दो भाई - प्रेमचंद कि सर्वश्रेठ कहानी | do bhai munshi premchand stories

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प्रेमचंद कि सर्वश्रेठ कहानियाँ ,premchand story do bhai,


प्रेमचंद कि सर्वश्रेठ कहानियाँ 

दो भाई 

Premchand Ki Kahaniya: प्रात:काल सूर्य की सुहावनी सुनहरी धूप में कलावती दोनों बेटों को जांघों पर बैठा दूध  और रोटी खिलाती । केदार बड़ा था , माधव छोटा । दोनों मुंह मे कौर लिये , कई पग उछल - कूद कर फिर जांघों पर आ बैठते और अपनी तोतली बोली में इस प्रार्थना की रट लगाते थे , जिसमें एक पुराने सहृदय कवि ने किसी जाड़े के सताये हुए बालक के हृदयोद्गार ' को प्रकट किया है 

" दैव - दैव घाम करो तुम्हारे बालक को लगता जाड़ " 

मां उन्हें चुमकार कर बुलाती और बड़े - बड़े कौर खिलाती । उसके हृदय में प्रेम की उमंग थी और नेत्रों में गर्व की झलक । दोनों भाई बड़े हुए । साथ - साथ गले में बांहें डाले खेलते थे । केदार की बुद्धि चुस्त थी । माधव का शरीर दोनों में इतना स्नेह था कि साथ साथ पाठशाला जाते , साथ - साथ खाते और साथ ही साथ रहते थे । दोनों भाइयों का ब्याह हुआ । केदार की वधू चम्पा अमित - भाषिणी और चंचला थी । माधव की वधू श्यामा सांवली सलोनी , रूपराशि की खान थी । बड़ी ही मृदुभाषिणी , बड़ी ही सुशीला और शांतस्वभावा थी । 

केदार चम्पा पर मोहे और माधव श्यामा पर रीझे । परन्तु कलावती का मन किसी से न मिला । वह दोनों से प्रसन्न और दोनों से अप्रसन्न थी । उसकी शिक्षा - दीक्षा का बहुत अंश इस व्यर्थ के प्रयत्न में व्यय होता था कि चम्पा अपनी कार्यकुशलता का एक भाग श्यामा के शांत स्वभाव से बदल ले । 

दोनों भाई संतानवान हुए । हरा - भरा वृक्ष खूब फैला और फलों से लद गया । कुत्सित वृक्ष में केवल एक फल दृष्टिगोचर हुआ , वह भी कुछ पीला - सा , मुरझाया हुआ ; किन्तु दोनों अप्रसन्न थे । माधव को धन - सम्पत्ति की लालसा थी और केदार को संतान की अभिलाषा  । 

भाग्य की इस कूटनीति ने शनैः शनैः द्वेष का रूप धारण किया , जो स्वाभाविक था । श्यामा अपने लड़कों को संवारने - सुधारने में लगी रहती ; उसे सिर उठाने की फुरसत नहीं मिलती थी । बेचारी चम्पा को चूल्हे में जलना और चक्की में पिसना पड़ता । यह अनीति कभी - कभी कटु शब्दों में निकल जाती । श्यामा सुनती , कुढ़ती और चुपचाप सह लेती । परन्तु उसकी यह सहनशीलता चम्पा के क्रोध को शांत करने के बदले और बढ़ाती । यहां तक कि प्याला लबालब भर गया । हिरन भागने की राह न पा कर शिकारी की तरफ लपका । चम्पा और श्यामा समकोण बनाने वाली रेखाओं की भांति अलग हो गयीं । उस दिन एक ही घर में दो चूल्हे जले , परन्तु भाइयों ने दाने की सूरत न देखी और कलावती सारे दिन रोती रही ।

कई वर्ष बीत गये । दोनों भाई जो किसी समय एक ही पालथी पर बैठते थे , एक ही थाली में खाते थे और एक ही छाती से दूध पीते थे , उन्हें अब एक घर में , एक गांव में रहना कठिन हो गया । परन्तु कुल की साख में बट्टा न लगे , इसलिए ईर्ष्या और द्वेष की धधकी हुई आग को राख के नीचे दबाने की व्यर्थ चेष्टा की जाती थी । उन लोगों में अब भ्रातृ स्नेह न था । केवल भाई के नाम की लाज थी । मां भी जीवित थी , पर दोनों बेटों का वैमनस्य देख कर आंसू बहाया करती । हृदय में प्रेम था , पर नेत्रों में अभिमान न था । कुसुम वही था , परन्तु वह छटा न थी । 

