कहानी चार रूपयों का हिसाब | char rupayon ka hisab hindi Moral kahani

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चार रूपयों का हिसाब इस कहानी में एक पहेली है । साथ ही हैं कुछ ऐसे शब्द जो बोलचाल में कम इस्तेमाल होते हैं । बच्चों को कहानी सुनाते समय नए शब्दों से परिचित भी कराते चलें , तो kahani का आनंद दूना हो जाएगा और सीखने का मजा भी आएगा । इस कहानी को छोटे नाटक के रूप में खेला भी जा सकता है ।

चार रूपयों का हिसाब इस कहानी में एक पहेली है । साथ ही हैं कुछ ऐसे शब्द जो बोलचाल में कम इस्तेमाल होते हैं । बच्चों को कहानी सुनाते समय नए शब्दों से परिचित भी कराते चलें , तो kahani का आनंद दूना हो जाएगा और सीखने का मजा भी आएगा । इस कहानी को छोटे नाटक के रूप में खेला भी जा सकता है ।

कहानी चार रूपयों का हिसाब | char rupayon ka hisab hindi  Moral kahani 

एक बादशाह संध्या के समय वेश बदलकर घूमने निकले । उनके साथ कुछ सिपाही थे ,जो दूर रहकर उनकी रक्षा करते थे । एक स्थान पर एक इमारत का निर्माण कार्य चल रहा था । मजदूर क़तार में मजदूरी लेने के लिए खड़े थे । एक मजदूर ने अपनी मजदूरी ली , जेब में रखी और गुनगुनाता हुआ चला । बादशाह ने उसे रोक लिया , पूछा , ' मुझसे कुछ बातें करोगे ? ' 

‘क्यों नहीं ? ' मजदूर रुककर बोला , ' कहो , क्या कहना चाहते हो ?  '

'आओ , उधर पेड़ के नीचे बैठ जाएं । मैं तुम्हारा अधिक समय न लूंगा । मुझे मालूम है पूरा दिन काम करके तुम थक चुके होंगे , बस थोड़ी देर के लिए मेरे साथ बातें करो । ' 

'ऐसी कोई बात नहीं । ' मजदूर हंसकर बोला । ' मैं अभी आठ घंटे और काम कर सकता हूं । '

दोनों पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए । 

' तुम्हें जो मजदूरी मिलती है , क्या वो तुम्हारे लिए पर्याप्त है ? ' बादशाह ने पूछा । 

‘ हां , काफ़ी है । ' मजदूर ने कहा ।

 ' कितना कमा लेते हो ? " 

' चार रुपए प्रतिदिन । ' 

‘ उन्हें ख़र्च कैसे करते हो ? ' 

मजदूर हंसकर बोला , ' बड़ी आसानी से ख़र्च करता हूं । सीधा हिसाब है । एक रुपया मैं खाता हूं , एक रुपया क़र्ज देता हूं , एक रुपया क़र्ज लौटाता हूं और एक रुपया फेंक देता हूं । ये सीधा हिसाब है । ' 

बादशाह उलझ कर बोले , ' मेरी समझ में कुछ नहीं आया । ' 

मजदूर ठठाकर हंस पड़ा । बोला , ' मैं पढ़ा - लिखा नहीं हूं भाई ! बस पहेलियों में बात करने का शौक है , सो बात बना दी । ' 

' पहेली है पहेली का जवाब बता दो । ' बादशाह ने आग्रह किया । मजदूर ने स्पष्टीकरण किया , ' एक रुपया खाता हूं अर्थात अपने परिवार के भोजन के लिए ख़र्च करता हूं । एक रुपया कर्ज देता हूं अर्थात अपने बच्चों पर खर्च करता हूं , ताकि वृद्धावस्था में वो हमारा ख़्याल रखें । एक रुपया कर्ज़ लौटाता हूं अर्थात अपने बूढ़े माता - पिता पर ख़र्च करता हूं , क्योंकि उन्होंने मेरा पालन - पोषण किया है । एक रुपया फेंक देता हूं , अर्थात दान कर देता हूं । ' बादशाह मजदूर की प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुए , बोले , ' तुमने अभी जो मुझे बताया है वो और किसी को न बताना । ' 

' कोई पूछेगा तो अवश्य बताऊंगा । ' मजदूर हंस कर बोला । ' इसमें छिपाने की क्या बात है ! तुम कोई हमारे बादशाह हो कि तुमने आज्ञा दी और मैंने मानी । ' 

