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मर्यादा की वेदी: मुन्शी प्रेमचन्द सर्वश्रेष्ठ कहानी | Maryada ki Vedi Story Premchand

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Santosh Kukreti
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 Maryada ki Vedi Story by Premchand(Best Stories of Premchand)

प्रेमचन्द की कहानी:- यह वह समय था जब चित्तौड़ में मृदुभाषिणी मीरा प्यारी आत्माओं को ईश्वर-प्रेम के प्याले पिलाती थी। रणछोड जी के मंदिर में जब भक्ति से विहल्ल होकर वह अपने मधुर स्वरों में अपने पीयूषपूरित पदों को गाती , तो श्रोतागण प्रेमानुराग से उन्मत्त हो जाते । 

प्रतिदिन यह स्वर्गीय आनंद उठाने के लिए सारे चित्तौड़ के लोग ऐसे उत्सुक होकर दौड़ते , जैसे दिन भर की प्यासी गायें दूर से किसी सरोवर को देख कर उसकी ओर दौड़ती हैं । इस प्रेम - सुधासागर से केवल चित्तौड़वासियों ही की तृप्ति न होती थी , बल्कि समस्त राजपूताना की मरुभूमि प्लावित हो जाती थी । 

एक बार ऐसा संयोग हुआ कि झालावाड़ के रावसाहब और मंदार राज्य के कुमार , दोनों ही लाव - लश्कर के साथ चित्तौड़ आये । रावसाहब के साथ राजकुमारी प्रभा भी थी , जिसके रूप और गुण की दूर - दूर तक चर्चा थी । यहीं रणछोड़ जी के मंदिर में दोनों की आंखें मिलीं । प्रेम ने बाण चलाया । 

राजकुमार सारे दिन उदासीन भाव से शहर की गलियों में घूमा करता । राजकुमारी विरह से व्यथित अपने महल के झरोखों से झांका करती । दोनों व्याकुल हो कर संध्या समय मंदिर में आते और यहां चंद्र को देखकर कुमुदिनी खिल जाती । 

प्रेम - प्रवीण मीरा ने कई बार दोनों प्रेमियों को सतृष्ण नेत्रों से परस्पर देखते हुए पा कर उनके मन के भावों को ताड़ लिया । एक दिन कीर्त्तन के पश्चात् जब झालावाड़ के रावसाहब चलने लगे तो उसने मंदार के राजकुमार को बुला कर उनके सामने खड़ा कर दिया और कहा- रावसाहब , मैं प्रभा के लिए यह वर लायी हूं , आप इसे स्वीकार कीजिए ।

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प्रभा लज्जा से गड़ - सी गयी । राजकुमार के गुण - शील पर रावसाहब पहले ही से मोहित हो रहे थे , उन्होंने तुरंत उसे छाती से लगा लिया । 

उसी अवसर पर चित्तौड़ के राणा भोजराज जी मंदिर में आये । उन्होंने प्रभा का मुखचंद्र देखा । उनकी छाती पर सांप लोटने लगा । 

झालावाड़ में बड़ी धूम थी । राजकुमारी प्रभा का आज विवाह होगा । मंदार से बारात आयेगी । मेहमानों की सेवा सम्मान की तैयारियां हो रही थीं । दुकानें सजी हुईं थीं । नौबतखाने आमोदालाप से गूंजते थे । 

सड़कों पर सुगंधि छिड़की जाती थी , अट्टालिकाएं पुष्प - लताओं से शोभायमान थीं । पर जिसके लिए ये सब तैयारियां हो रही थीं , वह अपनी वाटिका के एक वृक्ष के नीचे उदास बैठी हुई रो रही थी ।

रनिवास में डोमिनियां आनंदोत्सव के गीत गा रही थीं । कहीं सुंदरियों के हाव - भाव थे , कहीं आभूषणों की चमक - दमक , कहीं हास - परिहास की बहार । नाइन बात - बात पर तेज होती थी । मालिन गर्व से फूली न समाती थी । धोबिन आंखें दिखाती थी । कुम्हारिन मटके के सदृश फूली हुई थी । मंडप के नीचे पुरोहित जी बात - बात पर सुवर्ण मुद्राओं के लिए दुनकते थे । 

रानी सिर के बाल खोले भूखी - प्यासी चारों ओर दौड़ती थी । सबकी बौछारें सहती थी । और अपने भाग्य को सराहती थी । दिल खोल कर हीरे - जवाहरात लुटा रही थी । आज प्रभा का विवाह है । बड़े भाग्य से ऐसी बातें सुनने में आती हैं । सब के सब अपनी - अपनी धुन में मस्त हैं । किसी को प्रभा की फिक्र नहीं है , जो वृक्ष के नीचे अकेली बैठी रो रही है । 

एक रमणी ने आ कर नाइन से कहा- बहुत बढ़ - बढ़ कर बातें न कर , कुछ राजकुमारी का भी ध्यान है ? चल , उनके बाल गूंथ । 

नाइन ने दांतों तले जीभ दबायी । दोनों प्रभा को ढूंढ़ती हुई बाग में पहुंचीं । प्रभा ने उन्हें देखते ही आंसू पोंछ डाले । नाइन मोतियों से मांग भरने लगी और प्रभा सिर नीचा किये आंखों से मोती बरसाने लगी । 

रमणी ने सजल नेत्र हो कर कहा - बहिन , दिल इतना छोटा मत करो । मुंहमांगी मुराद पा कर इतनी उदास क्यों होती हो ? 

प्रभा ने सहेली को देख कर कहा- बहिन , जाने क्यों दिल बैठा जाता है । सहेली ने छेड़ कर कहा- पिया मिलन की बेकली है ! 

