परीक्षा: मुंशी प्रेमचंद की कहानी | pariksha story of Premchand

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परीक्षा: मुंशी प्रेमचंद की कहानी | pariksha  story of Premchand,premchand best hindi stories

परीक्षा- मुंशी प्रेमचंद की कहानी | प्रेमचंद्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ

 परीक्षा

कहानी -मुंशी प्रेमचंद

जब रियासत देवगढ़ के दीवान सरदार सुजानसिंह बूढ़े हुए तो परमात्मा की याद आयो । ज जाकर महाराज से विनय की कि दीनबंधु दास ने श्रीमान् की सेवा चालीस साल तक की , अब तक मेरी अवस्था भी ढल गयी , राज - काज संभालने की शक्ति नहीं रही । कहीं भूल - चूक हो जाय तो बुढ़ापे में दाग लगे । सारी जिन्दगी को नेकनामी मिट्टी में मिल जाय । 

राजा साहब अपने अनुभवशील नीतिकुशल दीवान का बड़ा आदर करते थे । बहुत समझाया , लेकिन जब दीवान साहब ने न माना , तो हार कर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली पर शर्त यह लगा दी कि रियासत के लिए नया दीवान आप ही को खोजना पड़ेगा । " 

दूसरे दिन देश के प्रसिद्ध पत्रों में यह विज्ञापन निकला कि देवगढ़ के लिए एक सुयोग्य दीवान की जरूरत है । जो सज्जन अपने को इस पद के योग्य समझें , वे वर्तमान सरदार सुजानसिंह की सेवा में उपस्थित हों । यह जरूरत नहीं है कि वे ग्रेजुएट हों , मगर हृष्ट - पुष्ट होना आवश्यक है , मंदाग्नि के मरीज को यहां तक कष्ट उठाने की कोई जरूरत नहीं । एक महीने तक उम्मीदवारों के रहन - सहन , आचार - विचार की देखभाल की जायगी । विद्या का कम , परन्तु कर्त्तव्य का अधिक विचार किया जायगा । जो महाशय इस परीक्षा में पूरे उतरेंगे , वे इस उच्च पद पर सुशोभित होंगे । 

इस विज्ञापन ने सारे मुल्क में तहलका मचा दिया । ऐसा ऊंचा पद और किसी प्रकार की कैद नहीं ? केवल नसीब का खेल है । सैकड़ों आदमी अपना - अपना भाग्य परखने के लिए चल खड़े हुए । देवगढ़ में नये - नये और रंग - बिरंगे मनुष्य दिखायी देने लगे । प्रत्येक रेलगाड़ी से उम्मीदवारों का एक मेला - सा उतरता । कोई पंजाब से चला आता था , कोई मद्रास से , कोई नए फैशन का प्रेमी , कोई पुरानी सादगी पर मिटा हुआ । पंडितों और मौलवियों को भी अपने - अपने भाग्य की परीक्षा करने का अवसर मिला । बेचारे सनद के नाम रोया करते थे । यहां उसकी कोई जरूरत नहीं थी । रंगी एमामे चोगे और नाना प्रकार के अंगरखे और कंटोप देवगढ़ में अपनी सज - धज दिखाने लगे । लेकिन सबसे विशेष संख्या ग्रेजुएटों की थी , क्योंकि सनद की कैद में न होने पर भी सनद से परदा तो ढंका रहता है । 

सरदार सुजानसिंह ने इन महानुभावों के आदर - सत्कार का बड़ा अच्छा प्रबन्ध कर दिया था । लोग अपने - अपने कमरों में बैठे हुए रोजेदार मुसलमानों की तरह महीने के दिन गिना करते थे । हर एक मनुष्य अपने जीवन को अपनी बुद्धि के अनुसार अच्छे रूप में दिखाने की कोशिश करता था । 

मिस्टर अ नौ बजे दिन तक सोया करते थे , आजकल वे बगीचे में टहलते हुए ऊषा का दर्शन करते थे । मि ० ब को हुक्का पीने की लत थी , आजकल बहुत रात गये किवाड़ बन्द करके अंधेरे में सिगार पीते थे । मि ० द स और ज से उनके घरों पर नौकरों के नाक में दम था , लेकिन ये सज्जन आजकल ' आप ' और ' जनाब ' के बगैर नौकरों में बातचीत नहीं करते थे । महाशय नास्तिक थे , हक्सले के उपासक , मगर आजकल उनको धर्मनिष्ठा देखकर मन्दिर के पुजारी को पदच्युत हो जाने की शंका लगी रहती थी । मि ० ल को किताब से घृणा थी , परन्तु आजकल वे बड़े - बड़े ग्रन्थ देखने - पढ़ने में डूबे रहते थे । जिससे बात कीजिए , वह नम्रता और सदाचार का देवता बना मालूम देता था । शर्मा जी घड़ी रात से ही वेद - मंत्र पढ़ने में लगते थे और मौलवी साहब को नमाज और तलावत के सिवा था । लोग समझते थे कि एक महीने का झंझट है , किसी तरह काट लें , और कोई काम कहीं कार्य सिद्ध हो गया तो कौन पूछता है । 

