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कहानी: अपनी-अपनी बारिशें | Apni-Apni Baarishein Short Story

कहानी: अपनी-अपनी बारिशें | Apni-Apni Baarishein Short Story शिल्पा ने शांति के हाथों में कुछ पैसे देते हुए कहा , " यह ले , एक रेनकोट खरीद लेना । सब
Santosh Kukreti

शिल्पा ने शांति के हाथों में कुछ पैसे देते हुए कहा , " यह ले , एक रेनकोट खरीद लेना । सब कहां समझेंगे तेरी मजबूरी को ? यहां तो सबकी अपनी - अपनी बारिशें हैं । ” 

कहानी: अपनी-अपनी बारिशें | Apni-Apni Baarishein Short Story

कहानी- पूर्ति वैभव खरे 

कहानी अपनी-अपनी बारिशें | Apni-Apni Baarishein

" क्या सुहाना मौसम है । ऐसे में गरमागरम चाय और पकौड़े मिल जाएं तो मजा आ जाए । " शिखर ने मैगजीन में डूबी शिल्पा से कहा । कुछ पल ठहरकर शिल्पा ने भौंहें चढ़ाते हुए कहा , “ हां - हां , पकौड़े ही क्यों , मालपुए , गुलगुले , हलवा , मंगोड़ी भी बन जाएं तो ?

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एक तो यह शांति अब तक नहीं आई । सुबह भी नहीं आई थी और शाम होने को है , अभी भी कोई अता - पता नहीं है उसका । सिंक पर बर्तन भरे पड़े हैं । मन तो मेरा भी है कुछ चटपटा बनाकर खाने का , पर यह शांति मौसम के मजे लेने दे तब न । ” 

शिखर बोला , " और बर्तन निकाल लो । बर्तनों की कोई कमी थोड़े ही है । " 

शिल्पा किचन में जाकर पकौड़े की तैयारी करती हुई शांति पर अपना गुस्सा निकालती बड़बड़ाने लगी । तभी दरवाजे पर घंटी बजी और शांति टूटी छतरी दरवाजे पर टिकाती हुई अपनी गीली साड़ी का पानी झटकती अंदर आई , " माफ करना दीदी , आज सुबह नहीं आ पाई । ” 

“ हां ठीक है , तुम्हारा तो हमेशा का यही नाटक है । जरा - सी बारिश हुई नहीं कि तुम गोल । " शिल्पा ने मुंह फुलाते हुए कहा । 

शांति सफाई देती हुई बोली , “ नहीं दीदी , मैं बहाना नहीं बना रही । रात से तेज बारिश हो रही है । घर में खपरैल से जगह - जगह पानी टपक रहा है । एक कमरे में पुराना तिरपाल लगा है , पर वह कई जगह से फट गया है । ऐसे में मैं क्या करूं ? दीदी , आज तो बारिश ने ऐसा परेशान किया कि दिन चढ़े चूल्हा जला पाई । " 

शांति की बातें सुनकर अपने गुस्से को कुछ संभालते हुए शिल्पा ने पूछा , " बच्चों को खाना खिलाकर आई है ? " 

शांति ने जवाब दिया , " जी , दीदी ! बस खिचड़ी बनाकर खिला आई । तेज बारिश में चूल्हा , लकड़ी सब नमी पकड़ लेते हैं , इसलिए खाना मुश्किल से बना पाई । दीदी , कोशिश करूंगी कि अब से आपके काम में देर न हो । 

शिल्पा उसकी गीली साड़ी के साथ ही आंखों का गीलापन भी महसूस कर पा रही थी । वह मन ही मन सोच रही थी , ' यहां कोई बारिश में पकौड़े बनाकर खा रहा है तो कोई रेनकोट पहनकर मस्ती कर रहा है , कोई बारिश की बूंदों में नहा रहा है तो कोई सुंदर - सुंदर रंगीन छतरियों को घुमाकर झूम रहा है । सब तरह तरह से इस मौसम का आनंद ले रहे हैं । 

वहीं कई लोग शांति जैसे भी हैं , जो बस बारिश में दो वक्त की रोटी की जुगाड़ और सिर पर छत की चिंता में बरसात निकाल देते हैं । ' मन की उथल - पुथल के बाद शिल्पा ने घर जाती शांति के हाथों में पकौड़ों से भरा डिब्बा और कुछ पैसे देते हुए कहा , " 

यह ले शांति , नया तिरपाल खरीद लेना और अपने लिए एक रेनकोट भी , क्योंकि घरों में काम करने तो तुझे जाना ही पड़ेगा । सब कहां समझेंगे तेरी मजबूरी को ? यहां तो सबकी अपनी - अपनी बारिशें हैं । " 

शिल्पा के दयाभाव से शांति की आंखें सजल हो गई और अपने गीले पल्लू से आंखों की बारिश संभालती हुई वह अन्य घरों में काम करने को चल दी ।

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