प्रभा उदासीन भाव से बोली- कोई मेरे मन में बैठा कह रहा है कि अब उनसे मुलाकात न होगी । 

सहेली उसके केश संवार कर बोली- जैसे उषाकाल से पहले कुछ अंधेरा हो जाता है , उसी प्रकार मिलाप के पहले प्रेमियों का मन अधीर हो जाता है । 

प्रभा बोली- नहीं बहिन , यह बात नहीं । मुझे शकुन अच्छे नहीं दिखायी देते । आज दिन भर आंख फड़कती रही । रात को मैंने बुरे स्वप्न देखे हैं । मुझे शंका होती है कि आज अवश्य कोई न कोई विघ्न पड़ने वाला है । तुम राणा भोजराज को जानती हो न ? 

संध्या हो गयी । आकाश पर तारों के दीपक जले । झालावाड़ में बूढ़े- जवान सभी लोग बारात की अगवानी के लिए तैयार हुए । मरदों ने पागें संवारी , शस्त्र साजे । युवतियां शृंगार कर गाती - बजाती रनिवास की ओर चलीं । हजारों स्त्रियां छत पर बैठी बारात की राह देख रही थीं । 

अचानक शोर मचा कि बारात आ गयी । लोग संभल बैठे , नगाड़ों पर चोटें पड़ने लगीं , सलामियां दगने लगीं । जवानों ने घोड़ों को एड़ लगायी । एक क्षण में सवारों की एक सेना हुआ , क्योंकि राज - भवन के सामने आ कर खड़ी हो गयी । लोगों को देखकर बड़ा आश्चर्य यह मंदार की बारात नहीं थी राणा भोजराज की सेना थी ।

झालावाड़वाले सभी विस्मित खड़े ही थे , कुछ निश्चय न कर सके थे कि क्या करना चाहिए । इतने में चित्तौड़वालों ने राज - भवन को घेर लिया । तब झालावाड़ी भी सचेत हुए । संभल कर तलवारें खींच लीं और आक्रमणकारियों पर टूट पड़े । राजा महल में घुस गया । रनिवास में भगदड़ मच गयी ।

प्रभा सोलहो शृंगार किये , सहेलियों के साथ बैठी थी । यह हलचल देखकर घबड़ायौ । इतने में राव साहब हांफते हुए आये और बोले- बेटी प्रभा , राणा भोजराज ने हमारे महल को घेर लिया है । तुम चटपट ऊपर चली जाओ और द्वार को बंद कर लो । अगर हम क्षत्रिय हैं , तो एक चित्तौड़ी भी यहां से जीता न जायेगा । 

रावसाहब बात भी पूरी न करने पाये थे कि राणा कई वीरों के साथ आ पहुंचे और बोले - चित्तौड़वाले तो सिर काटने के लिए आये ही हैं । पर यदि वे राजपूत हैं तो राजकुमारी लेकर ही जायेंगे । 

वृद्ध रावसाहब की आंखों से ज्वाला निकलने लगी वे तलवार खींच कर राणा पर झपटे । उन्होंने वार बचा लिया और प्रभा से कहा- राजकुमारी , हमारे साथ चलोगी ? 

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प्रभा सिर झुकाये राणा के सामने आ कर बोली- हां , चलूंगी । 

रावसाहब को कई आदमियों ने पकड़ लिया था । वे तड़प कर बोले- प्रभा तू राजपूत की कन्या है ? 

प्रभा की आंखें सजल हो गयीं । बोली- राणा भी तो राजपूतों के कुलतिलक हैं । रावसाहब ने क्रोध में आ कर कहा निर्लज्जा ! 

कटार के नीचे पड़ा हुआ बलिदान का पशु जैसी दीन दृष्टि से देखता है , उसी भांति प्रभा ने रावसाहब की ओर देख कर कहा- जिस झालावाड़ की गोद में पली हूं , क्या उसे रक्त से रंगवा दूं ? 

रावसाहब ने क्रोध से कांप कर कहा- क्षत्रियों को रक्त इतना प्यारा नहीं होता । मर्यादा पर प्राण देना उनका धर्म है ! 

तब प्रभा की आंखें लाल हो गयीं । चेहरा तमतमाने लगा । 

बोली- राजपूत कन्या अपने सतीत्व की रक्षा आप कर सकती है । इसके लिए रुधिर प्रवाह की आवश्यकता नहीं ।

पल भर में राणा ने प्रभा को गोद में उठा लिया । बिजली की भांति झपट कर बाहर निकले । उन्होंने उसे घोड़े पर बिठा लिया , आप सवार हो गये और घोड़े को उड़ा दिया । अन्य चितौड़ियों ने भी घोड़ों की बागें मोड़ दीं , उसके सौ जवान भूमि पर पड़े तड़प रहे थे , पर किसी ने तलवार न उठायी थी । 

रात को दस बजे मंदारवाले भी पहुंचे । मगर यह शोक- समाचार पाते ही लौट गये । मंदार - कुमार निराशा से अचेत हो गया । जैसे रात को नदी का किनारा सुनसान हो जाता है , उसी तरह सारी रात झालावाड़ में सन्नाटा छाया रहा । 

चित्तौड़ के रंग महल में प्रभा उदास बैठी सामने के सुन्दर पौधों की पत्तियां गिन रही थी । संध्या का समय था । रंग - बिरंग के पक्षी वृक्षों पर बैठे कलरव कर रहे थे । इतने में राणा ने कमरे में प्रवेश किया । प्रभा उठ कर खड़ी हो गयी । 

राणा बोले - प्रभा , मैं तुम्हारा अपराधी हूं - मैं बलपूर्वक तुम्हें माता - पिता की गोद से छीन लाया , पर यदि मैं तुमसे कहूं कि यह सब तुम्हारे प्रेम से विवश हो कर मैंने किया , तो तुम मन में हंसोगी और कहोगी कि यह निराले , अनूठे ढंग की प्रीति है ; पर वास्तव में यही बात है । जब से मैंने रणछोड़ जी के मंदिर में तुमको देखा , तब से एक क्षण भी ऐसा नहीं बीता कि मैं तुम्हारी सुधि में विकल न रहा होऊं । 

तुम्हें अपनाने का अन्य कोई उपाय होता , तो मैं कदापि इस पाशविक ढंग से काम न लेता । मैंने रावसाहब की सेवा में बारंबार संदेशे भेजे पर उन्होंने हमेशा मेरी उपेक्षा की । 