लेकिन मनुष्यों का वह बूढ़ा जौहरी आड़ में बैठा हुआ देख रहा था कि इन बगुलों में हंस कहां छिपा हुआ है । 

एक दिन नये फैशनवालों को सूझी कि आपस में हाकी का खेल हो जाय । यह प्रस्ताव हाकी के मंजे हुए खिलाड़ियों ने पेश किया । यह भी तो आखिर एक विद्या है । इसे क्यों छिपा रखें । संभव है , कुछ हाथों की सफाई ही काम कर जाय । चलिए तय हो गया , फील्ड बन गयी , खेल शुरू हो गया और गेंद किसी दफ्तर के अप्रेंटिस की तरह ठोकरें खाने लगी । 

रियासत देवगढ़ में यह खेल बिलकुल निराली बात थी । पढ़े - लिखे भलेमानुस लोग शतरंज और ताश जैसे गंभीर खेल खेलते थे । दौड़ - कूद के खेल बच्चों के खेल समझे जाते थे । 

खेल बड़े उत्साह से जारी था । धावे के लोग जब गेंद को ले कर तेजी से उड़ते तो जान पड़ता था कि कोई लहर बढ़ती चली आती है । लेकिन दूसरी ओर से खिलाड़ी इस बढ़ती हुई लहर को इस तरह रोक लेते थे कि मानो लोहे की दीवार है । 

संध्या तक यही धूमधाम रही । लोग पसीने से तर हो गये । खून की गर्मी आंख और चेहरे से झलक रही थी । हांफते - हांफते बेदम हो गये , लेकिन हार - जीत का निर्णय न हो सका । 

अंधेरा हो गया था । इस मैदान से जरा दूर हट कर एक नाला था । उस पर कोई पुल न था । पथिकों को नाले में से चल कर आना पड़ता था । खेल अभी बन्द ही हुआ था और खिलाड़ी लोग बैठे दम ले रहे थे कि एक किसान अनाज से भरी हुई गाड़ी लिये हुए उस नाले में आया । लेकिन कुछ तो नाले में कीचड़ था और कुछ उसकी चढ़ाई इतनी ऊंची थी कि गाड़ी ऊपर न चढ़ सकती थी । 

वह कभी बैलों को ललकारता , कभी पहियों को हाथ से ढकेलता लेकिन बोझ अधिक था और बैल कमजोर । गाड़ी ऊपर को न चढ़ती और चढ़ती भी तो कुछ दूर चढ़कर फिर खिसक कर नीचे पहुंच जाती । किसान बार - बार जोर लगाता और बार - बार झुंझला कर बैलों को मारता , लेकिन गाड़ी उभरने का नाम न लेती ।

 बेचारा इधर - उधर निराश होकर ताकता , मगर वहां कोई सहायक नजर न आता । गाड़ी को अकेले छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकता । बड़ी आपत्ति में फंसा हुआ था । इसी बीच में खिलाड़ी हाथों में डंडे लिये घूमते भामते उधर से निकले । किसान ने उनकी तरफ सहमी हुई आंखों से देखा : परन्तु किसी से मदद मांगने का साहस न हुआ । 

खिलाड़ियों ने भी उसकी ओर देखा मगर बन्द आंखों से जिनमें सहानुभूति न थी । उनमें स्वार्थ था मद था , मगर उदारता और वात्सल्य का नाम भी न था । 

लेकिन उसी समूह में एक ऐसा मनुष्य था जिसके हृदय में दया थी और साहस था । आज हाकी खेलते हुए उसके पैरों में चोट लग गयी थी । लंगड़ाता हुआ धीरे - धीरे चला आता था । अकस्मात् उसकी निगाह गाड़ी पर पड़ी । ठिठक गया । उसे किसान की सूरत देखते ही सब बातें ज्ञात हो गयीं । डंडा एक किनारे रख दिया । कोट उतार डाला और किसान के पास जाकर बोला- मैं तुम्हारी गाड़ी निकाल दूं ? . 

