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मौलिक कर्तव्य क्या है ?मौलिक अधिकार एवं नीति निदेशक तत्व में अन्तर

भारतीय संविधान में ,मौलिक कर्तव्यों को सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम के चतुर्थ भाग में अनुच्छेद 51 ( क ) ( 1976

What are the fundamental duties of Indian citizens?:- मौलिक कर्तव्य( Maulik Kartavya),भारतीय नागरिकों के लिए दायित्व प्रस्तुत करते हैं , देश अपने नागरिकों से अपेक्षा करता है कि वे राष्ट्र के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सक्रिय योगदान दें । 

वर्ष 1950 में लागू भारतीय सविधान में नागरिकों के Fundamental Duties का उल्लेख नहीं था। भारतीय संविधान की मूल प्रति में मौलिक कर्त्तव्यों का प्रावधान नहीं था । यह संकल्पना पूर्व सोवियत संघ ( रूस ) से ली गई है ।

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 मौलिक कर्तव्य क्या है ?मौलिक अधिकार एवं नीति निदेशक तत्व में अन्तर

भारतीय संविधान में ,मौलिक कर्तव्यों को सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम के चतुर्थ भाग में अनुच्छेद 51 ( क ) ( 1976 ) के तहत समाहित किया गया है । 

संविधान का अनुच्छेद 51 ( क ) मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान करता है । मौलिक कर्तव्य न्यायालय के माध्यम से प्रवृत्त तो नहीं कराए जा सकते , किन्तु संविधान के निर्वचन में मूल्यवान दिशादर्शन के रूप से महत्त्वपूर्ण हैं ।

जिसमे 10 मूल कर्तव्यों की व्यवस्था की गई। 86 वां संविधान संशोधन द्वारा अभिभावकों को 6-14 वर्ष के अपने बच्चों को शिक्षा का अवसर प्रदान करने का कर्तव्य जोड़ देने से अब नागरिकों के निम्नांकित 11 कर्तव्य इस प्रकार है - 

मूल अधिकार fundamental rights और रिट क्या है ?Mul Adhikar के प्रकार विस्तार से समझाइए

भारतीय संविधान में citizenship क्या है ?

Citizens Fundamental Duties mentioned in the Indian Constitution in Hindi

भारतीय संविधान के भाग ( IV ) ( क ) के अनुच्छेद 51 ( क ) के तहत भारतीय नागरिकों के लिए निम्नलिखित प्रकार के मौलिक कर्त्तव्यों का निर्धारण किया गया है -
  1. भारतीय नागरिकों का यह मौलिक कर्त्तव्य होगा कि वे भारतीय संविधान का पालन , संविधान के आदर्शों , संस्थाओं , राष्ट्रीय ध्वज तथा राष्ट्रगान का सम्मान करें । 
  2. भारतीय नागरिकों का यह मौलिक कर्त्तव्य है कि वे देश की सम्प्रभुता , एकता तथा अखण्डता की रक्षा करें तथा इसे अक्षुण्ण बनाए रखें । 
  3. भारतीय नागरिकों का यह मौलिक कर्त्तव्य है कि वे राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन को प्रेरित करने वाले आदर्शों को आत्मसात् करें तथा उनका अनुपालन करें । 
  4. भारतीय नागरिकों का यह मौलिक कर्त्तव्य है कि वे देश की रक्षा करें तथा बुलाए जाने पर राष्ट्र की सेवा के लिए तैयार रहें ।
  5. भारतीय नागरिकों का यह कर्त्तव्य है कि वे धर्म , भाषा , प्रदेश या जाति वर्ग से परे होकर , समरसता और भ्रातृत्व की भावना का विकास करें । उन प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हों । 
  6. भारतीय नागरिकों का यह कर्तव्य है कि वे भारतीय संस्कृति की समृद्ध परम्परा की रक्षा करें , उसे बढ़ावा दें तथा उसकी रक्षा करें । 
  7. भारतीय नागरिकों का यह कर्त्तव्य है कि वे प्राकृतिक पर्यावरण ( वन , झील , नदी , वन्य जीव ) की रक्षा करें , उनका संवर्द्धन करें , उनके प्रति दयाभाव रखें । 
  8. भारतीय नागरिकों का यह कर्त्तव्य है कि वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाते हुए मानववादी दृष्टिकोण रखें तथा ज्ञानार्जन व सुधारवादी भावनाओं का विकास करें । 
  9. भारतीय नागरिकों का यह कर्त्तव्य है कि वे सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करें , अहिंसात्मक विचार को आत्मसात् कर हिंसा से दूर रहें । 
  10. भारतीय नागरिकों का यह कर्त्तव्य है कि वे राष्ट्र की प्रगति में व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष के लिए निरन्तर प्रयत्न करें । 
  11. भारतीय माता - पिता या संरक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वे छः वर्ष से चौदह वर्ष तक की उम्र के अपने बच्चे या प्रतिपाल्य के लिए शिक्षा का अवसर प्रदान करें । ( यह मौलिक कर्त्तव्य 86 वें संविधान संशोधन अधिनियम , 2002 द्वारा अनुच्छेद 51 ( A ) में जोड़ा गया है ।

राज्य के नीति निर्देशक तत्व (Directive Principles of State Policy in Hindi)