अंत में जब तुम्हारे विवाह की अवधि आ गयी और मैंने देखा कि एक ही दिन में तुम दूसरे की प्रेम - पात्री हो जाओगी और तुम्हारा ध्यान करना भी मेरी आत्मा को दूषित करेगा , तो लाचार होकर मुझे यह अनीति करनी पड़ी । 

मैं जानता हूं कि यह सर्वथा मेरी स्वार्थान्धता है । मैंने अपने प्रेम के सामने तुम्हारे मनोगत भावों को कुछ न समझा ; पर प्रेम स्वयं एक बढ़ी हुई स्वार्थपरता है , जब मनुष्य को अपने प्रियतम के सिवाय और कुछ नहीं सूझता । मुझे पूरा विश्वास था कि मैं अपने विनीत भाव और प्रेम से तुमको अपना लूंगा । 

प्रभा , प्यास से मरता हुआ मनुष्य यदि किसी गढ़े में मुंह डाल दे , तो वह दंड का भागी नहीं है । मैं प्रेम का प्यासा हूं मीरा मेरी सहधर्मिणी है । उसका हृदय प्रेम का अगाध सागर है । उसका एक चुल्लू भी मुझे उन्मत्त करने के लिए काफी था ; पर जिस हृदय में ईश्वर का वास हो वहां मेरे लिए स्थान कहां ? 

तुम शायद कहोगी कि यदि तुम्हारे सिर पर प्रेम का भूत सवार था तो क्या सारे राजपूताने में स्त्रियां न थीं । निस्संदेह राजपूताने में सुन्दरता का अभाव नहीं है और न चित्तौड़ाधिपति की ओर से विवाह की बातचीत किसी के अनादर का कारण हो सकती है , पर इसका जवाब तुम आप ही हो । 

इसका दोष तुम्हारे ही ऊपर है । राजस्थान में एक ही चित्तौड़ है , एक ही राणा और एक ही प्रभा । सम्भव है , मेरे भाग्य में प्रेमानंद भोगना न लिखा हो । यह मैं अपने कर्म - लेख को मिटाने का थोड़ा - सा प्रयत्न कर रहा हूं ; परंतु भाग्य के अधीन बैठे रहना पुरुषों का काम नहीं है । मुझे सफलता होगी या नहीं , इसका फैसला तुम्हारे हाथ है । 

प्रभा की आंखें जमीन की तरफ थीं और मन फुदकने वाली चिड़िया की भांति इधर उधर उड़ता फिरता था । वह झालावाड़ को मारकाट से बचाने के लिए राणा के साथ आयी थी , मगर राणा के प्रति उसके हृदय में क्रोध की तरंगें उठ रही थीं । उसने सोचा था कि वे यहां आयेंगे तो उन्हें राजपूत कुल - कलंक , अन्यायी , दुराचारी , दुरात्मा , कायर कह कर उनका गर्व चूर - चूर कर दूंगी । 

उसको विश्वास था कि यह अपमान उनसे न सहा जायगा और वे मुझे बलात् अपने काबू में लाना चाहेंगे । इस अंतिम समय के लिए उसने अपने हृदय को खूब मजबूत और अपनी कटार को खूब तेज कर रखा था । उसने निश्चय कर लिया था कि इसका एक वार उन पर होगा , दूसरा अपने कलेजे पर और इस प्रकार यह पाप - कांड समाप्त हो जायगा । 

लेकिन राणा की नम्रता , उनकी करुणात्मक विवेचना और उनके विनीत भाव ने प्रभा को शांत कर दिया । आग पानी से बुझ जाती है । राणा कुछ देर वहां बैठे रहे , फिर उठ कर चले गये । 

प्रभा को चित्तौड़ में रहते दो महीने गुजर चुके हैं । राणा उसके पास फिर न आये । इस बीच में उनके विचारों में कुछ अंतर हो गया है । झालावाड़ पर आक्रमण होने के पहले मीराबाई को इसकी बिल्कुल खबर न थी । राणा ने इस प्रस्ताव को गुप्त रखा था । 

किन्तु अब मीराबाई प्राय : उन्हें इस दुराग्रह पर लज्जित किया करती है और धीरे - धीरे राणा को भी विश्वास होने लगा है कि प्रभा इस तरह काबू नहीं आ सकती । उन्होंने उसके सुख - विलास की सामग्री एकत्र करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी थी । 

लेकिन प्रभा उनकी तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखती । राणा प्रभा की लौड़ियों से नित्य का समाचार पूछा करते हैं और उन्हें रोज वही निराशापूर्ण वृत्तांत सुनायी देता है । मुरझायी हुई कली किसी भांति नहीं खिलती । अतएव उनको कभी - कभी अपने इस दुस्साहस पर पश्चाताप होता है । 

वे पछताते हैं कि मैंने व्यर्थ ही यह अन्याय किया लेकिन फिर प्रभा का अनुपम सौन्दर्य नेत्रों के सामने आ जाता है और वह अपने मन को इस विचार से समझा लेते हैं कि एक सगर्वा सुंदरी का प्रेम इतनी जल्दी परिवर्तित नहीं हो सकता । निस्संदेह मेरा मृदु व्यवहार भी कभी न कभी अपना प्रभाव दिखलायेगा । 

प्रभा सारे दिन अकेली बैठी बैठी उकताती और झुंझलाती थी । उसके विनोद के निमित्त कई गानेवाली स्त्रियां नियुक्त थीं , राग - रंग से उसे अरुचि हो गयी थी । वह प्रतिक्षण चिंताओं में डूबी रहती थी । 

राणा के नम्र भाषण का प्रभाव अब मिट चुका था और उसकी अमानुषिक वृत्ति अब फिर अपने यथार्थ रूप में दिखाई देने लगी थी । वाक्यचतुरता शांतिकारक नहीं होती । वह केवल निरुत्तर कर देती है ! प्रभा को अब अपने अवाक् हो जाने पर आश्चर्य होता है । 

