तर है । कालान्तर में , विद्वानों ने देश - भेद से प्राकृत के शौरसेनी , मागधी और महाराष्ट्री - ये तीन अपभ्रंश माने थे । 

उस समय दक्षिण - पश्चिम में प्रचलित नागर नाम का भी एक अपभ्रंश माना जाता था , जिससे कुछ लोगों की राय में महाराष्ट्री और शौरसेनी की उत्पत्ति हुई । 

कुछ विद्वान् ' मागधी को शौरसेनी ' का अपभ्रंश बताते हैं तो कुछ मागधी ' को मूल प्राकृत जबकि कुछ ' महाराष्ट्री ' को मूल प्राकृत । ' शौरसेनी ' और ' मागधी ' के मेल से उत्पन्न ' अर्द्धमागधी ' नाम की एक अपभ्रंश भाषा थी , जिससे पूर्वी हिन्दी का विकास हुआ । 

हमारे विचार में तो यह भी एक क्रान्ति का युग था और इन अपभ्रंशों में पारस्परिक समानता और असमानता देखकर ही विद्वानों ने “ अपनी - अपनी डफली अपना - अपना राग ” वाली कहावत चरितार्थ की है ।

 यदि ‘ मागधी ' ( जिससे बिहारी की सृष्टि हुई है ) के पूर्व - रूप को बौद्ध - धर्म के कारण विशेष महत्त्व मिला तो अर्द्धमागधी को महावीर स्वामी और दूसरे जैन तीर्थंकरों के कारण उतना ही महत्त्व प्राप्त हुआ था । 

हिन्दी - संसार में मैथिली का भी स्थान है यद्यपि प्राच्य प्राकृत से उत्पन्न होने के कारण यह बॉग्ला भाषा की सगी बहन है ।

 प्रख्यात भाषाविद् डॉ ० ग्रियर्सन की अवधारणा है - शौरसेनी तथा अर्द्धमागधी के मेल से ही वर्तमान हिन्दी की सृष्टि हुई है । डॉ ० ग्रियर्सन यह सम्मति और भी कितने ही विद्वान् लेखकों ने मान ली है परन्तु हमारा विश्वास है कि वर्तमान हिन्दी पर पंजाबी का पूरा प्रभाव पड़ा है । 

इस विश्वास की पुष्टि में कितने ही उदाहरण दिये जा सकते हैं । संस्कृत की यास्यति क्रिया का प्राकृत रूप जाएज्जा है ।

 पंजाबी में इसका अपभ्रंश जाएगा अथवा जावेगा है , जो कि आजकल बोल - चाल की हिन्दी में आता है । शौरसेनी से विकसित ब्रजभाषा में जायगी कहेंगे और अर्द्धमागधी के विकसित रूप में जैहै अथवा जइहै । 

ब्रज भाषा में जहाँ घोड़ी कहा जाता है , वहाँ पंजाबी में घोड़ा और इसी रूप में आधुनिक हिन्दी में भी बोला जाता है ।

 पंजाबी का प्रभाव हिन्दी पर बांगड़ बोली की कृपा से पड़ा , जो दिल्ली और पंजाब तथा दिल्ली और राजस्थान के बीच की भाषा है । जिस राज्य में यह बोली जाती है , उसे ' हरियाणा ' कहते हैं । इस पर राजस्थानी का भी प्रभाव पड़ा है । 

नीचे डॉ ० ग्रियर्सन के ' LLinguistic Survey of India ' नामक ग्रन्थ में से इसका एक उदाहरण दिया गया है , " एक माणस कै दो छोरे थे । उनमैं तै छोट्टे ने बाप्पू तै कह्या अक बाप्पू हो धन का जौणसा हिस्सा मेरे बाँडे आवे सै मन्नै दे दे । "

इसी से मिलती - जुलती भाषा दिल्ली के आसपास तथा और भी कई जगह बोली जाती है । 

इधर , आगरा की बोल - चाल की भाषा पर ध्यान देने से भी खड़ी बोली की उत्पत्ति शौरसेनी + अर्द्धमागधी तथा पंजाबी + पैशाची के अपभ्रंश से सिद्ध हो जाती है ।

 पंजाबी के सम्बन्ध में यह आत ध्यान में रखने योग्य है कि इसकी उत्पत्ति पंजाबी - प्राकृत तथा पैशाची के मेल से हुई है । 

पैशाची , जिसे ' भूत - भाषा ' भी कहते थे , उत्तर - पंजाब में , कश्मीर की ओर बोली जाती थी । 

