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घमण्ड का पुतला: मुंशी प्रेमचंद सर्वश्रेठ कहानी | Ghamand ka Putla Best Stories of Premchand

मुंशी प्रेमचंद कि सर्वश्रेठ कहानियाँ घमण्ड का पुतला -Ghamand ka Putla मुंशी प्रेमचंद की कहानी : शाम हो गयी थी । मैं सरयू नदी के किनारे अपने कैम्प
Santosh Kukreti
घमण्ड का पुतला -Ghamand ka Putla ,मुंशी प्रेमचंद ,मुंशी प्रेमचंद  best stories

घमण्ड का पुतला - Ghamand ka Putla Best StorY of Premchand

मुंशी प्रेमचंद की कहानी : शाम हो गयी थी । मैं सरयू नदी के किनारे अपने कैम्प में बैठा हुआ नदी के मजे ले रहा था कि मेरे फुटबाल ने दबे पांव पास आकर मुझे सलाम किया कि जैसे वह मुझे कुछ कहना चाहता है । 

फुटबाल के नाम से जिस प्राणी का जिक्र किया गया वह मेरा अर्दली था । उसे सिर्फ एक नजर देखने से यकीन हो जाता था कि यह नाम उसके लिए पूरी तरह उचित है । वह सिर से पैर तक आदमी की शक्ल में एक गेंद था । लम्बाई - चौड़ाई बराबर । 

उसका भारी भरकम पेट , जिसने उस दायरे के बनाने में खास हिस्सा लिया था , एक लम्बे कमरबन्द में लिपटा रहता था , शायद इसलिए कि वह इन्तहा से आगे न बढ़ जाय । जिस वक्त वह तेजी से चलता था बल्कि यों कहिए कि लुढ़कता था तो साफ मालूम होता था कि कोई फुटबाल ठोकर खाकर लुढ़कता चला आता है । मैंने उसकी तरफ देखकर पूछा- क्या कहते हो ? 

इस पर फुटबाल ने ऐसी सूरत बनायी कि जैसे कहीं से पिटकर आया है और बोला हुजूर , अभी तक यहां रसद का कोई इन्तजाम नहीं हुआ । जमींदार साहब कहते हैं कि मैं किसी का नौकर नहीं हूं । 

मैंने इस निगाह से देखा कि जैसे मैं और ज्यादा नहीं सुनना चाहता । यह असम्भव था कि एक मजिस्ट्रेट की शान में जमींदार से ऐसी गुस्ताखी होती । यह मेरे हाकिमाना गुस्से को भड़काने की एक बदतमीज कोशिश थी । मैंने पूछा- जमींदार कौन है ? 

फुटबाल की खिल गयीं , बोला- क्या कहूं , कुंअर सज्जनसिंह । हुजूर , बड़ा ढीठ आदमी है । रात होने को आयी है और अभी तक हुजूर के सलाम को भी नहीं आया । घोड़ों के सामने न घास है , न दाना । लश्कर के सब आदमी भूखे बैठे हुए हैं । मिट्टी का एक बर्तन भी नहीं भेजा ।

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मुझे जमींदारों से रात - दिन साबका रहता था मगर यह शिकायत कभी सुनने में नहीं आयी थी । इसके विपरीत वह मेरी खातिर - तवाजो में ऐसी जांफिशानी से काम लेते थे जो उनके स्वाभिमान के लिए ठीक न थी । उनमें दिल खोलकर आतिथ्य - सत्कार करने का भाव तनिक भी न होता था । 

न उसमें शिष्टाचार था , न वैभव का प्रदर्शन जो ऐब है । इसके बजाय वहां बेजा रसूख की फिक्र और स्वार्थ की हवस साफ दिखायी देती थी और इस रसूख बनाने की कीमत काव्योचित अतिशयोक्ति के साथ उन गरीबों से वसूल की जाती थी जिनका बेकसी के सिवा और कोई हाथ पकड़ने वाला नहीं । 

उनके बात करने के ढंग में वह मुलायमियत और आजिजी बरती जाती थी , जिसका स्वाभिमान से बैर है और अक्सर ऐसे मौके आते थे , जब इन खातिरदारियों से तंग होकर दिल चाहता था कि काश , इन खुशामदी आदमियों की सूरत न देखनी पड़ती । 

मगर आज अपने फुटबाल की जबान से यह कैफियत सुनकर मेरी जो हालत हुई उसने साबित कर दिया कि रोज - रोज की खातिरदारियों और मीठी मीठी बातों ने मुझ पर असर किये बिना नहीं छोड़ा था । 