दोनों भाई जब लड़के थे , तब एक को रोते देख दूसरा भी रोने लगता था , तब वह नादान , बेसमझ और भोले थे । आज एक को रोते हुए देख दूसरा हंसता और तालियां बजाता । अब वह समझदार और बुद्धिमान हो गये थे । 

जब उन्हें अपने - पराये की पहचान न थी , उस समय यदि कोई छेड़ने के लिए एक को अपने साथ ले जाने की धमकी देता , तो दूसरा जमीन पर लोट जाता और उस आदमी का कुर्ता पकड़ लेता । अब यदि एक भाई की मृत्यु भी धमकाती तो दूसरे के नेत्रों में आंसू न आते । अब उन्हें अपने पराये की पहचान हो गयी थी । 

बेचारे माधव की दशा शोचनीय थी । खर्च अधिक था और आमदनी कम उस पर कुल - मर्यादा का निर्वाह हृदय चाहे रोये , पर होंठ हंसते रहें । हृदय चाहे मलीन हो , पर कपड़े मैले न हों ! चार पुत्र थे , चार पुत्रियां और आवश्यक वस्तुएं मोतियों के मोल । कुछ पाइयों की जमींदारी कहां तक सम्हालती । लड़कों का ब्याह अपने वश की बात थी , पर लड़कियों का विवाह कैसे टल सकता ! दो पाई जमीन पहली कन्या के विवाह में भेंट हो गयी । उस पर भी बराती बिना भात खाये आंगन से उठ गये । शेष दूसरी कन्या के विवाह में निकल गयी । साल भर बाद तीसरी लड़की का विवाह हुआ , पेड़ - पत्ते भी न बचे । हां , अब की डाल भरपूर थी । परन्तु दरिद्रता और धरोहर में वही सम्बन्ध है जो मांस और कुत्ते में । 

इस कन्या का अभी गौना न हुआ कि माधव पर दो साल के बकाया लगान का वारंट आ पहुंचा । कन्या के गहने गिरों ( बंदक ) रखे गये । गला छूटा चम्पा इसी समय की ताक में थी । तुरन्त नये नातेदारों को सूचना दी । तुम लोग बेसुध बैठे हो , यहां गहनों का सफाया हुआ जाता है । दूसरे दिन एक नाई और दो ब्राह्मण माधव के दरवाजे पर आ कर बैठ गये । बेचारे के गले में फांसी पड़ गयी । रुपये कहां से आवें , न जमीन , न जायदाद , न बाग , न बगीचा । रहा विश्वास , वह कभी का उठ चुका था ; अब यदि कोई सम्पत्ति थी , तो केवल वही दो कोठरियां , जिसमें उसने अपनी सारी आयु बितायी थी , और उनका कोई ग्राहक न था । विलम्ब से नाक कटी जाती थी । विवश हो कर केदार के पास आया और आंखों में आंसू भरे बोला , भैया , इस समय मैं बड़े संकट में हूं , मेरी सहायता करो ।

केदार ने उत्तर दिया - मद्धू ! आजकल मैं भी तंग हो रहा हूं , तुमसे सच कहता हूं । 

चम्पा अधिकारपूर्ण स्वर से बोली- अरे , तो क्या इनके लिए भी तंग हो रहे हैं । अलग भोजन करने से क्या इज्जत अलग हो जायगी !

केदार ने स्त्री की ओर कनखियों से ताक कर कहा - नहीं - नहीं मेरा यह प्रयोजन नहीं था । हाथ तंग है तो क्या कोई न कोई प्रबन्ध किया ही जायगा । 

चंपा  ने माधव से पूछा - पांच बीस से कुछ ऊपर ही पर गहने रखे थे न  । 

माधव ने उत्तर दिया- हां , ब्याज सहित कोई सवा सौ रुपये होते हैं । 

केदार रामायण पढ़ रहे थे । फिर पढ़ने में लग गये । चम्पा ने तत्त्व की बातचीत शुरू की - रुपया बहुत है , हमारे पास होता तो कोई बात न थी । परन्तु हमें भी दूसरे से दिलाना पड़ेगा और महाजन बिना कुछ लिखाये - पढ़ाये रुपया देते नहीं । 