उसे राणा की बातों के उत्तर भी सूझने लगे हैं । वह कभी - कभी उनसे लड़ कर अपनी किस्मत का फैसला करने के लिए विकल हो जाती हैं । 

मगर अब वाद - विवाद किस काम का ? वह सोचती है कि मैं रायसाहब की कन्या हूं ; पर संसार की दृष्टि में राणा की रानी हो चुकी । अब यदि मैं इस कैद से छूट भी जाऊं तो मेरे लिए कहां ठिकाना है ? कैसे मुंह दिखाऊंगी ? इससे केवल मेरे वंश का ही नहीं , वरन् समस्त राजपूत जाति का नाम डूब जायेगा । मंदार - कुमार मेरे सच्चे प्रेमी हैं । 

मगर क्या वे मुझे अंगीकार करेंगे ? और यदि वे निंदा की परवाह न करके मुझे ग्रहण भी कर लें तो उनका मस्तक सदा के लिए नीचा हो जायेगा और कभी न कभी उनका मन मेरी तरफ से फिर जायेगा । वे मुझे अपने कुल का कलंक समझने लगेंगे । या यहां से किसी तरह भाग जाऊं ? लेकिन भाग कर जाऊं कहां ? बाप के घर ? वहां अब मेरी पैठ नहीं । 

मंदार कुमार के पास ? इसमें उनका अपमान है और मेरा भी । तो क्या भिखारिणी बन जाऊं । इसमें भी जग - हंसाई होगी और न जाने प्रबल भावी किस मार्ग पर ले जाए । 

एक अबला स्त्री के लिए सुंदरता प्राणघातक यंत्र से कम नहीं । ईश्वर , वह दिन न आये कि मैं क्षत्रिय जाति का कलंक बनूं । क्षत्रिय जाति ने मर्यादा के लिए पानी की तरह रक्त बहाया है । उनकी हजारों देवियां पर - पुरुष का मुंह देखने के भय से सूखी लकड़ी के समान जल मरी हैं । 

ईश्वर वह घड़ी न आये कि मेरे कारण किसी राजपूत का सिर लज्जा से नीचा हो । नहीं , मैं इसी कैद में मर जाऊंगी । राणा के अन्याय सहूंगी , जलूंगी , मरूंगी , पर इस घर में विवाह जिससे होना था , हो चुका । हृदय में उसकी उपासना करूंगी , पर कंठ के बाहर उसका नाम न निकालूंगी । 

एक दिन झुंझला कर उसने राणा को बुला भेजा । वे आये । उनका चेहरा उतरा था । कुछ चिंतित - से थे । प्रभा कुछ कहना चाहती थी पर उनकी सूरत देख कर उसे उन पर दया आ गयी । उन्होंने उसे बात करने का अवसर न देकर स्वयं कहना शुरू किया ।  

“ प्रभा , तुमने आज मुझे बुलाया है । यह मेरा सौभाग्य है । तुमने मेरी सुधि तो ली मगर यह मत समझो कि मैं मृदु - वाणी सुनने की आशा ले कर आया हूं । नहीं मैं जानता हूं , जिसके लिए तुमने मुझे बुलाया है । यह लो , तुम्हारा अपराधी तुम्हारे सामने खड़ा है । उसे जो दंड चाहो , दो । मुझे अब तक आने का साहस न हुआ इसका कारण यही दंड - भय था । 

तुम क्षत्राणी हो और क्षत्राणियां क्षमा करना नहीं जानतीं । झालावाड़ में जब तुम मेरे साथ आने पर स्वयं उद्यत हो गयीं , तो मैंने उसी क्षण तुम्हारे जौहर परख लिये । मुझे मालूम हो गया कि तुम्हारा हृदय बल और विश्वास से भरा हुआ है । 

उसे काबू में लाना सहज नहीं । तुम नहीं जानतीं कि यह एक मास मैंने किस तरह काटा है । तड़प - तड़प कर मर रहा हूं , पर जिस तरह शिकारी बिफरी हुई सिंहनी के सम्मुख जाने से डरता है , वही दशा मेरी थी । मैं कई बार आया । यहां तुमको उदास तिउरियां चढ़ाये बैठे देखा । मुझे अंदर पैर रखने का साहस न हुआ ; मगर आज मैं बिना बुलाया मेहमान नहीं हूं । 

तुमने मुझे बुलाया है और तुम्हें अपने मेहमान का स्वागत करना चाहिए । हृदय से न सही - जहां अग्नि प्रज्वलित हो , वहां ठंडक कहां - बातों ही से सही , अपने भावों को दबा कर ही सही , मेहमान का स्वागत करो । संसार में शत्रु का आदर मित्रों से भी अधिक किया जाता है ।  

" प्रभा , एक क्षण के लिए क्रोध को शांत करो और मेरे अपराधों पर विचार करो तुम मेरे ऊपर यही दोषारोपण कर सकती हो कि मैं तुम्हें माता - पिता की गोद से छीन लाया । तुम जानती हो , कृष्ण भगवान् रुक्मिणी को हर लाये थे । राजपूतों में यह कोई नयी बात नहीं है । तुम कहोगी , इससे झालावाड़वालों का अपमान हुआ ; पर ऐसा कहना कदापि ठीक नहीं ।. 