किसान ने देखा एक गढ़े हुए बदन का लम्बा आदमी सामने खड़ा है । झुक कर बोला हुजूर मैं आपसे कैसे कहूँ ? युवक ने कहा - मालूम होता है , तुम यहां बड़ी देर से फंसे हो । अच्छा तुम गाड़ी पर जाकर बैलों को साधी , मैं पहियों को ढकेलता हूं , अभी गाड़ी ऊपर चढ़ जाती है । 

किसान गाड़ी पर जा बैठा । युवक ने पहिये को जोर लगा कर उकसाया । कीचड़ बहुत ज्यादा था । वह घुटने तक जमीन में गड़ गया , लेकिन हिम्मत न हारी । उसने फिर जोर किया , उधर किसान ने बैलों को ललकारा । बैल को सहारा मिला , हिम्मत बंध गयी , उन्होंने कंधे झुका कर एक बार जोर किया तो गाड़ी नाले के ऊपर थी । 

किसान युवक के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया । बोला - महाराज , आपने आज मुझे उबार लिया , नहीं तो सारी रात मुझे यहां बैठना पड़ता । 

युवक ने हंस कर कहा- अब मुझे कुछ इनाम देते हो ? किसान ने गम्भीर भाव से कहा - नारायण चाहेंगे तो दीवानी आपको ही मिलेगी । 

युवक ने किसान की तरफ गौर से देखा । उसके मन में एक संदेह हुआ , क्या यह सुजानसिंह तो नहीं हैं ? आवाज मिलती है , चेहरा - मोहरा भी वही । किसान ने भी उसकी ओर तीव्र दृष्टि से देखा । शायद उसके दिल के संदेह को भांप गया । मुस्करा कर बोला- गहरे पानी में पैठने से ही मोती मिलता है । 

 निदान महीना पूरा हुआ । चुनाव का दिन आ पहुंचा । उम्मीदवार लोग प्रातःकाल ही से अपनी किस्मतों का फैसला सुनने के लिए उत्सुक थे । दिन काटना पहाड़ हो गया । प्रत्येक के चेहरे पर आशा और निराशा के रंग आते थे । नहीं मालूम , आज किसके नसीब जागेंगे ! न जाने किस पर लक्ष्मी की कृपादृष्टि होगी । 

संध्या समय राजा साहब का दरबार सजाया गया । शहर के रईस और धनाढ्य लोग , राज्य के कर्मचारी और दरबारी तथा दीवानी के उम्मीदवारों का समूह , सब रंग - बिरंगी सज धज बनाये दरबार में आ बिराजे ! उम्मीदवारों के कलेजे धड़क रहे थे । 

जब सरदार सुजानसिंह ने खड़े हो कर कहा- मेरे दीवानी के उम्मीदवार महाशयो ! मैंने आप लोगों को जो कष्ट दिया है , उसके लिए मुझे क्षमा कीजिए । इस पद के लिए ऐसे पुरुष की आवश्यकता थी जिसके हृदय में दया हो और साथ - साथ आत्मबल हृदय वह जो उदार हो , आत्मबल वह जो आपत्ति का वीरता के साथ सामना करे और इस रियासत के सौभाग्य से हमें ऐसा पुरुष मिल गया । ऐसे गुणवाले संसार में कम हैं और जो हैं , वे कीर्ति और मान के शिखर पर बैठे हुए हैं , उन तक हमारी पहुंच नहीं । मैं रियासत के पंडित जानकीनाथ सा दीवान पाने पर बधाई देता हूं । 

रियासत के कर्मचारियों और रईसों ने जानकीनाथ की तरफ देखा । उम्मीदवार दल की आंखें उधर उठीं , मगर उन आंखों में सत्कार था . इन आंखों में ईर्ष्या. 

सरदार साहब ने फिर फरमाया , आप लोगों को यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति न होगी कि जो पुरुष स्वयं जख्मी होकर भी एक गरीब किसान की भरी हुई गाड़ी को दलदल से निकाल कर नाले के ऊपर चढ़ा दे उसके हृदय में साहस , आत्मबल और उदारता का वास है । ऐसा आदमी गरीबों को कभी न सतावेगा । उसका संकल्प दृढ़ है जो उसके चित्त को स्थिर रखेगा । वह चाहे धोखा खा जाये । परन्तु दया और धर्म से कभी न हटेगा ।

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