मैं यह हुक्म देने वाला ही था कि कुंअर सज्जनसिंह को हाजिर करो कि एकाएक मुझे खयाल आया , इन मुफ्तखोर चपरासियों के कहने पर एक प्रतिष्ठित आदमी को अपमानित करना न्याय नहीं है । मैंने अर्दली से कहा - बनियों के पास जाओ , नकद दाम देकर चीजें लाओ और याद रखो कि मेरे पास कोई शिकायत न आए । 

अर्दली दिल में मुझे कोसता हुआ चला गया । 

मगर मेरे आश्चर्य की कोई सीमा न रही , जब वहां एक हफ्ते तक रहने पर भी कुंअर साहब से मेरी भेंट न हुई । अपने आदमियों और लश्कर वालों की जबान से कुंअर साहब की ढिठाई , घमण्ड और हेकड़ी की कहानियां रोज सुना करता । 

और मेरे दुनिया देखे हुए पेशकार ने ऐसे अतिथि सत्कार - शून्य गांव में पड़ाव डालने के लिए मुझे कई बार इशारों से समझाने - बुझाने की कोशिश की । 

गालिबन मैं पहला आदमी था जिससे यह भूल हुई थी और अगर मैंने जिले के नक्शे के बदले लश्कर वालों से अपने दौरे का प्रोग्राम बनाने में मदद ली होती तो शायद इस अप्रिय अनुभव की नौबत न आती । लेकिन कुछ अजब बात थी कि कुंअर साहब को बुरा - भला कहना मुझ पर उल्टा असर डालता था ।यहां तक कि मुझे उस आदमी से मुलाकात करने की इच्छा पैदा हुई जो सर्वशक्तिमान अफसरों से इतना ज्यादा अलग - अलग रह सकता है । 

सुबह का वक्त था , मैं गढ़ी में गया । नीचे सरयू नदी लहरें मार रही थी । उस पार साखू का जंगल था । मीलों तक बादामी रेत , उन पर खरबूजे और तरबूज की क्यारियां थीं । पीले पीले फूलों से लहराती हुई । बगुलों और मुर्गाबियों के गोल - के - गोल बैठे हुए थे । 

सूर्य देवता ने जंगलों से सिर निकाला , लहरे जगमगायीं , पानी में तारे निकले । बड़ा सुहाना , आत्मिक उल्लास देने वाला दृश्य था । 

मैंने खबर करवायी और कुंअर साहब के दीवानखाने में दाखिल हुआ । लम्बा - चौड़ा कमरा था । फर्श बिछा हुआ था । सामने मसनद पर एक बहुत लम्बा - तड़ंगा आदमी बैठा था । सर के बाल मुड़े हुए , गले में रुद्राक्ष की एक माला , लाल - लाल आंखें , ऊंचा माथा पुरुषोचित अभिमान की इससे अच्छी तसवीर नहीं हो सकती । चेहरे से रोबदाब बरसता था । 

कुंअर साहब ने मेरे सलाम को इस अन्दाज से लिया कि जैसे वह इसके आदी हैं । मसनद से उठकर उन्होंने बहुत बड़प्पन के ढंग से मेरी अगवानी की , खैरियत पूछी और इस तकलीफ के लिए मेरा शुक्रिया अदा करने के बाद इतर और गान से मेरी तवाजो की । 

तब वह मुझे अपनी उस गढ़ी की सैर कराने चले जिसने किसी जमाने में जरूर आसफुद्दौला को जिच किया होगा मगर इस वक्त बहुत टूटी - फूटी हालत में थी । यहां के एक - एक रोड़े पर कुंवर साहब को नाज था । उनके खानदानी बड़प्पन और रोबदाब का जिक्र उनकी जबान से सुनकर विश्वास न करना असम्भव था । 

उनका बयान करने का ढंग यकीन को मजबूत करता था और वे उन कहानियों के सिर्फ पासवान ही न थे बल्कि वह उनके ईमान का हिस्सा थीं और जहां तक उनकी शक्ति में था , उन्होंने अपनी आन निभाने में कभी कसर नहीं की । 

कुंअर सज्जनसिंह खानदानी रईस थे । उनकी वंश परम्परा यहां - वहां टूटती हुई अन्त में किसी महात्मा ऋषि से जाकर मिल जाती थी । उन्हें तपस्या और भक्ति और योग कोई दावा न था लेकिन इसका गर्व उन्हें अवश्य था कि वे एक ऋषि की सन्तान हैं । 