झालावाड़वालों ने वही किया , जो मर्दों का धर्म था । उनका पुरुषार्थ देख कर हम चकित हो गये । यदि वे कृतकार्य नहीं हुए तो यह उनका दोष नहीं है । वीरों की सदैव जीत नहीं होती । हम इसलिए सफल हुए कि हमारी संख्या अधिक थी और इस काम के लिए तैयार हो कर गये थे । वे निश्शंक थे , इस कारण उनकी हार हुई । 

यदि हम वहां से शीघ्र ही प्राण बचा कर भाग न आते तो हमारी गति वही होती तो रावसाहब ने कही थी । एक भी चित्तौड़ी न बचता । लेकिन ईश्वर के लिए यह मत सोचो कि मैं अपने अपराध के दूषण को मिटाना चाहता हूं । नहीं , मुझसे अपराध हुआ है और मैं हृदय से उस पर लज्जित हूं । 

पर अब तो जो कुछ होना था , हो चुका । अब इस बिगड़े हुए खेल को मैं तुम्हारे ऊपर छोड़ता हूं । यदि मुझे तुम्हारे हृदय में कोई स्थान मिले तो मैं उसे स्वर्ग समझुंगा । डूबते हुए को तिनके का सहारा भी बहुत है । क्या यह संभव है ? " 

प्रभा बोली- नहीं । 

राणा - झालावाड़ जाना चाहती हो ? 

प्रभा- नहीं । 

राणा- मंदार के राजकुमार के पास भेज दूं ? 

प्रभा- कदापि नहीं । 

राणा -लेकिन मुझसे यह तुम्हारा कुढ़ना देखा नहीं जाता । 

 प्रभा- आप इस कष्ट से शीघ्र ही मुक्त हो जायेंगे ।

राणा ने भयभीत दृष्टि से देख कर कहा , " जैसी तुम्हारी इच्छा । " और वे वहां से उठ कर चले गये । 

दस बजे रात का समय था । रणछोड़ जी के मन्दिर में कीर्तन समाप्त हो चुका था वैष्णव साधु बैठे हुए प्रसाद पा रहे थे । मीरा स्वयं अपने हाथों से थाल ला ला कर उनके आगे रखती थी । साधुओं और अभ्यागतों के आदर - सत्कार में उस देवी को आत्मिक आनन्द प्राप्त होता था । 

साधुगण जिस प्रेम से भोजन करते थे , उससे यह शंका होती थी कि स्वादपूर्ण वस्तुओं में कहीं भक्ति - भजन से भी अधिक सुख तो नहीं है । यह सिद्ध हो चुका है कि ईश्वर की दी हुई वस्तुओं का सदुपयोग ही ईश्वरोपासना की मुख्य रीति है । इसलिए ये महात्मा लोग उपासना के ऐसे अच्छे अवसरों को क्यों खोते ? वे कभी पेट पर हाथ फेरते और कभी आसन बदलते थे । 

मुंह से ' नहीं ' कहना तो वे घोर पाप के समान समझते थे । यह भी मानी हुई बात है कि जैसी वस्तुओं का हम सेवन करते हैं , वैसी ही आत्मा भी बनती है । इसलिए वे महात्मागण घी और खोये से उदर को खूब भर रहे थे । 

पर उन्हीं में एक महात्मा ऐसे भी थे जो आंखें बंद किये ध्यान में मग्न थे । थाल को ओर ताकते भी न थे । इनका नाम प्रेमानन्द था । ये आज ही आये थे । उनके चेहरे पर कांति झलकती थी । अन्य साधु खा कर उठ गये , परन्तु उन्होंने थाल छुआ भी नहीं ।

मीरा ने हाथ जोड़ कर कहा - महाराज , आपने प्रसाद को छुआ भी नहीं । दासी से कोई अपराध तो नहीं हुआ ? 

साधु - नहीं , इच्छा नहीं थी । 

मीरा- पर मेरी विनय आपको माननी पड़ेगी । 

साधु- मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करूंगा , तो तुमको भी मेरी एक बात माननी होगी । 

मीरा - कहिए क्या आज्ञा है । 

साधु- माननी पड़ेगी । 

मीरा - मानूंगी । 

साधु - वचन देती हो ? 

मीरा - वचन देती हूं , आप प्रसाद पायें । 

मीराबाई ने समझा था कि साधु कोई मन्दिर बनवाने या कोई यज्ञ पूर्ण करा देने की याचना करेगा । ऐसी बातें नित्य प्रति हुआ ही करती थीं और मीरा का सर्वस्व साधु - सेवा के लिए अर्पित था ; परन्तु उसके लिए साधु ने कोई याचना न की । वह मीरा के कानों के पास मुंह ले जा कर बोला- आज दो घंटे के बाद राज - भवन का चोर दरवाजा खोल देना ।

मीरा विस्मित हो कर बोली- आप कौन हैं ?।

साधु - मन्दार का राजकुमार । 

मीरा ने राजकुमार को सिर से पांव तक देखा । नेत्रों में आदर की जगह घृणा थी , कहा- राजपूत यों छल नहीं करते ।

राजकुमार- यह नियम उस अवस्था के लिए है जब दोनों पक्ष समान शक्ति रखते हों । 

मीरा- ऐसा नहीं हो सकता । 

राजकुमार- आपने वचन दिया है , उसका पालन करना होगा । 

मीरा - महाराज की आज्ञा के सामने मेरे वचन का कोई महत्त्व नहीं । 

राजकुमार - मैं यह कुछ नहीं जानता । यदि आपको अपने वचन की कुछ भी मर्यादा रखनी है तो उसे पूरा कीजिए ।

मीरा- ( सोच कर ) महल में जा कर क्या करोगे ? 

राजकुमार- नयी रानी से दो - दो बातें । 

मीरा चिंता में विलीन हो गयी । एक तरफ राणा की कड़ी आज्ञा थी और दूसरी तरफ अपना वचन और उसका पालन करने का परिणाम कितनी ही पौराणिक घटनाएं उसके सामने आ रही थीं । दशरथ ने वचन पालन के लिए अपने प्रिय पुत्र को वनवास दे दिया । मैं वचन दे चुकी हूं । यदि उनकी आज्ञा के विरुद्ध करती हूं तो लोक और परलोक दोनों बिगड़ते हैं । 

क्यों न उनसे स्पष्ट कह दूं । क्या वे मेरी यह प्रार्थना स्वीकार न करेंगे ? मैंने आज तक उनसे कुछ नहीं मांगा । आज उनसे यह दान मागूंगी । क्या वे मेरे वचन की मर्यादा की रक्षा न करेंगे ? उनका हृदय कितना विशाल है ! निस्संदेह वे मुझ पर वचन तोड़ने का दोष न लगने देंगे । 

इस तरह मन में निश्चय करके वह बोली- कब खोल दूं ? 

