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आत्माराम: प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानी | Aatmaram Premchand Best Story

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Santosh Kukreti

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आत्माराम - कहानी प्रेमचन्द की 

प्रेमचंद की कहानी:  वे दों - ग्राम में महादेव सोनार एक सुविख्यात आदमी था । वह अपने सायबान में प्रातः से संध्या तक अंगीठी के सामने बैठा हुआ खटखट किया करता था । यह लगातार ध्वनिः सुनने के लोग इतने अभ्यस्त हो गये थे कि जब किसी कारण से वह बंद हो जाती , तो जान पड़ता था , कोई चीज गायब हो गयी । 

वह नित्य प्रति एक बार प्रातःकाल अपने तोते का पिंजड़ा लिए कोई भजन गाता हुआ तालाब की ओर जाता था । उस धुंधले प्रकाश में उसका जर्जर शरीर , पोपला मुंह और झुकी हुई कमर देखकर किसी अपरिचित मनुष्य को उसके पिशाच होने का भ्रम हो सकता था । ज्यों ही लोगों के कानों में आवाज आती- ' सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता ' , लोग समझ जाते कि भोर हो गयी । 

महादेव का पारिवारिक जीवन सुखमय न था । उसके तीन पुत्र थे , तीन बहुएं थीं , दर्जनों नाती - पोते थे , लेकिन उसके बोझ को हलका करने वाला कोई न था । लड़के कहते- ' जब तक दादा जीते हैं , हम जीवन का आनंद भोग लें , फिर तो यह ढोल गले पड़ेगी ही । ' बेचारे महादेव को कभी - कभी निराहार ही रहना पड़ता । 

भोजन के समय उसके घर में साम्यवाद का ऐसा गगनभेदी निर्घोष होता कि वह भूखा ही उठ आता , और नारियल का हुक्का पीता हुआ सो जाता । उनका व्यावसायिक जीवन और भी अशांतिकारक था । 

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यद्यपि वह अपने काम में निपुण था , उसकी खटाई औरों से कहीं ज्यादा शुद्धिकारक और उसकी रासायनिक क्रियाएं कहीं ज्यादा कष्टसाध्य थीं , तथापि उसे आये दिन शक्की और धैर्य - शून्य प्राणियों के अपशब्द सुनने पड़ते थे , पर महादेव अविचलित गाम्भीर्य से सिर झुकाये सब कुछ सुना करता था । 

ज्यों ही यह कलह शांत होता , वह अपने तोते की ओर देख कर पुकार उठता - ' सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता । ' इस मंत्र को जपते ही उसके चित्त को पूर्ण शांति प्राप्त हो जाती थी । 

एक दिन संयोगवश किसी लड़के ने पिंजड़े का द्वार खोल दिया । तोता उड़ गया । महादेव ने सिर उठाकर जो पिंजड़े की ओर देखा , तो उसका कलेजा सन्न - से हो गया । तोता कहां गया ! उसने फिर पिंजड़े को देखा , तोता गायब था ! महादेव घबड़ा कर उठा और इधर - उधर खपरैलों पर निगाह दौड़ाने लगा । 

उसे संसार में कोई वस्तु अगर प्यारी थी , तो वह यही तोता । लड़के बालों , नाती - पोतों से उसका जी भर गया था । लड़कों की चुलबुल से उसके काम में विघ्न पड़ता था । बेटों से उसे प्रेम न था ; इसलिए नहीं कि वे निकम्मे थे , बल्कि इसलिए कि उनके कारण वह अपने आनंददायी कुल्हड़ों की नियमित संख्या से वंचित रह जाता था । 

पड़ोसियों से उसे चिढ़ थी , इसलिए कि वे अंगीठी से आग निकाल ले जाते थे । इन समस्त विघ्न - बाधाओं से उसके लिए कोई पनाह थी , तो वह यही तोता था । उससे उसे किसी प्रकार का कष्ट न होता था । वह अब उस अवस्था में था जब मनुष्य को शांति भोग के सिवा और कोई इच्छा नहीं रहती । 

तोता एक खपरैल पर बैठा था । महादेव ने पिंजड़ा उतार लिया और उसे देख कर कहने लगा - ' आ आ ' ' सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता । ' लेकिन गांव और घर के लड़के एकत्र होकर चिल्लाने और तालियां बजाने लगे ऊपर से कौओं ने कांव- कांव की रट लगायी ?