पुरखों के जंगली कारनामे भी उनके लिए गर्व का कुछ कम कारण न थे । इतिहास में उनका कहीं जिक न हो मगर खानदानी भाट ने उन्हें अमर बनाने में कोई कसर नहीं रखी थी और अगर शब्दों में कुछ ताकत है तो यह गढ़ी रोहतास या कालिंजर के किलों से भी आगे बढ़ी हुई थी । 

कम - से - कम प्राचीनता और बर्बादी के बाह्य लक्षणों में तो उसकी मिसाल मुश्किल से मिल सकती थी , क्योंकि पुराने जमाने में चाहे उसने मुहासरों और सुरंगों को हेय समझा हो लेकिन इस वक्त वह चींटियों और दीमकों के हमलों का भी सामना न कर सकती थी । 

कुंअर सज्जनसिंह से मेरी भेंट बहुत संक्षिप्त थी लेकिन इस दिलचस्प आदमी ने मुझे हमेशा के लिए अपना भक्त बना लिया । बड़ा समझदार , मामले को समझने वाला , दूरदर्शी आदमी था । आखिर मुझे उसका बिन पैसों का गुलाम बनना था । 

बरसात में सरयू नदी इस जोर - शोर से चढ़ी कि हजारों गांव बरबाद हो गये , बड़े बड़े तनावर दरख्त तिनकों की तरह बहते चले जाते थे । चारपाइयों पर सोते हुए बच्चे और औरतें , खूंटे पर बंधे हुए गाय और बैल उसकी गरजती हुई लहरों में समा गये । खेतों में नाव चलती थी । 

शहर में उड़ती हुई खबरें पहुंचीं । सहायता के प्रस्ताव पास हुए । सैकड़ों ने सहानुभूति और शोक के अरजेण्ट तार जिले के बड़े साहब की सेवा में भेजे । टाउनहाल में कौमी हमदर्दी की पुरशोर सदाएं उठीं और उस हंगामे में बाढ़ पीड़ितों की दर्दभरी पुकारें दब गयीं । 

सरकार के कानों में फरियाद पहुंची । एक जांच कमीशन तैनात किया गया । जमीदारों को हुक्म हुआ कि वे कमीशन के सामने अपने नुकसानों को विस्तार से बतायें और उसके सबूत दें । शिवरामपुर के महाराजा साहब को इस कमीशन का सभापति बनाया गया । जमींदारों में रेल - पेल शुरू हुई । 

नसीब जागे । नुकसान के तखमीने का फैसला करने में काव्य - बुद्धि से काम लेना पड़ा । सुबह से शाम तक कमीशन के सामने एक जमघट रहता । आनरेबुल महाराजा साहब को सांस लेने की फुरसत न थी । दलील और शहादत का काम बात बनाने और खुशामद से लिया जाता था । महीनों यही कैफियत रही । 

नदी किनारे के सभी जमींदार अपने नुकसान की फरियादें पेश कर गये । अगर कमीशन से किसी को कोई फायदा नहीं पहुंचा तो वह कुंअर सज्जनसिंह थे । उनके सारे मौजे सरयू के किनारे पर थे और सब तबाह हो गये थे , गढ़ी की दीवारें भी उसके हमलों से न बच सकी थीं , मगर उनकी जबान ने खुशामद करना सीखा ही न था और यहां उसके बगैर रसाई मुश्किल थी ।

चुनांचे वह कमीशन के सामने न आ सके । मियाद खत्म होने पर कमीशन ने रिपोर्ट पेश की , बाढ़ में डूबे हुए इलाकों में लगान की आम माफी हो गयी । रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ सज्जनसिंह वह भाग्यशाली जमींदार थे , जिनका कोई नुकसान नहीं हुआ था । कुंअर साहब ने रिपोर्ट सुनी ,मगर माथे पर बल न आया । 

उनके असामी गढ़ी सहन में जमा थे , यह हुक्म सुना तो रोने धोने लगे । तब कुंअर साहब उठे और बुलन्द आवाज में बोले- मेरे इलाके में भी माफी है । एक कौड़ी लगान न लिया जाये । मैंने यह वाकया सुना और खुद ब खुद मेरी आंखों से आंसू टपक पड़े । बेशक यह वह आदमी है , जो हुकूमत और अख्तियार के तूफान में जड़ से उखड़ जाय मगर झुकेगा नहीं । 

वह दिन भी याद रहेगा जब अयोध्या में हमारे जादू सा करने वाले कवि शंकर का राष्ट्र की ओर से बधाई देने के लिए शानदार जलसा हुआ । हमारा गौरव , हमारा जोशीला शंकर यूरोप  और अमरीका पर अपने काव्य का जादू करके वापस आया था । अपने कमालों पर घमण्ड करने वाले योरोप ने उसकी पूजा की थी । 