भारतीय संविधान के भाग- IV के अनुच्छेद 36-51 में राज्य के लिए नीति - निदेशित करने वाले तत्त्वों का उल्लेख किया गया है । ये संकल्पना आयरलैण्ड के संविधान से अभिप्रेरित है । जिन्हें आयरलैण्ड के सामाजिक सिद्धान्तों के समान न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं बनाया गया है । 
  • अनुच्छेद 36 में नीति - निदेशक तत्त्वों की परिभाषा एवं अनुच्छेद 37 में अन्तर्विष्ट तत्त्वों का लागू होना दर्शाया गया है  
  • अनुच्छेद 38 के अनुसार , लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाना तथा भारतीय नागरिकों को सामाजिक , आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय प्रदान करना भारतीय राज्य का कर्त्तव्य है । 
अनुच्छेद 39 में राज्य का यह कर्त्तव्य है कि वह समान कार्य के लिए समान वेतन प्रदान करे तथा इसके अन्तर्गत निम्न प्रावधानों का उल्लेख है 

  • ( क ) राज्य सभी को समान न्याय उपलब्ध कराने के लिए नागरिकों को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराएगा । ( ख ) राज्य सार्वजनिक धन का स्वामित्व एवं प्रबन्धन इस प्रकार करे जिससे वह सार्वजनिक हित का सर्वोत्तम साधन बन सके । 
  • ( ग ) राज्य को निर्देश करता है कि वह धन के समान वितरण का प्रावधान करे जिससे ' समाजवादी संकल्पना को बल मिल सके । 
  • अनुच्छेद 40 के अन्तर्गत राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे ग्राम पंचायत की स्थापना करें । 
  • अनुच्छेद 41 के अन्तर्गत राज्य का दायित्व है कि वह कुछ दशाओं में नागरिकों को काम , शिक्षा और जन - सहायता पाने का अधिकार सुनिश्चित करे ।
  • अनुच्छेद 42 एवं 43 के अन्तर्गत प्रावधान किया गया है कि राज्य कामगारों को निर्वाह मजदूरी , काम की मानवोचित दशाएँ , प्रसूति सहायता प्रदान करे । वह शिष्ट जीवन स्तर तथा अवकाश के पूर्ण उपयोग के सामाजिक अवसर उपलब्ध कराए । 
  • अनुच्छेद 44 राज्य से अपेक्षा करता है कि वह सभी नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता का निर्माण करे । 
  • अनुच्छेद 45 के अन्तर्गत राज्य को निर्देश दिया गया है कि वह 6 वर्ष तक की आयु के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए । 
  • अनुच्छेद 46 के अन्तर्गत अनुसूचित जातियों , अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्ग को शिक्षित और आर्थिक अभिवृद्धि करना राज्य का कर्त्तव्य है । 
  • अनुच्छेद 47 के अन्तर्गत यह राज्य का दायित्व है कि वह लोगों के जीवन - स्तर को ऊँचा उठाने हेतु उनके पोषाहार तथा जन स्वास्थ्य में सुधार करे । 
  • अनुच्छेद 48 के अन्तर्गत राज्य का यह दायित्व है कि कृषि और पशुपालन को प्रोत्साहन दे तथा गो - वध का प्रतिषेध करे । 
  • अनुच्छेद 48 ( क ) पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्द्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा । 
  • अनुच्छेद 49 के अन्तर्गत राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारकों , स्थानों तथा वस्तुओं का संरक्षण करना राज्य का कर्तव्य है । अनुच्छेद 50 के अन्तर्गत कार्यपालिका व न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र को पृथक् किया गया है । 
  • अनुच्छेद 51 के अन्तर्गत राज्य का यह कर्तव्य होगा कि वह अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाए रखने का प्रयत्न करे ।

मौलिक अधिकार एवं नीति निदेशक तत्व में अन्तर (Difference between Fundamental Rights and Directive Principles of Policy)

मौलिक अधिकार एवं नीति - निदेशक तत्त्व में अन्तर

मौलिक अधिकार

नीति - निदेशक तत्त्व नीति

मौलिक अधिकारों का क्रियान्वयन न्यायालय द्वारा किया जा सकता है ।

निदेशक तत्त्वों को न्यायालय द्वारा लागू नहीं किया जा सकता ।

मौलिक अधिकारों की प्रकृति नकारात्मक है तथा ये राज्य के कुछ कार्यों पर प्रतिबन्ध लगाते हैं ।

नीति - निदेशक तत्त्व राज्य को कुछ सकारात्मक कार्य करने की सलाह देते हैं ।

मौलिक अधिकारों को कानूनी शक्ति प्राप्त है ।

नीति - निदेशक तत्त्वों को नैतिक शक्ति प्राप्त है

मौलिक अधिकारों का उद्देश्य राजनीतिक लोकतन्त्र की स्थापना करना है ।

नीति - निदेशक तत्त्वों का उद्देश्य सामाजिक एवं आर्थिक लोकतन्त्र की स्थापना करना है ।

मौलिक अधिकार सीमित हैं तथा विशेष परिस्थितियों में इन्हें प्रतिबन्धित किया जा सकता है ।

नीति - निदेशक तत्त्व असीमित हैं एवं इन पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता ।

आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों का निलम्बन किया जा सकता है ।

नीति निदेशक तत्त्वों का निलम्बन किसी भी स्थिति में नहीं किया जा सकता ।

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