माधव ने सोचा , यदि मेरे पास कुछ लिखाने - पढ़ाने को होता , तो क्या और महाजन मर गये थे , तुम्हारे दरवाजे आता क्यों ? बोला - लिखने - पढ़ने को मेरे पास है ही क्या ? जो कुछ जगह - जायदाद है , वह यही घर है । 

केदार और चम्पा ने एक दूसरे को मर्मभेदी नयनों से देखा और मन ही मन कहा क्या आज सचमुच जीवन की प्यारी अभिलाषाएं पूरी होंगी । परन्तु हृदय की यह उमंग मुंह तक आते - आते गम्भीर रूप धारण कर गयी । चम्पा बड़ी गम्भीरता से बोली- घर पर तो कोई महाजन कदाचित् ही रुपया दे । शहर हो तो कुछ किराया ही आवे , पर गंवई में तो कोई सेंत में रहने वाला भी नहीं । फिर साझे की चीज ठहरी । 

केदार डरे कि कहीं चम्पा की कठोरता से खेल बिगड़ न जाय । बोले- एक महाजन से मेरी जान - पहचान है , वह कदाचित् कहने - सुनने में आ जाय ! 

चम्पा ने गर्दन हिला कर इस युक्ति की सराहना की और बोली- पर दो - चार बीस से अधिक मिलना कठिन है । 

केदार ने जान पर खेल कर कहा- अरे , बहुत दबाने पर चार बीस हो जायेंगे । और क्या !  

अबकी चम्पा ने तीव्र दृष्टि से केदार को देखा और अनमनी - सी हो कर बोली महाजन ऐसे अंधे नहीं होते । 

माधव अपने भाई - भावज के इस गुप्त रहस्य को कुछ - कुछ समझता था । वह चकित था कि इन्हें इतनी बुद्धि कहां से मिल गयी । बोला- और रुपये कहां से आवेंगे ? 

चम्पा चिढ़ कर बोली- और रुपयों के लिए और फिक्र करो ! सवा सौ रुपये इन दो कोठरियों के इस जन्म में कोई न देगा , चार बीस चाहो तो एक महाजन से दिला दूं , लिखा पढ़ी कर लो । 

माधव इन रहस्यमय बातों से सशंक हो गया । उसे भय हुआ कि यह लोग मेरे साथ कोई गहरी चाल चल रहे हैं । दृढ़ता के साथ अड़ कर बोला- और कौन - सी फिक्र करूं ? गहने होते तो कहता , लाओ रख दूं । यहां तो कच्चा सूत भी नहीं है । जब बदनाम हुए तो क्या दस के लिए क्या पचास के लिए , दोनों एक ही बात है । यदि घर बेच कर मेरा नाम रह जाय , तो यहां तक तो स्वीकार है ; परन्तु घर भी बेचूं और उस पर भी प्रतिष्ठा धूल में मिले , ऐसा मैं न करूंगा । केवल नाम का ध्यान है , नहीं एक बार नहीं कर जाऊं तो मेरा कोई क्या करेगा ? और सच पूछो तो मुझे अपने नाम की कोई चिंता नहीं है । मुझे कौन जानता है ? संसार तो भैया को हंसेगा ।

केदार का मुंह सूख गया । चम्पा भी चकरा गयी । वह बड़ी चतुर वाक्य - निपुण रमणी थी । उसे माधव जैसे गंवार से ऐसी दृढ़ता की आशा न थी । उसकी ओर आदर से देख कर बोली- लालू , कभी कभी तुम भी लड़कों की सी बातें करते हो । भला इस झोंपड़ी पर कौन सौ रुपये निकाल कर देगा ? तुम सवा सौ के बदले सौ ही दिलाओ , मैं आज ही अपना हिस्सा बेचती हूं । उतना ही मेरा भी तो है ? घर पर तो तुमको यही चार बीस मिलेंगे । हां , और रुपयों का प्रबंध हम - आप कर देंगे इज्जत हमारी तुम्हारी एक ही है , वह न जाने पायेगी । वह रुपया अलग खाते में चढ़ा लिया जायगा । 