उसकी भावनाओं ने ब्राउनिंग और शैली के प्रेमियों को भी अपनी वफा का पाबन्द न रहने दिया । उसकी जीवन - सुधा से योरोप के प्यासे जी उठे । सारे सभ्य संसार ने उसकी कल्पना की उड़ान के आगे सिर झुका दिये । उसने भारत को योरोप की निगाहों में अगर ज्यादा नहीं तो यूनान और रोम के पहलू में बिठा दिया था । 

जब तक वह यूरोप  में रहा , दैनिक अखबारों के पन्ने उसकी चर्चा से भरे रहते थे । युनिवर्सिटियों और विद्वानों की सभाओं ने उस पर उपाधियों की मूसलाधार वर्षा कर दी थी । सम्मान का वह पदक जो योरोप वालों का प्यारा सपना और जिन्दा आरजू है , वह पदक हमारे प्यारे जिन्दादिल शंकर के सीने पर शोभा दे रहा था और उसकी वापसी के बाद आज उन्हीं राष्ट्रीय भावनाओं के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए हिन्दोस्तान के दिल और दिमाग अयोध्या में जमा थे । 

इसी अयोध्या की गोद में श्री रामचन्द्र खेलते थे और यहीं उन्होंने वाल्मीकि की जादूभरी लेखनी की प्रशंसा की थी । उसी अयोध्या में हम अपने मीठे कवि शंकर पर अपनी मुहब्बत के फूल चढ़ाने आए थे । 

इस राष्ट्रीय कर्त्तव्य में सरकारी हुक्काम भी बड़ी उदारतापूर्वक हमारे साथ सम्मिलित थे । शंकर ने शिमला और दार्जिलिंग के फरिश्तों को भी अयोध्या में खींच लिया था । अयोध्या को बहुत इन्तजार के बाद ये दिन देखना नसीब हुआ । 

जिस वक्त शंकर ने उस विराट पण्डाल में पैर रखा , हमारे हृदय राष्ट्रीय गौरव और नशे से मतवाले हो गये । ऐसा महसूस होता था कि हम उस वक्त किसी अधिक पवित्र , अधिक प्रकाशवान दुनिया के बसने वाले हैं । 

एक क्षण के लिए - अफसोस है कि सिर्फ एक क्षण के लिए - अपनी गिरावट और बर्बादी का ख्याल हमारे दिलों से दूर हो गया । जय जय की आवाजों ने हमें इस तरह मस्त कर दिया जैसे महुअर नाग को मग्न कर देता है । 

एड्रेस पढ़ने का गौरव मुझको प्राप्त हुआ था । सारे पण्डाल में खामोशी छायी हुई थी । जिस वक्त मेरी जबान यह शब्द निकले- ऐ राष्ट्र के नेता ! ऐ हमारे आत्मिक गुरु ! हम सच्ची मुहब्बत से तुम्हें बधाई देते हैं और सच्ची श्रद्धा से तुम्हारे पैरों पर सिर झुकाते हैं .... 

यकायक मेरी निगाह उठी और मैंने एक हृष्ट - पुष्ट हैकल आदमी को ताल्लुकेदारों की कतार से उठकर बाहर जाते देखा । यह कुंअर सज्जनसिंह थे । 

मुझे कुंअर साहब की यह बेमौका हरकत , जिसे अशिष्टता समझने में कोई बाधा नहीं है बुरी मालूम हुई । हजारों आंखें उनकी तरफ हैरत से उठीं । 

जलसे के खत्म होते ही मैंने पहला काम जो किया वह कुंअर साहब से इस चीज के बारे में जवाब - तलब करना था ।

मैंने पूछा- क्यों साहब , आपके पास इस बेमौका हरकत का क्या जवाब है ? 

सज्जनसिंह ने गम्भीरता से जवाब दिया- आप सुनना चाहें तो जवाब दूं । 

" शौक से फरमाइये " 

" अच्छा तो सुनिये । मैं शंकर की कविता का प्रेमी हूं , शंकर की इज्जत करता हूं , शंकर पर गर्व करता हूं , शंकर को अपने और अपनी कौम के ऊपर एहसान करने वाला समझता हूँ . मगर उसके साथ ही उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मानने या उनके चरणों में सिर झुकाने के लिए तैयार नहीं हूं । " 

मैं आश्चर्य से उसका मुंह ताकता रह गया । यह आदमी नहीं , घमण्ड का पुतला है । देखें यह सर कभी झुकता है या नहीं । 