तोता उड़ा और गांव से बाहर निकल कर एक पेड़ पर जा बैठा । महादेव खाली पिंजड़ा लिये उसके पीछे दौड़ा , सो दौड़ा । लोगों को उसकी द्रुतिगामिता पर अचम्भा हो रहा था । मोह की इससे सुंदर , इससे सजीव , इससे भावमय कल्पना नहीं की जा सकती । 

दोपहर हो गयी थी । किसान लोग खेतों से चले आ रहे थे । उन्हें विनोद का अच्छा अवसर मिला । महादेव को चिढ़ाने में सभी को मजा आता था । किसी ने कंकड़ फेंके , किसी ने तालियां बजायीं । तोता फिर उड़ा और वहां से दूर आम के बाग में एक पेड़ की फुनगी पर जा बैठा । महादेव फिर खाली पिंजड़ा लिये मेंढक की भांति उचकता चला । 

बाग में पहुंचा तो पैर के तलुओं से आग निकल रही थी ; सिर चक्कर खा रहा था । जब जरा सावधान हुआ , तो फिर पिंजड़ा उठा कर कहने लगा - सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता । " तोता फुनगी से उतर कर नीचे की एक डाल पर आ बैठा , किन्तु महादेव की ओर सशंक नेत्रों से ताक रहा था । 

महादेव ने समझा , डर रहा है । वह पिंजड़े को छोड़ कर आप एक दूसरे पेड़ की आड़ में छिप गया । तोते ने चारों ओर गौर से देखा , निश्शंक हो गया , उतरा और आ कर पिंजड़े के ऊपर बैठ गया । महादेव का हृदय उछलने लगा

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' सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता ' का मंत्र जपता हुआ धीरे - धीरे तोते के समीप आया और लपका कि तोते को पकड़ ले ; किन्तु तोता हाथ न आया , फिर पेड़ पर जा बैठा । 

शाम तक यही हाल रहा । तोता कभी इस डाल पर जाता , कभी उस डाल पर कभी पिंजड़े पर आ बैठता , कभी पिंजड़े के द्वार पर बैठ अपने दानापानी की प्यालियों को देखता , और फिर उड़ जाता । बुड्ढा अगर मूर्तिवान मोह था , तो तोता मूर्तिमयी माया । यहां तक कि शाम हो गयी । माया और मोह का यह संग्राम अंधकार में विलीन हो गया ।

रात हो गयी ! चारों ओर निबिड़ अंधकार छा गया । तोता न जाने पत्तों में कहा छिपा बैठा था । महादेव जानता था कि रात को तोता कहीं उड़ कर नहीं जा सकता , और पिंजड़े ही में आ सकता है । फिर भी वह उस जगह से हिलने का नाम न लेता था । आज उसने दिन भर कुछ नहीं खाया । रात के भोजन का समय भी निकल गया , पानी की बूंद भी उसके कंठ में न गयी ; लेकिन उसे न भूख थी , न प्यास ! 

तोते के बिना उसे अपना जीवन निस्सार , शुष्क और सूना जान पड़ता था । वह दिन - रात काम करता था ; इसलिए कि यह उसकी अंतःप्रेरणा थी ; जीवन के और काम इसलिए करता था कि आदत थी । 

इन कामों में उसे अपनी सजीवता का लेश - मात्र भी ज्ञान न होता था । तोता ही वह वस्तु था , जो उसे चेतना की याद दिलाता था । उसका हाथ से जाना जीव का देह त्याग करना था । 

महादेव दिन - भर का भूखा , थका - मांदा , रह - रह कर झपकियां ले लेता था ; किन्तु एक क्षण में फिर चौंक कर आंखें खोल देता और उस विस्तृत अंधकार में उसकी आवाज सुनायी देती - ' सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता ' । 

आधी रात गुजर गयी थी । सहसा वह कोई आहट पा कर चौंका । देखा , एक - दूसरे वृक्ष के नीचे एक धुंधला दीपक जल रहा है , और कई आदमी बैठे हुए आपस में कुछ बातें कर रहे हैं । वे सब चिलम पी रहे थे । तमाखू की महक ने उसे अधीर कर दिया । उच्च स्वर से बोला - ' सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता ' और उन आदमियों की ओर चिलम पीने चला गया . 