कुछ विद्वानों की राय में वह मध्यप्रदेश और राजपूताने के आसपास बोली जाती थी परन्तु प्रमाणों से यह बात सिद्ध नहीं होती । 

संस्कृत और प्राकृत से उसका क्या सम्बन्ध था , यह दिखाने के लिए कुछ उदाहरण देने अनुचित न होगे ।

संस्कृत

प्राकृत

पैशाची

 

दुष्ट:

 

दुट्ठ

 

दुसट

 

कष्ट:

 

कट्ठ

 

कसट

 

सहते

 

सहड़

 

सहदे

 

  इन उदाहरणो से सूचित होता है कि पैशाची का लगाव संस्कृत से अधिक है , प्राकृत से कम । ऊपर के उदाहरण में सहदे दिया हुआ है ; 

इसी अर्थ में आधुनिक हिन्दी में सहते ( हैं ) कहेंगे । ' सहइ ' तो प्राकृत का रूप है , जो ब्रज - भाषा में ' सहहि ' का रूप धारण कर लेगा ।

 हाँ , आगरा की बोली के प्रभाव के कारण सहै है - सरीखे रूप में भी उसमें आते रहे हैं । इस उदाहरण यह प्रमाणित हो जाता है कि खड़ी बोली की क्रियाएँ किधर से आयी हैं । 

इनमें से एक रूप ( सहता , करता आदि ) का वंश - वृक्ष देखने से अर्द्धमागधी और शौरसेनी का कहीं पता भी नहीं मिलता ।

 ऐसे और भी उदाहरण दिये जा सकते हैं । अवन्ती में प्राकृत का जो रूप प्रचलित था , उसी से कुछ सज्जन राजस्थानी की और उसी से मिलते - जुलते एक और रूप गोर्जरी से गुजराती की उत्पत्ति मानते हैं । 

इसमें सन्देह नहीं कि राजस्थानी और गुजराती का तुलनात्मक अध्ययन करने से दोनों का विकास एक ही स्थान से हुआ दिखता है ।

 राजपूताने के कुछ भागों की बोली और इधर मालवा की बोली से गुजराती की बहुत अधिक समता है । इससे उल्लिखित सिद्धान्त की और भी पुष्टि हो जाती है । 

ब्रज - भाषा और राजस्थानी में जो समता दिखती है , उसका कारण इन दोनों ही का नागर अपभ्रंश से उत्पन्न होना हो सकता है क्योंकि शौरसेनी को भी कुछ विद्वानों ने नागर अपभ्रंश का ही एक भेद माना है ।

 इसी तरह प्राकृत के अवन्तीबाला रूप भी , जिससे राजस्थानी की उत्पत्ति हुई बतायी जाती है , नागर अपभ्रंश का ही एक भेद कहा जाता है । 

पूर्वी हिन्दी - बैसवाड़ी ( जिसको अवधी भी कहते हैं ) और बघेलखण्ड तथा छत्तीसगढ़ में बोली जानेवाली भाषाओं की उत्पत्ति ‘ अर्द्ध - मागधी ' से है , जो कि ' मागधी ' और ' शौरसेनी ' का घोटाला है ।

 भाषाओं के इस प्रकरण पर विचार करते समय यह बात न भूलनी चाहिए कि इन सबकी मूल भाषा एक ही थी और इसी कारण अनेक अपभ्रंश हो जाने पर भी सबमें समानता की एक लहर प्रवाहित हुई , जो कि अब भी देखी जा सकती है । 

उदाहरणार्थ , करता हूँ के अर्थ में करदा भाषा - शास्त्र का समीक्षण और परीक्षण

हाँ , करत हौ , करू लूं , करि आदि एक ही से अथवा एक - दूसरे से बहुत कुछ मिलते - जुलते सब राज्यीय बोलियो में मिलेगे । 

इसी प्रकार और भी कितनी ही सज्ञाओ , सर्वनामो तथा क्रियाओं के उदाहरण दिये जा सकते हैं । अब अपभ्रंश से हिन्दी का सम्बन्ध दिखाने के लिए नीचे कुछ उदाहरण दिये गये है :

प्राकृत

अपभ्रंश

हिन्दी

सामलो

सामलो

सामलो , साँवरो.साँवला

घोड़ो

घोडो

घोडौ घोड़ा

सहते

 

सहड़

 

सहदे

 

एसो

एहो

एह इह, यह

 

हउँ

हूँ.हाँ

को

 

कवण

कवन, कौन

 


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