राजकुमार ने उछल कर कहा- आधी रात को । 

मीरा- मैं स्वयं तुम्हारे साथ चलूंगी । 

राजकुमार- क्यों ? 

मीरा- तुमने मेरे साथ छल किया है । मुझे तुम्हारा विश्वास नहीं है । 

राजकुमार ने लज्जित हो कर कहा- अच्छा , तो आप द्वार पर खड़ी रहियेगा । 

मीरा- यदि फिर कोई दगा किया तो जान से हाथ धोना पड़ेगा । 

राजकुमार - मैं सब कुछ सहने के लिए तैयार हूं । 

मीरा यहां से राणा की सेवा में पहुंची । वे उसका बहुत आदर करते थे । वे खड़े हो गये । इस समय मीरा का आना एक असाधारण बात थी । उन्होंने पूछा- बाई जी , क्या आज्ञा है ? 

मीरा - आपसे भिक्षा मांगने आयी हूं । निराश न कीजिएगा । मैंने आज तक आपसे कोई विनती नहीं की ; पर आज एक ब्रह्म - फांस में फंस गयी हूं । इसमें से मुझे आप ही निकाल सकते हैं ? मंदार के राजकुमार को तो आप जानते हैं ? 

राणा- हां , अच्छी तरह । 

मीरा- आज उसने मुझे बड़ा धोखा दिया । वैष्णव महात्मा का रूप धारण कर रणछोड़ जी के मंदिर में आया और उसने छल करके मुझे वचन देने पर बाध्य किया । मेरा साहस नहीं होता कि उसकी कपट विनय आपसे कहूं । 

राणा - प्रभा से मिला देने को तो कहा ? 

मीरा - जी हां , उसका अभिप्राय वही है । लेकिन सवाल यह है कि मैं आधी रात को राजमहल का गुप्त द्वार खोल दूं । मैंने उसे बहुत समझाया ; बहुत धमकाया ; पर वह किसी भांति न माना । निदान विवश हो कर जब मैंने कह दिया तब उसने प्रसाद पाया , अब मेरे वचन की लाज आपके हाथ है । 

आप चाहे उसे पूरा करके मेरा मान रखें , चाहे उसे तोड़ कर मेरा मान तोड़ दें । आप मेरे ऊपर जो कृपादृष्टि रखते हैं , उसी के भरोसे मैंने वचन दिया । अब मुझे इस फंदे से उबारना आपका काम है । 

राणा कुछ देर सोच कर बोले- तुमने वचन दिया है , उसका पालन करना मेरा कर्तव्य है । तुम देवी हो , तुम्हारे वचन नहीं टल सकते । द्वार खोल दो । लेकिन यह उचित नहीं है कि वह अकेले प्रभा से मुलाकात करे. तुम स्वयं उसके साथ जाना मेरी खातिर से इतना कष्ट उठाना । मुझे भय है कि वह उसकी जान लेने का इरादा करके न आया हो । ईप्यों में मनुष्य अंधा हो जाता है । 

बाई जी , मैं अपने हृदय की बात तुमसे कहता हूं । मुझे प्रभा को हर लाने का अत्यंत शोक है । मैंने समझा था कि यहां रहते रहते वह हिलमिल जायगी ; किन्तु वह अनुमान गलत निकला । मुझे भय है कि यदि उसे कुछ दिन यहां और रहना पड़ा तो वह जीती न बचेगी । मुझ पर एक अबला की हत्या अपराध लग जायगा । 

मैंने उससे झालावाड़ जाने के लिए कहा , पर वह राजी न हुई । आज तुम उन दोनों की बातें सुनो । अगर वह मंदारकुमार के साथ जाने पर राजी हो तो मैं प्रसन्नतापूर्वक अनुमति दे दूंगा । मुझसे कुढ़ना नहीं देखा जाता । ईश्वर इस सुंदरी का हृदय मेरी ओर फेर देता तो मेरा जीवन सफल हो जाता । 

किन्तु जब यह सुख भाग्य में लिखा ही नहीं है तो क्या वश है । मैंने तुमसे ये बातें कही , इसके लिये मुझे क्षमा करना । तुम्हारे पवित्र हृदय में ऐसे विषयों के लिए स्थान कहाँ ? 

मीरा ने आकाश की ओर संकोच से देख कर कहा- तो मुझे आज्ञा है ? मैं चोर - द्वार खोल दूं ? 

राणा- तुम इस घर की स्वामिनी हो , मुझसे पूछने की जरूरत नहीं । मीरा राणा को प्रणाम कर चली गयी । 

आधी रात बीत चुकी थी । प्रभा चुपचाप बैठी दीपक की ओर देख रही थी और सोचती थी , इसके घुलने से प्रकाश होता है ; यह बत्ती अगर जलती है तो दूसरों को लाभ पहुंचाती है । मेरे जलने से किसी को क्या लाभ ? मैं क्यों घुलूं ? मेरे जीने की जरूरत है ? 

उसने फिर खिड़की से सिर निकाल कर आकाश की तरफ देखा । काले पट पर उज्ज्वल तारे जगमगा रहे थे । प्रभा ने सोचा , मेरे अंधकारमय भाग्य में ये दीप्तिमान तारे कहां हैं , मेरे लिए जीवन के सुख कहां हैं ? क्या रोने के लिए जीऊं ? ऐसे जीने से क्या लाभ ? और जीने में उपहास भी तो है । मेरे मन का हाल कौन जानता है ? संसार मेरी निंदा करता होगा । 

झालावाड़ की स्त्रियां मेरी मृत्यु के शुभ समाचार सुनने की प्रतीक्षा कर रही होंगी । मेरी प्रिय माता लज्जा से आंखें न उठा सकती होंगी । लेकिन जिस समय मेरे मरने की खबर मिलेगी , गर्व से उनका मस्तक ऊंचा हो जायगा । यह बेहयाई का जीना है । ऐसे जीने से मरना कहीं उत्तम है । 