किन्तु जिस प्रकार बंदूक की आवाज सुनते ही हिरन भाग जाते हैं उसी प्रकार उसे आते देख सब - के - सब उठ कर भागे । कोई इधर गया , कोई उधर महादेव चिल्लाने लगा - ' ठहरो ठहरो ! ' एकाएक उसे ध्यान आ गया , ये सब चोर हैं । वह जोर से चिल्ला उठा- ' चोर - चोर , पकड़ो - पकड़ो ! ' चोरों ने पीछे फिर कर न देखा । 

महादेव दीपक के पास गया , तो उसे एक कलसा रखा हुआ मिला जो मोर्चे से काला हो रहा था । महादेव का हृदय उछलने लगा । उसने कलसे में हाथ डाला , तो मोहरें थीं । उसने एक मोहर बाहर निकाली और दीपक के उजाले में देखा । हां , मोहर थी । उसने तुरंत कलसा उठा लिया और दीपक बुझा दिया और पेड़ के नीचे छिप कर बैठा रहा । साह से चोर बन गया ।

उसे फिर शंका हुई , ऐसा न हो , चोर लौट आवें , और मुझे अकेला देखकर मोहरें छीन लें । उसने कुछ मोहर कमर में बांधी , फिर एक सूखी लकड़ी से जमीन की मिट्टी हटा कर कई गड्ढे बनाये , उन्हें मोहरों से भर कर मिट्टी से ढंक दिया ।

महादेव के अंतर्नेत्रों के सामने अब एक दूसरा जगत् था , चिंताओं और कल्पना से परिपूर्ण । यद्यपि अभी कोष के हाथ से निकल जाने का भय था ; पर अभिलाषाओं ने अपना काम शुरू कर दिया । एक पक्का मकान बन गया , सराफे की एक भारी दुकान खुल गयी , निज सम्बन्धियों से फिर नाता जुड़ गया , विलास की सामग्रियां एकत्रित हो गयीं । 

तब तीर्थ यात्रा करने चले , और वहां से लौट कर बड़े समारोह से यज्ञ , ब्रह्मभोज हुआ । इसके पश्चात् एक शिवालय और कुआं बन गया , एक बाग भी लग गया और वह नित्यप्रति कथा - पुराण सुनने लगा । साधु - सन्तों का आदर - सत्कार होने लगा 

अकस्मात् उसे ध्यान आया , कहीं चोर आ जायं , तो मैं भागूंगा क्योंकर ? उसने परीक्षा करने के लिए कलसा उठाया और दो सौ पग तक बेतहाशा भागा हुआ चला गया । जान पड़ता था , उसके पैरों में पर लग गये हैं । 

चिंता शांत हो गयी । इन्हीं कल्पनाओं में रात व्यतीत हो गयी । उषा का आगमन हुआ , हवा जगी , चिड़ियां गाने लगीं । सहसा महादेव के कानों में आवाज आयी - 

' सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता , 

राम के चरण में चित्त लागा । ' 

यह बोल सदैव महादेव की जिह्वा पर रहता था । दिन में सहस्रों ही बार ये शब्द उसके मुंह से निकलते थे , पर उनका धार्मिक भाव कभी भी उसके अंतःकरण को स्पर्श न करता था । जैसे किसी बाजे से राग निकलता है , उसी प्रकार उसके मुंह से यह बोल निकलता था । 

निरर्थक और प्रभाव - शून्य । तब उसका हृदय - रूपी वृक्ष पत्र - पल्लव विहीन था । यह निर्मल वायु उसे गुंजरित न कर सकती थी ; पर अब उस वृक्ष में कोंपलें और शाखाएं निकल आयी थीं । इस वायु प्रवाह से झूम उठा , गुंजित हो गया । 