' हां , हम बादशाह ही हैं । ' बादशाह ने अपना परिचय कराया , ' हम दरबार में ये पहेली पेश करेंगे और फिर देखेंगे कि कौन इस पहेली को सुलझाता है ? थोड़ा आनंद लेंगें । लो , ये अशर्फ़ियां रखो । तुम्हारा इनाम है । ' 

मजदूर घबराकर खड़ा हो गया बोला , ' इनाम की जरूरत नहीं , मैं आपकी आज्ञा का पालन करूंगा । ' 

‘ ये अशर्फ़ियां तुम्हारी अक़्लमंदी का इनाम हैं । अब तुम हमसे वादा करो कि तुम जब तक सौ बार हमारा चेहरा नहीं देख लोगे , किसी को पहेली का हल नहीं बताओगे । ' मजदूर ने इनाम लेकर वादा कर लिया । 

दूसरे रोज बादशाह ने दरबार में पहेली पेश की , ' एक मज़दूर है । उसे प्रतिदिन चार रुपए मज़दूरी मिलती है । इनमें एक रुपया वो खाता है , एक कर्ज़ देता है । एक रुपया क़र्ज़ चुकाता है और एक रुपया फेंक देता है । बताओ कि वे चार रुपए कैसे और कहां खर्च करता है ? '

दरबार में मौन छा गया । बादशाह बहुत निराश हुए । कहा , ' इसका अर्थ ये हुआ कि हमारे दरबार में कोई बुद्धिमान व्यक्ति नहीं है । हम कल तक का समय देते हैं । हमें पहेली का हल चाहिए । ' 

एक मंत्री बहुत होशियार था । उसने बादशाह के सुरक्षा कर्मियों से मिलकर पता लगाया कि बीते दिनों में बादशाह कहां - कहां गए थे । उसने न केवल मज़दूर को तलाश कर लिया बल्कि पहेली का हल भी जान लिया । दूसरे दिन मंत्री ने दरबार में पहेली का हल पेश कर दिया । 

बादशाह के क्रोध की सीमा न रही । उन्होंने सिपाही भेजकर मजदूर को पकड़कर बुलवाया । पूछा , ' तुमने इन्हें पहेली का हल बताया है ? ' 

' जी हां , बताया है । ' मजदूर ने स्वीकार किया ।

' हमने तुमसे वादा लिया था कि किसी को हल नहीं बताओगे । तुमने वादा क्यों तोड़ा ? ' बादशाह क्रोधित होकर बोले । 

' मैंने ऐसा कुछ नहीं किया । आपने कहा था न कि जब तक सौ बार आपका चेहरा न देख लूं , किसी को पहेली का उत्तर न बताऊं ? तो मैंने सौ बार आपका चेहरा देखा और वज़ीर जी को उत्तर बता दिया । ' 

' क्या कहते हो ?

 तुमने हमारा चेहरा कहां देखा ? उस दिन के बाद आज अभी तुम हमारे सामने आए हो । ' 

मजदूर ने भयभीत हुए बिना कहा , ' जहांपनाह , मैं आपको पूरी बात बताता हूं । आपके ये मंत्री मुझ तक पहुंचे । दस अशर्फ़ियां मेरे सामने रखीं और पहेली का उत्तर मांगा , मैंने इंकार कर दिया । ' 

' फिर ? ' 

‘ इन्होंने फिर दस अशर्फ़ियां रखीं । मैंने इंकार कर दिया । ' 

' फिर ?? ' 

' मैंने पहेली का उत्तर बताने से इंकार कर दिया । ' 

' फिर ... ? ' 

' ये दस - दस अशर्फ़ियां बढ़ाते गए । जब सौ अशर्फ़ियां मेरे सामने आ गईं तो मैंने उत्तर बता दिया । ' 

' सौ अशर्फ़ियां लेकर तुमने वादा तोड़ दिया । ' बादशाह ने गुस्से से कहा , ' यही है तुम्हारा वादा ? ' . 

' नहीं , मैंने बेईमानी नहीं की । अशर्फ़ियों पर आपका चेहरा है , सौ बार आपका चेहरा देखा और फिर उत्तर बताया । ये वादा तोड़ना तो नहीं हुआ जहांपनाह ' मजदूर ने कहा । बादशाह चकित रह गए । उन्होंने तो ये बात सोची ही नहीं थी । 

मजदूर ने अपनी बुद्धि के बल पर सौ अशर्फ़ियां और कमा ली थीं । बादशाह ने मुक्त हृदय से मजदूर की प्रशंसा की तथा उसे अपने दरबार में रख लिया ।

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