प्रभा ने तकिये के नीचे से एक चमकती हुई कटार निकाली । उसके हाथ कांप रहे थे । उसने कटार की तरफ आंखें जमायीं । हृदय को उसके अभिवादन के लिए मजबूत किया । हाथ उठाया , किन्तु हाथ न उठा ; आत्मा दृढ़ न थी । आंखें झपक गयीं । सिर में चक्कर आ गया । कटार हाथ से छूट कर जमीन पर गिर पड़ी । 

प्रभा क्रुद्ध हो कर सोचने लगी- क्या मैं वास्तव में निर्लज्ज हूं ? मैं राजपूतनी हो कर मरने से डरती हूं ? मान - मर्यादा खो कर बेहया लोग जिया करते हैं । वह कौन - सी आकांक्षा है जिसने मेरी आत्मा को इतना निर्बल बना रखा है । क्या राणा की मीठी - मीठी बातें ? राणा मेरे शत्रु हैं । 

उन्होंने मुझे पशु समझ रखा है , जिसे फंसाने के पश्चात् हम पिंजरे में बंद करके हिलाते हैं । उन्होंने मेरे मन को अपनी वाक्य - मधुरता का क्रीड़ा - स्थल समझ लिया है । वे इस तरह घुमा - घुमा कर बातें करते हैं और मेरी तरफ से युक्तियां निकाल कर उनका ऐसा उत्तर देते हैं कि जबान ही बंद हो जाती है । 

हाय ! निर्दयी ने मेरा जीवन नष्ट कर दिया और मुझे यों खेलाता है ! क्या इसीलिए जीऊं कि उसके कपट भावों का खिलौना बनूं ? 

Aफिर वह कौन - सी अभिलाषा है ? क्या राजकुमार का प्रेम ? उनकी तो अब कल्पना ही मेरे लिए घोर पाप है । मैं अब उस देवता के योग्य नहीं हूं , प्रियतम बहुत दिन हुए मैंने तुम्हें हृदय से निकाल दिया । तुम भी मुझे दिल से निकाल डालो । मृत्यु के सिवाय अब कहीं मेरा ठिकाना नहीं है । शंकर ! मेरी निर्बल आत्मा को शक्ति प्रदान करो । मुझे कर्त्तव्य पालन का बल दो । 

प्रभा ने फिर कटार निकाली । इच्छा दृढ़ थी । हाथ उठा और निकट था कि कटार उसके शोकातुर हृदय में चुभ जाय कि इतने में किसी के पांव की आहट सुनायी दी । उसने चौंक कर सहमी हुई दृष्टि से देखा । मंदार - कुमार धीरे - धीरे पैर दबाता हुआ कमरे में दाखिल हुआ । 

प्रभा उसे देखते ही चौंक पड़ी । उसने कटार को छिपा लिया । राजकुमार को देखकर उसे आनन्द की जगह रोमांचकारी भय उत्पन्न हुआ । यदि किसी को जरा भी संदेह हो गया तो इनका प्राण बचना कठिन है । इनको तुरंत यहां से निकल जाना चाहिए । 

यदि इन्हें बातें करने का अवसर दूं तो विलम्ब होगा और फिर ये अवश्य ही फंस जायेंगे । राणा इन्हें कदापि न छोड़ेंगे । ये विचार वायु और बिजली की व्यग्रता के साथ उसके मस्तिष्क में दौड़े । वह तीव्र स्वर में बोली- भीतर मत आओ । 

राजकुमार ने पूछा- मुझे पहचाना नहीं ? 

प्रभा - खूब पहचान लिया ; किन्तु यह बातें करने का समय नहीं है । राणा तुम्हारी घात में हैं । अभी यहां से चले जाओ । 

राजकुमार ने एक पग और आगे बढ़ाया और निर्भीकता से कहा- प्रभा , तुम मुझसे निष्ठुरता करती हो । 

प्रभा ने धमका कर कहा- तुम यहां ठहरोगे तो मैं शोर मचा दूंगी ।

राजकुमार ने उद्दंडता से उत्तर दिया- इसका मुझे भय नहीं । मैं अपनी जान हथेली पर रख कर आया हूं । आज दोनों में से एक का अंत हो जायगा । या तो राणा रहेंगे या मैं रहूंगा । तुम मेरे साथ चलोगी ? 

प्रभा ने दृढ़ता से कहा- नहीं । 

राजकुमार व्यंग्य भाव से बोला- क्यों , क्या चित्तौड़ की जलवायु पसंद आ गयी ? 

प्रभा ने राजकुमार की ओर तिरस्कृत नेत्रों से देख कर कहा- संसार में अपनी सब आशाएं पूरी नहीं होतीं । जिस तरह यहां मैं अपना जीवन काट रही हूं , वह मैं ही जानती हूं ; किन्तु लोक - निंदा भी तो कोई चीज है ! संसार की दृष्टि में मैं चित्तौड़ की रानी हो चुकी । 

अब राणा जिस भांति रखें उसी भांति रहूंगी । मैं अंत समय तक उनसे घृणा करूंगी , जलूंगी , कुढूंगी । जब जलन न सही जायगी , तो विष खा लूंगी या छाती में कटार मार कर मर जाऊंगी ; लेकिन इसी भवन में । इस घर के बाहर कदापि पैर न रखूंगी । 

राजकुमार के मन में संदेह हुआ कि प्रभा पर राणा का वशीकरण मंत्र चल गया । यह मुझसे छल कर रही है । प्रेम की जगह ईर्ष्या पैदा हुई । वह उसी भाव से बोला और यदि मैं यहां से उठा ले जाऊं ? प्रभा के तेवर बदल गये । बोली तो मैं वही करूंगी जो ऐसी अवस्था में क्षत्राणियां किया करती हैं । अपने गले में छुरी मार लूंगी या तुम्हारे गले में । 

राजकुमार एक पग और आगे बढ़ा कर यह कटु वाक्य बोला राणा के साथ तो तुम खुशी से चली आयीं । उस समय छुरी कहां गयी थी ? 