अरुणोदय का समय था । प्रकृति एक अनुरागमय प्रकाश में डूबी हुई थी । उसी समय तोता पैरों को जोड़े हुए ऊंची डाल से उतरा , जैसे आकाश से कोई तारा टूटे और आकर पिंजड़े में बैठ गया । महादेव प्रफुल्लित होकर दौड़ा और पिंजड़े को उठा कर बोला- आओ आत्माराम तुमने कष्ट तो बहुत दिया , पर मेरा जीवन भी सफल कर दिया । 

अब तुम्हें चांदी के पिंजड़े में रखूंगा और सोने से मढ़ दूंगा । उसके रोम - रोम से परमात्मा के गुणानुवाद की ध्वनि निकलने लगी । प्रभु तुम कितने दयावान् हो ! यह तुम्हारा असीम वात्सल्य है , नहीं तो मुझ जैसा पापी , पतित प्राणी कब इस कृपा के योग्य था । इन पवित्र भावों से उसकी आत्मा विह्वल हो गयी ! वह अनुरक्त हो कर कह उठा-

' सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता , 

राम के चरण में चित्त लागा । 

उसने एक हाथ में पिंजड़ा लटकाया , बगल में कलसा दबाया और घर चला । 

महादेव घर पहुंचा , तो अभी कुछ अंधेरा था । रास्ते में एक कुत्ते के सिवा और किसी से भेंट न हुई , और कुत्ते को मोहरों से विशेष प्रेम नहीं होता । उसने कलसे को एक नाद में छिपा दिया , और उसे कोयले से अच्छी तरह ढंक कर अपनी कोठरी में रख आया । जब दिन निकल आया तो वह सीधे पुरोहित के घर पहुंचा । 

पुरोहित पूजा पर बैठे सोच रहे थे कल ही मुकदमे की पेशी है और अभी तक हाथ में कौड़ी भी नहीं यजमानों में कोई सांस भी नहीं लेता । इतने में महादेव ने पालागन की । पंडित जी ने मुंह फेर लिया । यह अमंगलमूर्ति कहां से आ पहुंची , मालूम नहीं , दाना भी मयस्सर होगा या नहीं । रुष्ट हो कर पूछा- क्या है जी , क्या कहते हो । जानते नहीं हम इस समय पूजा पर रहते हैं । 

महादेव ने कहा- महाराज , आज मेरे यहां सत्यनारायण की कथा है । 

पुरोहित जी विस्मित हो गये । कानों पर विश्वास न हुआ । महादेव के घर कथा का होना उतनी ही असाधारण घटना थी , जितनी अपने घर से किसी भिखारी के लिए भीख निकालना । पूछा- आज क्या है ? 

महादेव बोला- कुछ नहीं , ऐसी इच्छा हुई कि आज भगवान की कथा सुन लूं । 

प्रभात ही से तैयारी होने लगी । वेदों के निकटवर्ती गांवों में सुपारी फिरी । कथा के उपरांत भोज का भी नेवता था । जो सुनता आश्चर्य करता । आज रेत में दूब कैसे जमी ।

संध्या समय जब सब लोग जमा हो गए , और पंडित जी अपने सिंहासन पर विराजमान हुए , तो महादेव खड़ा होकर उच्च स्वर में बोला- भाइयो , मेरी सारी उम्र छल - कपट में कट गयी । मैंने न जाने कितने आदमियों को दगा दी , कितने खरे को खोटा किया ; पर अब भगवान ने मुझ पर दया की है , वह मेरे मुंह की कालिख को मिटाना चाहते हैं । 

मैं आप सब भाइयों से ललकार कर कहता हूं कि जिसका मेरे जिम्मे जो कुछ निकलता हो , जिसकी जमा मैंने मार ली हो , जिसके चोखे माल को खोटा कर दिया हो , वह आ कर अपनी एक - एक कौड़ी चुका ले , अगर कोई यहां न आ सका हो , तो आप लोग उससे जा कर कह दीजिए , कल से एक महीने तक , जब जी चाहे , आये और अपना हिसाब चुकता कर ले । गवाही - साखी का काम नहीं । 

सब लोग सन्नाटे में आ गये । कोई मार्मिक भाव से सिर हिला कर बोला- हम कहते न थे । किसी ने अविश्वास से कहा - क्या खा कर भरेगा , हजारों का टोटल हो जायगा ।