पूरनमासी का पूरा चांद सरयू के सुनहरे फर्श पर नाचता था और लहरें खुशी से गले मिल - मिलकर गाती थीं । फागुन का महीना था , पेड़ों में कोंपलें निकली थीं । और कोयल कूकने लगी थीं । 

मैं अपना दौरा खत्म करके सदर लौटता था । रास्ते में कुंअर सज्जनसिंह से मिलने का चाव मुझे उनके घर तक ले गया , जहां अब मैं बड़ी बेतकल्लुफी से जाता आता था । 

मैं शाम के वक्त नदी की सैर को चला । वह प्राणदायिनी हवा , वह उड़ती हुई लहरें , वह गहरी निस्तब्धता - सारा दृश्य एक आकर्षक सुहाना सपना था । चांद के चमकते हुए गीत से जिस तरह लहरें झूम रही थीं , उसी तरह मीठी चिन्ताओं से दिल उमड़ा आता था । 

मुझे ऊंचे कगार पर एक पेड़ के नीचे कुछ रोशनी दिखाई दी । मैं ऊपर चढ़ा । वहां बरगद की घनी छाया में एक धूनी जल रही थी । उसके सामने एक साधु पैर फैलाये बरगद की एक मोटी जटा के सहारे लेटे हुये थे । उनका चमकता हुआ चेहरा आग की चमक को लजाता था । नीले तालाब में कमल खिला हुआ था । 

उनके पैरों के पास एक दूसरा आदमी बैठा हुआ था । उसकी पीठ मेरी तरफ थी । वह उस साधु के पैरों पर अपना सिर रखे हुए था , पैरों को चूमता था और आंखों से लगाता था । साधु अपने दोनों हाथ उसके सिर पर रखे हुए थे कि जैसे वासना धैर्य और संतोष के आंचल में आश्रय ढूंढ रही हो । भोला लड़का मां - बाप की गोद में आ बैठा था । 

एकाएक वह झुका हुआ सर उठा और मेरी निगाह उसके चेहरे पर पड़ी । मुझे सकता सा हो गया । यह कुंअर सज्जनसिंह थे । वह सर जो झुकना न जानता था , इस वक्त जमीन चूम रहा था ।

वह माथा जो एक ऊंचे मंसबदार के सामने न झुका , जो एक प्रतापी वैभवशाली महाराजा के सामने न झुका , जो एक बड़े देशप्रेमी कवि और दार्शनिक के सामने न झुका , इस वक्त एक साधु के कदमों पर गिरा हुआ था । घमण्ड , वैराग्य के सामने सिर झुकाये खड़ा था ।

मेरे दिल में इस दृश्य से भक्ति का एक आवेग पैदा हुआ । आंखों के सामने से एक परदा - सा हटा और कुंअर सज्जनसिंह का आत्मिक स्तर दिखायी दिया । मैं कुंअर साहब की तरफ चला । उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर अपने पास बिठाना चाहा लेकिन मैं उनके पैरों से लिपट गया और बोला- मेरे दोस्त , मैं आज तक तुम्हारी आत्मा के बड़प्पन से बिल्कुल बेखबर था । 

आज तुमने मेरे हृदय पर उसको अंकित कर दिया कि वैभव और प्रताप , कमाल और शोहरत यह सब घटिया चीजें हैं , भौतिक चीजें हैं । 

वासनाओं में लिपटे हुए लोग इस योग्य नहीं कि हम उनके सामने भक्ति से सिर झुकायें , वैराग्य और परमात्मा से दिल लगाना ही वे महान् गुण हैं जिनकी ड्योढ़ी पर बड़े - बड़े वैभवशाली और प्रतापी लोगों के सिर भी झुक जाते हैं । 

यही वह ताकत है जो वैभव और प्रताप को अपने पैरों पर गिरा सकती है । ऐ तपस्या एकान्त में बैठनेवाली आत्माओ ! तुम धन्य हो कि घमण्ड के पुतले भी तुम्हारे पैरों की धूल को माथे पर चढ़ाते हैं । 

कुंअर सज्जनसिंह ने मुझे छाती से लगाकर कहा- मिस्टर वागले , आज आपने मुझे सच्चे गर्व का रूप दिखा दिया और मैं कह सकता हूं कि सच्चा गर्व प्रार्थना से कम नहीं । विश्वास मानिये , मुझे इस वक्त ऐसा मालूम होता है कि गर्व में भी आत्मिकता को पाया जा सकता है । आज मेरे सिर में गर्व का जो नशा है , वह कभी नहीं था ।

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