माधव की इच्छाएं पूरी हुई । उसने मैदान मार लिया । सोचने लगा , मुझे तो रुपयों से काम है , चाहे एक नहीं , दस खाते में चढ़ा लो । रहा मकान वह जीते जी नहीं छोड़ने का । प्रसन्न हो कर चला । उसके जाने के बाद केदार और चम्पा ने कपट - भेष त्याग दिया और बड़ी देर तक एक दूसरे को इस कड़े सौदे का दोषी सिद्ध करने की चेष्टा करते रहे । अंत में मन को इस तरह संतोष दिया कि भोजन बहुत मधुर नहीं , किन्तु भर - कठौत तो है । घर हां , देखेंगे कि श्यामा रानी इस घर में कैसे राज करती हैं । 

केदार के दरवाजे पर दो बैल खड़े हैं । इनमें कितनी संघ - शक्ति , कितनी मित्रता और कितना प्रेम है । दोनों एक ही जुए में चलते हैं ; बस इनमें इतना ही नाता है । किन्तु अभी कुछ दिन हुए , जब इनमें से एक चम्पा के मैके मंगनी गया था , तो दूसरे ने तीन दिन तक नाद में मुंह नहीं डाला । परन्तु शोक , एक गोद के खेले भाई , एक छाती से दूध पीनेवाले आज इतने बेगाने हो रहे हैं कि एक घर में रहना भी नहीं चाहते । 

प्रातः काल था । केदार के द्वार पर गांव के मुखिया और नंबरदार विराजमान थे । मुंशी दातादयाल अभिमान से चारपाई पर बैठे रेहन का मसविदा तैयार करने में लगे थे । बार - बार कलम बनाते और बार - बार खत रखते , पर खत की शान न सुधरती थी । केदार का मुखारविंद विकसित था और चम्पा फूली नहीं समाती थी । माधव कुम्हलाया और म्लान था । 

मुखिया ने कहा- भाई ऐसा हित , न भाई ऐसा शत्रु । केदार ने छोटे भाई की लाज रख ली । 

नम्बरदार ने अनुमोदन किया- भाई हो तो ऐसा हो । 

मुख्तार ने कहा - भाई , सपूतों का यही काम है । 

दातादयाल ने पूछा - रेहन लिखने वाले का नाम ? 

बड़े भाई बोले - माधव वल्द शिवदत्त । 

' और लिखानेवाले का ? ' 

' केदार वल्द शिवदत्त । ' 

माधव ने बड़े भाई की ओर चकित होकर देखा । आंखें डबडबा आयीं । केदार उसकी ओर देख न सका । नंबरदार , मुखिया और मुख्तार भी विस्मित हुए । क्या केदार खुद ही रुपया दे रहा है ? बातचीत तो किसी साहूकार की थी । जब घर ही में रुपया मौजूद है तो इस रेहननामे की आवश्यकता ही क्या थी ? भाई - भाई में इतना अविश्वास अरे , राम ! राम ! क्या माधव 80 रु . का भी महंगा है । और यदि दबा ही बैठता , तो क्या रुपये पानी में चले जाते । 

सभी की आंखें सैन द्वारा परस्पर बातें करने लगीं , मानो आश्चर्य की अथाह नदी में नौकाएं डगमगाने लगीं । 

श्यामा दरवाजे की चौखट पर खड़ी थी । वह सदा केदार की प्रतिष्ठा करती थी , परन्तु आज केवल लोकरीति ने उसे अपने जेठ को आड़े हाथों लेने से रोका । 

बूढ़ी अम्मां ने सुना तो सूखी नदी उमड़ आयी । उसने एक बार आकाश की ओर देखा और माथा ठोंक लिया । 

अब उसे उस दिन का स्मरण हुआ जब ऐसा ही सुहावना सुनहरा प्रभात था और दो प्यारे - प्यारे बच्चे उसकी गोद में बैठे हुए उछल - कूद कर दूध - रोटी खाते थे । उस समय माता के नेत्रों में कितना अभिमान था , हृदय में कितनी उमंग और कितना उत्साह ! 

परन्तु आज , आह ! आज नयनों में लज्जा है और हृदय में शोक - संताप । उसने पृथ्वी की ओर देख कर कातर स्वर में कहा- हे नारायण ! क्या ऐसे पुत्रों को मेरी ही कोख में जन्म लेना था ?

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