एक ठाकुर ने ठठोली की- और जो लोग सुरधाम चले गये ।

महादेव ने उत्तर दिया - उसके घर वाले तो होंगे । 

किन्तु इस समय लोगों को वसूली की इतनी इच्छा न थी , जितनी यह जानने की कि इसे इतना धन मिल कहां से गया । किसी को महादेव पास आने का साहस न हुआ । देहात के आदमी थे , गड़े मुर्दे उखाड़ना क्या जानें । 

फिर प्रायः लोगों को याद भी न था कि उन्हें महादेव से क्या पाना है , और ऐसे पवित्र अवसर पर भूल - चूक हो जाने का भय उनका मुंह बन्द किये हुए था । सबसे बड़ी बात यह थी कि महादेव की साधुता ने उन्हें वशीभूत कर लिया था । 

अचानक पुरोहित जी बोले- तुम्हें याद है , मैंने एक कंठा बनाने के लिए सोना दिया था , तुमने कई माशे तौल में उड़ा दिये थे ।

महादेव- हां , याद है , आपका कितना नुकसान हुआ होगा है? 

पुरोहित- पचास रुपये से कम न होगा । 

महादेव ने कमर से दो मोहरें निकाली और पुरोहित जी के सामने रख दीं । 

पुरोहित जी की लोलुपता पर टीकाएं होने लगीं । यह बेईमानी है , बहुत हो , तो दो चार रुपये का नुकसान हुआ होगा । बेचारे से पचास रुपये ऐंठ लिये नारायण का भी डर नहीं बनने को पंडित , पर नियत ऐसी खराब ! राम - राम! 

लोगों को महादेव पर एक श्रद्धा - सी हो गयी । एक घंटा बीत गया पर उन सहस्रों मनुष्यों में से एक भी खड़ा न हुआ । तब महादेव ने फिर कहा - मालूम होता है , आप लोग अपना अपना हिसाब भूल गये हैं , इसलिए आज कथा होने दीजिए । 

मैं एक महीने तक आपकी राह देखूंगा । इसके पीछे तीर्थ यात्रा करने चला जाऊंगा । आप सब भाइयों से मेरी विनती है कि आप मेरा उद्धार करें । 

एक महीने तक महादेव लेनदारों की राह देखता रहा । रात को चोरों के भय से नींद न आती । अब वह कोई काम न करता । शराब का चसका भी छूटा । साधु - अभ्यागत जो द्वार पर आ जाते , उनका यथायोग्य सत्कार करता दूर - दूर उसका सुयश फैल गया । 

यहां तक कि महीना पूरा हो गया , और एक आदमी भी हिसाब लेने न आया । अब महादेव को ज्ञान हुआ कि संसार में कितना धर्म , कितना सद्व्यवहार है । अब उसे मालूम हुआ कि संसार बुरों के लिए बुरा है और अच्छे के लिए अच्छा । 

इस घटना को हुए पचास वर्ष बीत चुके हैं आप वेदों जाइये , तो दूर ही से एक सुनहला कलस दिखायी देता है । वह ठाकुरद्वारे का कलस है । उससे मिला हुआ एक पक्का तालाब है , जिसमें खूब कमल खिले रहते हैं । उसकी मछलियां कोई नहीं पकड़ता ; तालाब के किनारे एक विशाल समाधि है । 

यही आत्माराम का स्मृति चिह्न है , उसके सम्बन्ध में विभिन्न किंवदंतियां प्रचलित हैं । कोई कहता है , वह रत्नजटित पिंजड़ा स्वर्ग को चला गया , कोई कहता , वह ' सत्त गुरुदत्त ' कहता हुआ अंतर्ध्यान हो गया , पर यथार्थ यह है कि उस पक्षी रूपी चंद्र को किसी बिल्ली - रूपी राहु ने ग्रस लिया । लोग कहते हैं , आधी रात को भी तालाब के किनारे आवाज आती है 

' सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता , 

राम के चरण में चित्त लागा । ' 

महादेव के विषय में भी कितनी ही जन - श्रुतियां हैं । उनमें सबसे मान्य यह है कि आत्माराम के समाधिस्थ होने के बाद वह कई संन्यासियों के साथ हिमाचल चला गया , और वहां से लौट कर न आया । उसका नाम आत्माराम प्रसिद्ध हो गया ।

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