प्रभा को यह शब्द शर - सा लगा । वह तिलमिला कर बोली- उस समय इसी छुरी के एक वार से खून की नदी बहने लगती । मैं नहीं चाहती थी कि मेरे कारण मेरे भाई - बंधुओं की जान जाय । इसके सिवाय मैं कुंआरी थी । मुझे अपनी मर्यादा के भंग होने का कोई भय न था । मैंने पातिव्रत नहीं लिया था । कम से कम संसार मुझे ऐसा समझता था । 

मैं अपनी दृष्टि में अब भी वही हूं , किन्तु संसार की दृष्टि में कुछ और हो गयी हूं । लोक - लाज ने मुझे राणा की आज्ञाकारिणी बना दिया है । पातिव्रत की बेड़ी जबरदस्ती मेरे पैरों में डाल दी गयी है । अब इसकी रक्षा करना मेरा धर्म है । इसके विपरीत और कुछ करना क्षत्राणियों के नाम को कलंकित करना है । 

तुम मेरे घाव पर व्यर्थ नमक क्यों छिड़कते हो ? यह कौन - सी भलमनसी है ? मेरे भाग्य में जो कुछ बदा है , वह भोग रही हूं । मुझे भोगने दो और तुमसे विनती करती हूं कि शीघ्र ही यहां से चले जाओ । 

राजकुमार एक पग और बढ़ा कर दुष्ट - भाव से बोला- प्रभा , यहां आ कर तुम त्रियाचरित्र में निपुण हो गयी । तुम मेरे साथ विश्वासघात करके अब धर्म की आड़ ले रही हो । तुमने मेरे प्रणय को पैरों तले कुचल दिया और अब मर्यादा का बहाना ढूंढ़ रही हो ! मैं इन नेत्रों से राणा को तुम्हारे सौन्दर्य पुष्प का भ्रमर बनते नहीं देख सकता । 

मेरी कामनाएं मिट्टी में मिलती हैं तो तुम्हें ले कर जायेंगी । मेरा जीवन नष्ट होता है तो उसके पहले तुम्हारे जीवन का भी अन्त होगा । तुम्हारी बेवफाई का यही दंड है । बोलो , क्या निश्चय करती हो ? इस समय मेरे साथ चलती हो या नहीं ? किले के बाहर मेरे आदमी खड़े हैं । 

प्रभा ने निर्भयता से कहा- नहीं । 

राजकुमार - सोच लो , नहीं तो पछताओगी । 

प्रभा - खूब सोच लिया । 

राजकुमार ने तलवार खींच ली और वह प्रभा की तरफ लपका । प्रभा भय से आंखें बन्द किये एक कदम पीछे हट गयी । मालूम होता था , उसे मूर्च्छा आ जायेगी । 

अकस्मात् राणा तलवार लिये वेग के साथ कमरे में दाखिल हुए । राजकुमार संभल कर खड़ा हो गया । 

राणा ने सिंह के समान गरज कर कहा- दूर हट क्षत्रिय स्त्रियों पर हाथ नहीं उठाते । 

राजकुमार ने तन कर उत्तर दिया - लज्जाहीन स्त्रियों की यही सजा है । 

राणा ने कहा- तुम्हारा वैरी तो मैं था । मेरे सामने आते क्यों लजाते थे । जरा मैं भी तुम्हारी तलवार की काट देखता । 

राजकुमार ने ऐंठ कर राणा पर तलवार चलायी । शस्त्र - विद्या में राणा अति कुशल थे. वार खाली दे कर राजकुमार पर झपटे । इतने में प्रभा , जो मूर्च्छित अवस्था में दीवार से चिमटी खड़ी थी , बिजली की तरह कौंध कर राजकुमार के सामने खड़ी हो गयी । 

राणा वार कर चुके  थे । तलवार का पूरा हाथ उसके कंधे पर पड़ा । रक्त की फुहार छूटने लगी । राणा ने एक ठंडी सांस ली और उन्होंने तलवार हाथ से फेंक कर गिरती हुई प्रभा को संभाल लिया । 

क्षणमात्र में प्रभा का मुखमंडल वर्ण - हीन हो गया । आंखें बुझ गयीं । दीपक ठंडा हो गया । मन्दार कुमार ने भी तलवार फेंक दी और वह आंखों में आंसू भर प्रभा के सामने घुटने टेक कर बैठ गया । दोनों प्रेमियों की आंखें सजल थीं । पतंगे बुझे हुए दीपक पर जान दे रहे थे. 

प्रेम के रहस्य निराले हैं । अभी एक क्षण हुआ राजकुमार प्रभा पर तलवार ले कर झपटा था । प्रभा किसी प्रकार उसके साथ चलने पर उद्यत न होती थी । लज्जा का भय , धर्म की बेड़ी , कर्त्तव्य की दीवार रास्ता रोके खड़ी हुई थी । परन्तु उसे तलवार के सामने देख कर उसने उस पर अपने प्राण अर्पण कर दिये । प्रीति की प्रथा निबाह दी , लेकिन अपने वचन के अनुसार उसी घर में । 

हां , प्रेम के रहस्य निराले हैं । अभी एक क्षण पहले राजकुमार प्रभा पर तलवार ले कर झपटा था । उसके खून का प्यासा था । ईर्ष्या की अग्नि उसके हृदय में दहक रही थी । वह रुधिर की धारा से शांत हो गयी । 

कुछ देर तक वह अचेत बैठा रोता रहा । फिर उठा और उसने तलवार उठा कर जोर से अपनी छाती में चुभा ली । फिर रक्त की फुहार निकली । दोनों धाराएं मिल गयीं और उनमें कोई भेद न रहा । 

प्रभा उसके साथ चलने पर राजी न थी । किन्तु प्रेम क बन्धन को तोड़ न सकी । दोनों उस घर ही से नहीं , संसार से एक साथ सिधारे ।

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